छत्तीसगढ़ सरकार ने कटवाए सवा 2 लाख पेड़, 4 साल में लोहा और कोयले के लिए चलाई आरी

Arun Tiwari | Sept 03, 2026, 14:45 IST
माइनिंग और पेड़ों की कटाई से जुड़े जंगल पर रिपोर्ट
छत्तीसगढ़ में पिछले 4 वर्षों में 41 कोयला और लोहा खदानों के लिए सवा 2 लाख से अधिक पेड़ काटे गए। स्थानीय समुदाय और पर्यावरण संगठन इसका लगातार विरोध कर रहे हैं।

RAIPUR: छत्तीसगढ़ में लोहा और कोयला हरे भरे पेड़ों की जान के दुश्मन बने हुए हैं। राज्य सरकार के रिकॉर्ड बताते हैं कि 9 जिलों में लोहा और कोयले की 41 खदानों के लिए 2 लाख से ज्यादा पेड़ कटवा दिए हैं। यह आंकड़ा पिछले 4 साल का है। पेड़ काटने में सरकारी कंपनियां भी शामिल हैं।



यह पेड़ कटाई तब है जबकि सालों से इनका विरोध हो रहा है। इनके अलावा अभी वे पेड़ कटने बाकी हैं जिनकी अनुमति केद्रीय पर्यावरण मंत्रालय दे चुका है। पेड़ लगाने को लेकर सरकार कहती है कि यह काम पेड़ काटने की ऐवज मे नही बल्कि वन भूमि के डायवर्सन पर होता है।



महत्वपूर्ण प्वाइंट्स :

  • लोहा-कोयले की भूख में कटे सवा 2 लाख पेड़, 4 साल में 9 जिलों के जंगलों पर चली आरी
  • जंगल काटकर निकाला कोयला-लोहा, 41 खदानों के लिए पेड़ साफ
  • खनिजों के लिए जंगलों की कुर्बानी
  • जमीन के नीचे खनिज, ऊपर जंगल, लोहा-कोयला निकालने में कटे पेड़
  • 41 खदानें और सवा 2 लाख पेड़, छत्तीसगढ़ में खनन की पर्यावरणीय कीमत

खनिज के लिए जंगलों की कुर्बानी :

छत्तीसगढ़ में खनिज संपदा की कीमत जंगलों को चुकानी पड़ रही है। लोहा और कोयला निकालने के लिए पिछले चार वर्षों में राज्य के 9 जिलों में सवा दो लाख से ज्यादा हरे-भरे पेड़ काट दिए गए। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, लोहा और कोयले की 41 खदानों और उनसे जुड़ी परियोजनाओं के लिए बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई की अनुमति दी गई और पेड़ हटाए गए।



इन परियोजनाओं में सिर्फ निजी कंपनियां ही नहीं, बल्कि एनएमडीसी, एसईसीएल और महाराष्ट्र पॉवर जैसी सरकारी कंपनियां भी शामिल हैं। खास बात यह है कि जिन इलाकों में पेड़ों की कटाई हुई, वहां कई परियोजनाओं को लेकर लंबे समय से स्थानीय लोगों और पर्यावरण संगठनों का विरोध भी होता रहा है। इसके बावजूद खनन परियोजनाओं के लिए जंगलों पर आरी चलती रही।



मामला यहीं खत्म नहीं होता। अभी भी कई ऐसे जंगल और पेड़ हैं, जिनकी कटाई होना बाकी है। इन परियोजनाओं के लिए केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से मंजूरी मिल चुकी है। यानी आने वाले समय में खनन परियोजनाओं के विस्तार के साथ जंगलों पर दबाव और बढ़ सकता है।



राज्य में लोहा और कोयला खनन को विकास और औद्योगिक जरूरतों से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन इसका दूसरा पहलू पर्यावरण के सामने बड़ी चुनौती के रूप में मौजूद है। खदानों के लिए जंगल साफ होने से केवल पेड़ों की संख्या कम नहीं होती, बल्कि वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास, स्थानीय जैव विविधता और जंगलों पर निर्भर लोगों की आजीविका भी प्रभावित होती है। इन चार सालों में



छत्तीसगढ़ में कटे गए पेड़ों की संख्या


इन जिलों में इतने पेड़ कटे :

  • चार सालों में 2 लाख 33 हजार 237 पेड़ काटने की मंजूरी
  • इस दौरान 1 लाख 95 हजार 292 पेड़ कट चुके
  • कोरबा में 17 खदानों के लिए 19150 पेड़ कटे,यहां एनटीपीसी,एसईसीएल के प्रोजेक्ट
  • रायगढ़ की 7 खदानों के लिए 69525 पेड़ काटने की अनुमति है जिसमें से 51851 पेड़ काटे जा चुके हैं। यहां जिंदल और महाराष्ट्र पॉवर कंपनी की कोयला खदानें हैं।
  • दंतेवाड़ा में एनएमडीसी की 4 खदानों के लिए 21699 पेड़ कटने हैं जिनमें से 15481 पेड़ काटे जा चुके हैं।
  • बीजापुर में एक खदान के लिए 341 पेड़ कटे।
  • कांकेर में लोहे की तीन खदानों के लिए 21297 पेड़ कटने हैं जिनमें से 9952 पेड़ काटे जा चुके हैं।
  • नारायणपुर में लोहे की तीन खदानों के लिए 20491 पेड़ कटने हैं जिनमें से 17836 पेड़ काटे जा चुके हैं।
  • रायपुर में टेक्सटाइल उद्योग के लिए 128 पेड़ काटे गए।
  • सरगुजा में कोयले की 7 खदानों के लिए 73941 पेड़ कटने हैं जिनमें से 73888 पेड़ कट चुके हैं। यहां पर परसा ईस्ट केते बासन और परसा कोल परियोनाएं हैं।
  • सूरजपुर में कोयले की तीन परियोजनाओं के लिए 6665 पेड़ काटे जा चुके हैं।

जान की कीमत पर विकास :

पेड़ों की कटाई के बदले पौधरोपण और नए जंगल विकसित करने के सवाल पर सरकार का कहना है कि पेड़ लगाने की प्रक्रिया सीधे तौर पर काटे गए हर पेड़ के बदले एक पौधा लगाने से जुड़ी नहीं है। सरकार के अनुसार क्षतिपूरक वनीकरण की व्यवस्था मुख्य रूप से वन भूमि के डायवर्सन के आधार पर होती है।



यानी किसी परियोजना के लिए जितनी वन भूमि दूसरे उपयोग में ली जाती है, उसके बदले निर्धारित नियमों के तहत क्षतिपूरक वनीकरण कराया जाता है। सरकार इसे केवल पेड़ों की संख्या के आधार पर होने वाली भरपाई नहीं मानती। छत्तीसगढ़ में कई खनन परियोजनाओं को लेकर स्थानीय स्तर पर लंबे समय से विरोध होता रहा है।



जंगलों पर निर्भर आदिवासी और ग्रामीण समुदायों के लिए ये वन केवल पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि आजीविका और जीवन का आधार हैं। ऐसे में खनन के लिए होने वाली कटाई का मुद्दा बार-बार राजनीतिक और सामाजिक बहस के केंद्र में आता रहा है।



सरकारी रिकॉर्ड में सामने आए चार साल में सवा दो लाख से ज्यादा पेड़ों की कटाई के आंकड़े ने एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। खनिज संपदा से विकास की रफ्तार तो बढ़ रही है, लेकिन इसकी पर्यावरणीय कीमत आखिर कितनी भारी पड़ रही है।



यह खबरें भी पढ़ें...

पौधरोपण घोटाले में सीबीआई जांच की मांग, कोर्ट ने सरकार से मांगा जवाब



वन मंत्री के घर में 17 करोड़ का पौधरोपण घोटाला, जानिए कैसे दबाने में जुटा विभाग



वन मंत्री के घर में बड़ा पौधरोपण घोटाला, अफसरों ने हरियाली बढ़ाने के नाम पर 18 करोड़ का कर दिया खेल



छत्तीसगढ़ पौधरोपण घोटाला | दो घंटे के पौधरोपण में 22 लाख स्वाहा, बाद में उन्हीं पौधों पर खर्चे 04 लाख !



Tags:
  • छत्तीसगढ़
  • पर्यावरण
  • पौधरोपण
  • खनिज संपदा