झीरम केस पर भूपेश ने कहा, तत्कालीन CM रमन सिंह और CS-DGP से पूछताछ क्यों नहीं
झीरम घाटी नक्सली हमले के मामले में NIA कोर्ट के फैसले के बाद पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने एक बार फिर जांच की दिशा और सुरक्षा में हुई चूक को लेकर सवाल खड़े किए हैं। बघेल ने पूछा है कि तत्कालीन मुख्यमंत्री रमन सिंह, मुख्य सचिव और DGP समेत उस समय के जिम्मेदार अधिकारियों से पूछताछ क्यों नहीं हुई।
उन्होंने सवाल किया कि आखिर इन लोगों से पूछताछ कब होगी और झीरम हमले में सुरक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी तय क्यों नहीं की गई। बघेल ने कहा कि झीरम मामले की जांच केवल हमले को अंजाम देने वाले नक्सलियों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।
यह भी पता लगाया जाना जरूरी है कि इतनी बड़ी राजनीतिक यात्रा की सुरक्षा में चूक कैसे हुई और इसके लिए जिम्मेदार कौन था। पूर्व मुख्यमंत्री ने खास तौर पर तत्कालीन मुख्यमंत्री रमन सिंह और तत्कालीन मुख्य सचिव सुनील कुमार का नाम लेते हुए पूछा कि इनसे कब पूछताछ होगी? बघेल का कहना है कि झीरम हमले की जांच में सुरक्षा संबंधी पहलू भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं, जितना हमले को अंजाम देने वालों की भूमिका का पता लगाना।
बड़े नक्सली नेताओं की भूमिका पर जांच क्यों नहीं:
बघेल ने यह सवाल भी उठाया कि झीरम घाटी में जिन बड़े नक्सली नेताओं के नाम सामने आए थे, उन्हें NIA की जांच से क्यों हटाया गया। उन्होंने पूछा कि हमले के पीछे के पूरे षड्यंत्र की जांच क्यों नहीं हुई और प्रभावित लोगों के बयान क्यों नहीं लिए गए।उन्होंने NIA कोर्ट के निर्देश का जिक्र करते हुए पूछा कि रमन्ना और गुड़सा उसेंडी के बयान लेने के लिए कहा गया था, तो उनके बयान क्यों नहीं लिए गए।
SIT और आयोग की जांच पर भी सवाल:
पूर्व मुख्यमंत्री ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद SIT गठन और उसकी जांच को लेकर भी सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि जब SIT का गठन कर जांच की जानी थी तो जांच क्यों नहीं कराई गई।बघेल ने कहा कि उनकी सरकार ने झीरम आयोग की अधूरी रिपोर्ट की जांच के लिए दो सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की कमेटी बनाई थी। उन्होंने सवाल किया कि भाजपा के लोग कोर्ट क्यों गए और उस कमेटी पर स्टे क्यों लिया गया?
उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस सरकार के दौरान SIT गठित होने के बाद NIA बार-बार कोर्ट गई और जांच में बाधा डालती रही। बघेल ने इस पूरे घटनाक्रम पर भी सवाल खड़े किए हैं।
10 दोषियों में बड़ा नक्सली नेता कौन?:
NIA कोर्ट के फैसले के संदर्भ में बघेल ने पूछा कि जिन लोगों को दोषी ठहराया गया है, उनमें क्या एक भी बड़ा नक्सली नेता है? उन्होंने यह भी सवाल किया कि सुरक्षा में हुई चूक के लिए क्या एक कांस्टेबल तक को दोषी ठहराया गया?
बघेल ने कहा कि झीरम घाटी के शहीदों को न्याय चाहिए, बयानबाजी नहीं। उनके सवालों का केंद्र यही है कि हमले के पीछे की पूरी साजिश और सुरक्षा में हुई कथित चूक की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।
साय का पलटवार- 13 साल जांच चली, अब सवाल क्यों:
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने भूपेश बघेल पर पलटवार करते हुए कहा कि झीरम मामले की जांच NIA को उस समय सौंपी गई थी, जब केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार थी। उन्होंने कहा कि करीब 13 वर्षों तक जांच और न्यायिक प्रक्रिया चली और 100 से अधिक गवाहों की गवाही हुई। तमाम तथ्यों और साक्ष्यों के परीक्षण के बाद अदालत ने 10 लोगों को दोषी ठहराया है। अब 16 सितंबर को उनकी सजा का निर्धारण किया जाएगा।
साय ने कहा कि कांग्रेस को यह याद रखना चाहिए कि NIA किसी राज्य सरकार की एजेंसी नहीं, बल्कि देश की प्रमुख जांच एजेंसियों में से एक है। जब यह मामला NIA को सौंपा गया था, तब केंद्र में कांग्रेस की ही सरकार थी। ऐसे में यदि कांग्रेस नेताओं के पास मामले से जुड़े कोई तथ्य, प्रमाण या सबूत थे तो उन्हें जांच एजेंसी के सामने रखना चाहिए था।मुख्यमंत्री ने खास तौर पर भूपेश बघेल को निशाने पर लिया। उन्होंने कहा कि जब बघेल विपक्ष में थे तो कहा करते थे कि झीरम के सबूत उनकी जेब में हैं। साय ने सवाल किया कि अगर उनके पास सबूत थे तो उन्होंने NIA को क्यों नहीं सौंपे?
साय ने कहा कि जांच एजेंसी के सामने तथ्य रखने के लिए कांग्रेस नेताओं के पास पर्याप्त समय था। अदालत का फैसला आने के बाद राजनीतिक बयानबाजी करना केवल सवालों से बचने का प्रयास है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि आरोप लगाना आसान है, लेकिन उन्हें साबित करने के लिए तथ्य और साक्ष्य जरूरी होते हैं। न्यायिक प्रक्रिया राजनीतिक बयानों से नहीं, बल्कि साक्ष्यों और तथ्यों से चलती है।
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