बुआई से पहले किसानों पर महंगाई की मार, हर एकड़ पर 10 हजार तक बढ़ा खर्च

Arun Tiwari | Jun 11, 2026, 15:01 IST
खरीफ सीजन 2026 में किसानों का खर्च बढ़ा
खाड़ी युद्ध से बेतहाशा बढ़ी महंगाई का सीधा असर अन्नदाता पर पड़ रहा है। उसकी खेती लागत में 10 हजार रुपए एकड़ की बढ़ोत्तरी हो गई है। खेती आधारित राज्यों की बात करें तो मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में इसका सबसे ज्यादा असर 1 करोड़ किसानों पर पड़ा है।

खाड़ी युद्ध का असर सीधे किसानों पर पड़ रहा है। खरीफ सीजन की बुआई शुरू होने से पहले ही प्रदेश के किसानों के सामने लागत बढ़ने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। खेत की जुताई से लेकर रोपाई, खाद, कीटनाशक, सिंचाई और कटाई-मजदूरी तक हर स्तर पर खर्च बढ़ गया है।



इसके चलते पिछले साल की तुलना में इस बार प्रति एकड़ खेती की लागत में करीब 10 हजार रूपए तक का इजाफा हो गया है। मध्य प्रदेश हो या छत्तीसगढ़ या राजस्थान हर जगह किसानों का यही हाल है। किसानों का कहना है कि बढ़ती लागत और संसाधनों की कमी के कारण खेती करना लगातार मुश्किल होता जा रहा है।



डीजल की कीमतों में बढ़ोत्तरी और खाद की कमी ने तो अन्नदाता को बेबस कर दिया है। एक तरफ महंगाई की मार है तो दूसरी तरफ खाद का संकट खड़ा है जिससे खुले बाजार से महंगी कीमत में खाद,यूरिया,डीएपी खरीदनी पड़ रही है।



प्रति एकड़ 10 हजार तक इजाफा :

पिछले साल जहां एक एकड़ धान की खेती पर औसतन 23 से 25 हजार रूपए तक खर्च आता था, वहीं इस बार यह बढ़कर 34 हजार रूपए या उससे अधिक पहुंच गया है। सबसे ज्यादा असर छोटे और सीमांत किसानों पर पड़ रहा है, जिनकी आर्थिक स्थिति पहले से ही दबाव में है। खेती की लागत बढ़ने की सबसे बड़ी वजह खाद की सीमित उपलब्धता और बढ़ती कीमतें बताई जा रही हैं।



किसानों को डीएपी, यूरिया, पोटाश और सुपर फॉस्फेट जैसी जरूरी खाद समय पर पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल रही है। सहकारी समितियों में सीमित स्टॉक होने के कारण कई किसानों को निजी बाजार का रुख करना पड़ रहा है, जहां उन्हें अधिक कीमत चुकानी पड़ रही है। इससे खेती का बजट पूरी तरह प्रभावित हो रहा है।



डीजल की बढ़ी कीमतें :

डीजल की बढ़ती कीमतों का असर भी खेती पर साफ दिखाई दे रहा है। ट्रैक्टर से जुताई, खेत की तैयारी और अन्य कृषि कार्यों में डीजल की बड़ी भूमिका होती है। ईंधन महंगा होने से मशीनों का संचालन खर्च बढ़ गया है, जिसका सीधा बोझ किसानों पर पड़ रहा है। इसके साथ ही मजदूरी दरों में भी वृद्धि हुई है।



रोपाई और निराई-गुड़ाई जैसे कार्यों में श्रमिकों की मांग बढ़ने और महंगाई के कारण मजदूरी पहले की तुलना में काफी ज्यादा हो गई है। कई क्षेत्रों में किसानों का कहना है कि रोपाई-निराई का खर्च लगभग दोगुना हो गया है, जिससे कुल लागत और बढ़ गई है।



खरीफ सीजन में बढ़ी खेती की लागत


इस तरह बढ़ा खर्च :

आंकड़ों के अनुसार पिछले साल के मुकाबले इस साल की तुलना ज्यादा हो गया है। जुताई का खर्च करीब 4,500 रूपए से बढ़कर 5,000 रूपए, बीज 1,500 रूपए से बढ़कर 1,700 रूपए, रोपाई-निंदाई 5,000 रूपए से बढ़कर 10,000 रूपए, खाद पर खर्च 2,500 रूपए से बढ़कर 3,300 रूपए, कीटनाशकों पर 6,000 रूपए से बढ़कर 6,500 रूपए और कटाई-मजदूरी 5,500 रूपए से बढ़कर 7,500 रूपए तक पहुंच गई है। कुल लागत 2025 में 23 हजार से 25 हजार रुपए तक थी वो अब बढ़कर 34 हजार से 35 हजार तक पहुंच गई है।



मौसम की मार :

मौसम को लेकर भी किसानों की चिंता कम नहीं हुई है। अलनीनो के संभावित प्रभाव और मानसून की अनिश्चितता को देखते हुए किसान पहले से ही सतर्क हैं। यदि समय पर पर्याप्त बारिश नहीं हुई तो सिंचाई पर अतिरिक्त खर्च बढ़ेगा, जिससे खेती और महंगी हो जाएगी। किसानों का कहना है कि लगातार बढ़ती लागत और सीमित सरकारी सहायता के बीच खेती की खेती फायदे का सौदा नहीं बन पा रही है।



किसान कहते हैं कि यदि खाद की उपलब्धता में सुधार नहीं हुआ और लागत पर नियंत्रण के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो इसका असर न केवल किसानों की आय पर पड़ेगा बल्कि कृषि उत्पादन पर भी दिखाई दे सकता है। खरीफ सीजन की शुरुआत से पहले बढ़ती लागत ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है और वे राहत के लिए सरकार की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं।



निष्कर्ष :

1 करोड़ किसानों पर सीधा असर :

इस महंगाई का सीधा असर वैसे तो पूरे देश के किसानों पर पड़ा है लेकिन हम उन तीन राज्यों की बात कर रहे हैं जहां पर कृषि आधारित अर्थव्यवस्था है। मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में करीब 2 करोड़ किसान हैं। इनमें अधिकांश सीमांत कृषक हैं यानी 1 से पांच एकड़ तक के किसान हैं। मध्यप्रदेश में करीब 80 लाख से 1 करोड़ किसान हैं।



छत्तीसगढ़ में 30 लाख किसान हैं जबकि राजस्थान में किसानों की संख्या 60 से 70 लाख है। यानी कुल मिलाकर सीमांत कृषकों की संख्या तीनों राज्यों में 1 करोड़ है। बड़े किसान तो इस महंगाई की मार को सह लेंगे लेकिन इन छोटे किसानों का इस महंगाई में क्या होगा क्योंकि 10 हजार रुपए एकड़ का अतिरिक्त खर्च इनके लिए बहुत ज्यादा है।



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