खैरागढ़ में करोड़ों की शासकीय भूमि का सौदा, जांच में फंसेंगे कई बड़े नाम
NEWS IN SHORT
- खैरागढ़ में सरकारी जमीन का करोड़ों का खेल
- खसरा नंबर 114, 115, 169, 170 में अनियमितता
- बिचौलियों ने बढ़ाई जमीन की कीमत
- राजस्व रिकॉर्ड और मालिकाना हक पर सवाल
- जांच अब शासन और मंत्री स्तर तक पहुंची
NEWS IN DETAIL
Khairagarh। खैरागढ़ में सरकारी जमीन के मामले ने तूल पकड़ लिया है। जांच में खुलासा हुआ कि खसरा नंबर 114, 115, 169 और 170 में दर्ज जमीनों को सरकारी रिकॉर्ड में सार्वजनिक उपयोग या जंगल के रूप में दिखाया गया था। बावजूद इसके, इन जमीनों को प्लॉट में तब्दील कर करोड़ों रुपए में बेचा गया। अब सवाल यह उठ रहा है कि इतनी बड़ी अनियमितता वर्षों तक कैसे छुपी रही और प्रशासन ने किन कारणों से इसे नहीं रोका।
जमीन की कीमतों का खेल
सूत्रों के अनुसार, जमीन के मूल मालिक ने कुछ हिस्सों को दो से तीन हजार रुपए प्रति वर्गफीट के हिसाब से बेचा। इसके बाद बिचौलियों ने जमीन को सात से आठ हजार रुपए प्रति वर्गफीट तक पहुंचा दिया। यानी सरकारी रिकॉर्ड चाहे जो कहता रहा, बाजार में जमीन की कीमत लगातार बढ़ती रही।
रिकॉर्ड और मालिकाना हक का विरोधाभास
रियासतकालीन रिकॉर्ड में कई जमीनों को सरकारी या सार्वजनिक उपयोग के तहत दर्ज किया गया था, लेकिन मेंटेनेंस खसरे में तत्कालीन राजपरिवार के नाम बने। धीरे-धीरे इस कॉलम का इस्तेमाल वास्तविक मालिकाना हक के रूप में होने लगा। कानूनी जानकारों का कहना है कि खसरे में नाम दर्ज होना पूर्ण स्वामित्व का प्रमाण नहीं है। न्यायिक टिप्पणियों के अनुसार, राजस्व रिकॉर्ड या खसरा प्रविष्टियां अपने आप मालिकाना हक की गारंटी नहीं देतीं।
बिना स्वीकृत ले-आउट के निर्माण
नगर एवं ग्राम निवेश विभाग ने पुष्टि की कि संबंधित भूमि का कोई स्वीकृत ले-आउट नहीं था। इसके बावजूद जमीन के टुकड़े हुए, रजिस्ट्रियां हुईं और मकान बने। यही कारण है कि जनता का गुस्सा सिर्फ जमीन बेचने वालों पर नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम पर है। छोटे मामलों में नियमों के हवाले से निर्माण रोका जाता है, लेकिन इस मामले में सालों तक सब चलता रहा।
शासन स्तर तक मामला
राजस्व मंत्री टंक राम वर्मा ने कहा कि शिकायत और जांच प्रतिवेदन उपलब्ध कराए जाने पर पूरे प्रकरण की समीक्षा की जाएगी और आवश्यक कदम उठाए जाएंगे। इससे यह स्पष्ट है कि मामला अब शासन स्तर तक पहुंच चुका है। शहर में चर्चा है कि यदि जांच गहराई तक गई तो सवाल सिर्फ जमीन बेचने वालों तक सीमित नहीं रहेंगे।
बड़े सवाल अब भी
सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर जमीन सरकारी रिकॉर्ड में पार्क और जंगल थी, तो करोड़ों रुपए के प्लॉट किस आधार पर बिके। और यदि सब कुछ वैध था, तो अब जांच क्यों हो रही है। इन सवालों के जवाब तय करेंगे कि यह मामला रिकॉर्ड की गलती है, प्रशासनिक लापरवाही है या दशकों से चलता आया जमीनों का खेल।
FAQ
- खैरागढ़ जमीन घोटाला किस खसरा नंबर से जुड़ा है?
यह मामला मुख्य रूप से खसरा नंबर 114, 115, 169 और 170 से जुड़ा है। इन खसरा नंबरों में दर्ज जमीनों को सरकारी रिकॉर्ड में सार्वजनिक उपयोग, पार्क या छोटे झाड़ के जंगल के रूप में दिखाया गया था। बावजूद इसके, इन जमीनों को प्लॉट में तब्दील कर बेचा गया, जिससे करोड़ों रुपए का विवाद पैदा हुआ। - क्या जमीन का कोई स्वीकृत ले-आउट था?
जांच में यह सामने आया कि संबंधित भूमि का कोई आधिकारिक स्वीकृत ले-आउट या प्लान मौजूद नहीं था। बिना अनुमति के भूमि विभाजन और उपविभाजन किए गए। इसके बावजूद लोग मकान बनाकर जमीन पर कब्जा कर चुके थे और कई करोड़ रुपए का लेन-देन हुआ। - क्या सरकारी रिकॉर्ड में नाम दर्ज होना मालिकाना हक साबित करता है?
नहीं। कानूनी जानकारों के अनुसार, खसरे या राजस्व रिकॉर्ड में किसी का नाम दर्ज होना पूर्ण स्वामित्व का प्रमाण नहीं है। रजिस्ट्री या रिकॉर्ड केवल आधिकारिक दस्तावेज होते हैं, लेकिन वास्तविक मालिकाना हक, स्वीकृत ले-आउट और अनुमति के बिना नहीं माना जा सकता।
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