छत्तीसगढ़ मंत्रालय में 27 का डोसा मिलेगा 100 रूपए में, सरकार ने खत्म की डेढ़ करोड़ की सब्सिडी
छत्तीसगढ़ मंत्रालय में अब 27 रूपए का डोसा लगभग 100 रूपए का मिलेगा, इसके अलावा सभी खाने-पीने के सामान दोगुने से अधिक कीमत पर मिलेगा। सरकार की यह व्यवस्था 1 मई से लागू हो जाएगी। इसके पीछे का कारण सरकार ने इंडियन कॉफी हाउस का एग्रीमेंट बढ़ाने से इनकार कर दिया है। इसके साथ ही मंत्रालय की कैंटीन से ICH पैकअप हो गया है। सिर्फ कैंटीन ही नहीं, अब मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव की पर्सनल पेंट्री तक उसकी सप्लाई बंद हो जाएगी। इसके साथ ही सवाल यह उठ रहा है कि यह बदलाव सुधार है या कर्मचारियों पर नया बोझ?
करीब ढाई दशक से काम
मंत्रालय की कैंटीन पर इंडियन कॉफी हाउस का टेंडर करीब ढाई दशक से ज्यादा समय तक रहा। 2012 में जब नया मंत्रालय बना, तब भी एग्रीमेंट आगे बढ़ा दिया गया। हर तीन साल में रिन्यूअल होता रहा। लेकिन अब 1 मई से रायपुर की “टिप्सी इवेंट्स” कंपनी मंत्रालय स्टाफ और विजिटर्स को नाश्ता-खाना परोसेगी। यह काम उसे तीसरे टेंडर में मिला। इस बार कुल 6 कंपनियों ने भाग लिया।
सरकारी रियायतें मिल रही थीं
पुरानी व्यवस्था में इंडियन कॉफी हाउस को कई तरह की सरकारी रियायतें मिल रही थीं। कैंटीन के लिए एरिया फ्री, बिजली फ्री। बदले में कर्मचारियों को आधे से भी कम कीमत पर नाश्ता-खाना मिलता था। लेकिन यह ‘सस्ता खाना’ पूरी तरह मुफ्त नहीं था। सरकार हर महीने औसतन 10 से 12 लाख रुपए का भुगतान करती थी। यह राशि मीटिंग्स, कॉन्फ्रेंस और सरकारी आयोजनों के चाय-नाश्ते और खाने के बिल के रूप में जाती थी। यानी सब्सिडी सीधे सिस्टम को सपोर्ट कर रही थी।
फिर अचानक यह पूरा ढांचा क्यों हिला?
इस कहानी में एक बड़ा ट्विस्ट है, दरअसल छत्तीसगढ़ मंत्रालयीन कर्मचारी संघ के पदाधिकारियों ने इंडियन कॉफी हाउस के खिलाफ मुख्य सचिव से शिकायत की। आरोप लगे कि व्यवस्था ठीक नहीं है, गुणवत्ता गिर रही है और नियमों का पालन नहीं हो रहा। संघ की घोषणा पत्र में भी उचित कीमत पर नया ओपन टेंडर करवाने का वादा शामिल था। मुख्य सचिव ने भी सख्ती दिखाई और इंडियन कॉफी हाउस को व्यवस्था सुधारने की हिदायत दी।
पूरा सिस्टम ही बदल गया
कुछ ही दिनों बाद मंत्रालय कैंटीन के लिए नया टेंडर निकाल दिया गया। और सबसे बड़ा फैसला कि सरकार ने सब्सिडी देने का नियम ही खत्म कर दिया। नए नियमों के तहत इंडियन कॉफी हाउस ने टेंडर में हिस्सा ही नहीं लिया।
सरकारी तर्कः व्यवस्था में सुधार
सरकार के अधिकारी इस फैसले को “व्यवस्था में सुधार” बता रहे हैं। उनका तर्क है कि जब केंद्र सरकार ने संसद में सब्सिडी रेट पर भोजन की व्यवस्था खत्म कर दी, तो राज्य सरकार क्यों पीछे रहे? यानी केंद्र की तर्ज पर राज्य ने भी सब्सिडी मॉडल को अलविदा कह दिया।
लेकिन इस तर्क में एक बड़ा सवाल
मंत्रालय के अधिकारी और बड़े अफसरों के खाने-पीने का भुगतान तो शासन करेगा। उनके लिए यह बदलाव महज ‘प्रक्रियात्मक’ है। असली असर किस पर पड़ेगा? मंत्रालय के कर्मचारियों और रोज आने वाले विजिटर्स पर। अब उन्हें बाजार दर पर नाश्ता-खाना लेना होगा।
नई कंपनी के सामने चुनौतियां
टिप्सी इवेंट्स के सामने भी चुनौती कम नहीं है। बिना किसी सब्सिडी के उसे न सिर्फ गुणवत्ता बनाए रखनी होगी, बल्कि कीमतों को भी संतुलित रखना होगा। पूरे घटनाक्रम में सबसे दिलचस्प मोड़ यह है कि जिस कर्मचारी संघ ने शिकायत कर व्यवस्था सुधारने की मांग की थी, उसका दांव उल्टा पड़ गया। न सिर्फ इंडियन कॉफी हाउस बाहर हो गया, बल्कि कर्मचारियों को मिलने वाली सब्सिडी भी खत्म हो गई।
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