बिना नियम माननीय चला रहे फोन, भुगतान पर घमासान, सीएम सचिवालय में मंथन
समझें क्या है पूरा मामला
- हर मंत्री को हर महीने 10 हजार रुपए टेलीफोन भत्ता मिलता है।
- भत्ता लेने के बाद भी सरकारी खजाने से फोन बिल जमा करवा रहे।
- ट्रेजरी ने बिना नियम और बजट मद भुगतान पर आपत्ति लगाई।
- GAD और गृह विभाग में जिम्मेदारी को लेकर विवाद गहराया।
- पुराने लाखों के भुगतान की वैधता पर गंभीर सवाल उठे रहे हैं।
- CM सचिवालय में नई व्यवस्था और बजट मद पर मंथन जारी।
छत्तीसगढ़ सरकार में वर्षों से एक ऐसा खेल चलता रहा, जिस पर अब ट्रेजरी ने सवालों की मुहर लगा दी है। मंत्रियों को हर महीने 10 हजार रुपए टेलीफोन भत्ते के रूप में दिए जाते हैं ताकि वे अपने फोन खर्च का भुगतान कर सकें। लेकिन हैरानी की बात यह है कि मंत्री यह भत्ता तो चुपचाप अपनी जेब में रख लेते हैं। दूसरी ओर उनके सरकारी बंगलों के टेलीफोन बिल सरकारी खजाने से भर दिए जाते हैं। यानी एक ही सुविधा का दोहरा लाभ। अब ट्रेजरी ने पूछा है कि आखिर यह भुगतान किस नियम और किस बजट मद से किया जा रहा है?
ट्रेजरी ने रोका भुगतान
पूरा मामला तब सामने आया जब मंत्रालय में टेलीफोन व्यवस्था में बदलाव के दौरान नए बिल भुगतान की प्रक्रिया शुरू हुई। सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) ने पहले की तरह बिल भुगतान के लिए फाइल ट्रेजरी भेजी, लेकिन इस बार ट्रेजरी अधिकारियों ने फाइल रोक दी। अधिकारियों ने स्पष्ट पूछा कि आखिर किस शासकीय आदेश के आधार पर यह भुगतान किया जा रहा है? जब विभाग कोई स्पष्ट आदेश या वित्तीय प्रावधान नहीं दिखा सका तो भुगतान पर आपत्ति दर्ज कर दी गई। इसके बाद वर्षों से चली आ रही व्यवस्था अचानक सवालों के घेरे में आ गई।
10 हजार का भत्ता फिर किसलिए?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि मंत्रियों को पहले से ही हर महीने 10 हजार रुपए टेलीफोन भत्ता दिया जा रहा है तो फिर सरकारी बंगलों के फोन बिल का भुगतान अलग से क्यों किया जा रहा है? वित्तीय नियमों के जानकारों का कहना है कि किसी भी सुविधा के लिए यदि अलग से भत्ता दिया जा रहा है तो उसी मद का खर्च उसी भत्ते से किया जाना चाहिए। ऐसे में सरकारी खजाने से दोबारा भुगतान वित्तीय अनुशासन पर गंभीर सवाल खड़े करता है। यही कारण है कि ऑडिट ने भी इस व्यवस्था पर आपत्ति दर्ज की है।
GAD और गृह विभाग में जिम्मेदारी का पेंच
मामला सामने आने के बाद अब सामान्य प्रशासन विभाग और गृह विभाग के बीच जिम्मेदारी को लेकर खींचतान शुरू हो गई है। गृह विभाग मंत्री आवासों का आवंटन करता है, लेकिन फोन बिल का भुगतान अपनी जिम्मेदारी मानने को तैयार नहीं है। दूसरी ओर सामान्य प्रशासन विभाग यह नहीं बता पा रहा कि बिना किसी लिखित आदेश के आखिर वर्षों से भुगतान किस अधिकार से किया जाता रहा। बताया जा रहा है कि पूरी व्यवस्था सिर्फ मौखिक निर्देशों के भरोसे चलती रही, जबकि इसके लिए कभी अलग बजट मद भी निर्धारित नहीं की गई।
बिजली-पानी का मद तय, फोन का नहीं
सरकारी व्यवस्था में मंत्री बंगलों के लगभग हर खर्च के लिए अलग विभाग और अलग बजट निर्धारित है। भवन का रखरखाव और बिजली बिल लोक निर्माण विभाग वहन करता है। पानी का भुगतान लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग करता है। आवास आवंटन की जिम्मेदारी गृह विभाग के पास है। लेकिन टेलीफोन बिल के लिए न कोई अधिकृत बजट मद तय है और न ही कोई स्पष्ट शासनादेश। इसके बावजूद वर्षों से सामान्य प्रशासन विभाग के माध्यम से भुगतान होता रहा। अब यही सबसे बड़ा विवाद बन गया है।
पुराने लाखों के बिलों का हिसाब कौन देगा?
ट्रेजरी की आपत्ति के बाद अब सबसे बड़ी चिंता पुराने भुगतानों को लेकर है। यदि यह व्यवस्था नियमों के अनुरूप नहीं थी तो अब तक सरकारी खजाने से जमा किए गए लाखों रुपए के टेलीफोन बिलों की जवाबदेही कौन तय करेगा? क्या उन अधिकारियों से जवाब मांगा जाएगा जिन्होंने बिना वैधानिक आधार के भुगतान किए या फिर पूरा मामला किसी नए आदेश के जरिए वैध बनाने की कोशिश होगी? मंत्रालय में यही सबसे बड़ा सवाल बन चुका है।
CM सचिवालय में मंथन, रास्ता तलाश रही सरकार
पूरा मामला अब मुख्यमंत्री सचिवालय तक पहुंच चुका है। सूत्रों के अनुसार वहां इस बात पर मंथन चल रहा है कि भविष्य में मंत्री बंगलों के टेलीफोन बिल किस विभाग से चुकाए जाएं और इसके लिए अलग बजट मद बनाई जाए या नहीं। साथ ही पुराने भुगतानों को वित्तीय आपत्तियों से बचाने के लिए वैधानिक रास्ता निकालने पर भी विचार हो रहा है। सरकार की कोशिश है कि वर्षों से चली आ रही इस व्यवस्था को कानूनी आधार देकर विवाद को शांत किया जाए।
सुविधा या सरकारी खजाने पर दोहरी मार?
पूरा विवाद सिर्फ टेलीफोन बिल का नहीं, बल्कि सरकारी धन के उपयोग की पारदर्शिता का है। जब मंत्री पहले से टेलीफोन भत्ता ले रहे हैं तो फिर उसी मद का खर्च सरकारी खजाने से क्यों उठाया गया? यदि यह व्यवस्था गलत थी तो इतने वर्षों तक किसी ने सवाल क्यों नहीं उठाया? और यदि सही थी तो उसका लिखित आदेश और बजट मद कहां है? ट्रेजरी की एक आपत्ति ने सरकार की ऐसी व्यवस्था को बेनकाब कर दिया है, जो राज्य गठन के बाद से बिना किसी स्पष्ट नियम के चलती रही। अब नजर मुख्यमंत्री सचिवालय के फैसले पर है कि इस 'डबल बेनिफिट' का हिसाब कैसे तय होता है।
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