पहाड़ी कोरवाओं की जमीन हड़पने वालों की खैर नहीं! जशपुर कलेक्टर ने 1955 के जमीन ट्रांसफर को किया शून्य घोषित
NEWS IN SHORT
- जशपुर कलेक्टर का ऐतिहासिक आदेश, आदिवासी भूमि का कब्जा शून्य किया
- कलेक्टर का बड़ा कदम, पहाड़ी कोरवा की भूमि को अवैध घोषित किया हैं
- आदिवासी भूमि हड़पने का प्रयास असफल, कलेक्टर ने आदेश को निरस्त किया
- धर्मांतरण की आड़ में भूमि हड़पने वालों को सख्त चेतावनी दी हैं
- कानूनी लड़ाई में हुई जीत, आदिवासी समुदाय को न्याय मिला
NEWS IN DETAIL
Jashpur। जशपुरनगर में आदिवासी समुदाय के जल, जंगल और जमीन के अधिकारों को लेकर कलेक्टर ने एक ऐतिहासिक आदेश जारी किया है। यह आदेश वर्ष 1955 में हुई एक बड़े छल के तहत आदिवासी समुदाय की 31.31 एकड़ भूमि के हस्तांतरण को शून्य घोषित करता है। यह भूमि पहाड़ी कोरवा जनजाति की थी, जिसे राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र के रूप में मान्यता प्राप्त एक विशेष पिछड़ी जनजाति माना जाता है।
कानूनी लड़ाई और न्याय
इस फैसले से यह गलतफहमी दूर हो गई कि आदिवासियों के बीच हुए पुराने जमीन के सौदों को बदला नहीं जा सकता। अधिवक्ता सत्य प्रकाश तिवारी ने लंबे समय तक इस मामले में कानूनी लड़ाई लड़ी और अदालत के सामने यह स्पष्ट किया कि किस तरह से धर्मांतरित व्यक्तियों और धोखाधड़ी के जरिए भोले-भाले आदिवासी लोगों को उनकी ही संपत्ति से वंचित किया गया था।
अदालत का निर्णायक फैसला
अदालत ने इस मामले के कानूनी कागजों की गहराई से जांच की और साफ किया कि छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता की धारा 170 (ख) का कानून बहुत बड़ा है। इसमें हर एक व्यक्ति शामिल है, जिसका मतलब यह है कि अगर किसी आदिवासी ने भी नियमों के खिलाफ जाकर जमीन ली है, तो उसे कानून का साथ नहीं मिलेगा। कलेक्टर ने 1959 से पुराने नियमों के उल्लंघन को भी सही माना और इसी को आधार बनाकर जमीन के तबादले को पूरी तरह अवैध घोषित कर दिया।
कब्जा बनाम कागज
न्यायालय ने यह भी स्वीकार किया कि भले ही कागजों में कुछ नामों में हेरफेर किया गया हो, लेकिन जमीन पर कब्जा अभी भी पीड़ित पहाड़ी कोरवाओं का ही था। यह फैसला उन लोगों के लिए एक सख्त चेतावनी है जो धर्मांतरण की आड़ में या आदिवासी पहचान का फायदा उठाकर इन जमीनों को हड़पने की कोशिश कर रहे थे।
राजस्व रिकॉर्ड में सुधार
कलेक्टर ने इस मामले में पूर्व आदेश को निरस्त करते हुए राजस्व विभाग को आदेश दिए हैं कि ग्राम करदनापाठ की विवादित भूमि को तत्काल मूल भू-स्वामी के कानूनी वारिसों के नाम पर दर्ज किया जाए। इसके अलावा, इस भूमि के रिकॉर्ड को जल्द अपडेट करने के निर्देश भी दिए गए हैं।
आदिवासी समुदाय के लिए उम्मीद की किरण
यह फैसला जशपुर के आदिवासी समुदाय के लिए एक नई उम्मीद लेकर आया है, क्योंकि दशकों पहले नियमों की अनदेखी करके जिनकी भूमि छीनी गई थी, अब उन्हें न्याय मिल सकेगा। इस फैसले से अन्य आदिवासी समुदायों को भी बल मिलेगा की उनके अधिकारों की रक्षा करने में एक बड़ा कदम उठाया गया है।
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