मोजो मशरूम फैक्ट्री में बच्चों पर जुल्म, 6 महीने बाद भी संचालक पर FIR नहीं
NEWS IN SHORT
- खरोरा मोजो मशरूम फैक्ट्री में 109 बाल मजदूरों का रेस्क्यू
- 199 दिन बाद भी संचालक विमल चेतान के खिलाफ एफआईआर नहीं
- बच्चों को 3 महीने से 3 साल तक कमरे में बंद रखा गया
- 15 बार प्रयास के बावजूद थाना में एफआईआर दर्ज नहीं हुई
- चाइल्ड लेबर कोर्ट में मामला, दोबारा दोष पाए जाने पर दंड बढ़ेगा
NEWS IN DETAIL
Raipur : खरोरा स्थित मोजो मशरूम फैक्ट्री से 109 बाल मजदूरों के रेस्क्यू के बावजूद अब तक पुलिस ने संचालक विमल चेतान के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं की है। 199 दिन बीत चुके हैं और मामले में प्रशासन और संचालक के बीच सांठगांठ की अटकलें तेज हो गई हैं।
बाल मजदूरों का रेस्क्यू और हालात
महिला बाल विकास विभाग और दिल्ली मानवाधिकार आयोग की टीम ने फैक्ट्री में छापा मारकर बच्चों को मुक्त कराया। इनमें 14 लड़के और 12 लड़कियां नाबालिग पाई गईं। कुल मिलाकर 68 लड़कियां और 41 लड़के विभिन्न राज्यों जैसे असम, पश्चिम बंगाल, झारखंड, ओडिशा, यूपी और एमपी से थे। कुछ बच्चे स्थानीय गांवों के भी थे।
सुरक्षा अधिकारी ने बताया कि बच्चे तीन महीने से तीन साल तक बंद कमरे में रखे जाते थे। एक कमरे में 10-15 बच्चों को ठूंस-ठूंस कर रखा जाता और उनके साथ मारपीट व लड़कियों से छेड़छाड़ होती थी। कई बच्चे पहले भी इसी फैक्ट्री से छुड़ाए गए थे।
पुलिस की कार्रवाई पर सवाल
खरोरा थाना प्रभारी कृष्णकुमार कुशवाहा का कहना है कि जांच में कोई आपराधिक घटना नहीं मिली। उन्होंने बताया कि 105 बालिग और 4 नाबालिग बच्चे मिले थे। हालांकि, महिला बाल विकास विभाग की टीम का कहना है कि बच्चे गंभीर मानसिक और शारीरिक दबाव में काम कर रहे थे।
15 बार से अधिक प्रयासों के बावजूद एफआईआर दर्ज नहीं हुई। थाना प्रभारी बार-बार कहते रहे कि मामला एएसआई देख रहे हैं, जबकि एएसआई अक्सर मौजूद नहीं रहते।
पिछले मामले की अनदेखी
संचालक और ठेकेदार ने नवंबर 2025 में भी इसी तरह की घटना को अंजाम दिया था, जिसमें 97 मजदूरों को मुक्त कराया गया था। उस समय एफआईआर दर्ज हुई थी, लेकिन प्रशासनिक कार्रवाई कमजोर रही। इसी कारण संचालक बिना भय के नाबालिगों को दोबारा काम पर लगा पाए।
कानूनी प्रक्रिया और संभावित दंड
महिला एवं बाल विकास विभाग के अनुसार, यह अपराध दस से अधिक धाराओं के तहत दर्ज किया जा सकता है। श्रम विभाग भी अपराध दर्ज कर सकता है। ग्रामीण एसपी श्वेता श्रीवास्तव ने कहा कि मामले की कानूनी जांच की जा रही है।
जिला अधिकारी श्रम विभाग, देवेंद्र देवांगन ने बताया कि चाइल्ड लेबर कोर्ट में अभियोजन दर्ज है। पहली बार में 20 से 50 हजार रुपए का जुर्माना और 6 माह जेल का प्रावधान है। यदि घटना दोबारा हुई, तो दंड और अधिक बढ़ सकता है।
प्रशासन और सुरक्षा बलों के बीच गड़बड़ी
महिला बाल विकास विभाग के अधिकारी संजय निराला ने कहा कि एफआईआर दर्ज कराने के लिए कम से कम 15 बार खरोरा थाना गए, लेकिन अधिकारी लगातार टालते रहे। कई बार एएसआई अनुपस्थित रहे, और कई बार एक ही दिन में दो बार थाने का दौरा करना पड़ा।
टाइमलाइन
नवंबर 2025 -फैक्ट्री से पहली बार 97 मजदूरों का रेस्क्यू; नाबालिग और महिलाएं शामिल। एफआईआर दर्ज हुई, लेकिन कार्रवाई कमजोर रही।
दिसंबर 2025 -संचालक और ठेकेदार ने बिना डर नाबालिगों से दोबारा काम करवाना शुरू किया।
199 दिन पहले -महिला बाल विकास विभाग, दिल्ली मानवाधिकार आयोग और पुलिस की टीम ने फैक्ट्री में छापा मारा। 109 बाल मजदूर पाए गए, जिनमें 14 लड़के और 12 लड़कियां नाबालिग थे।
जांच के दौरान -बच्चों ने बताया कि उन्हें 3 महीने से 3 साल तक बंद रखा गया। एक कमरे में 10-15 बच्चों को ठूंस कर रखा गया; मारपीट और छेड़छाड़ की घटनाएं सामने आईं।
एफआईआर की स्थिति -15 से अधिक बार खरोरा थाना में एफआईआर दर्ज कराने प्रयास विफल; थाना और एएसआई की लापरवाही सामने आई।
विधिक कार्रवाई -चाइल्ड लेबर कोर्ट में अभियोजन दर्ज पहली बार जुर्माना 20–50 हजार रुपए और 6 माह जेल। दोबारा दोष पाए जाने पर दंड बढ़ेगा।
वर्तमान स्थिति -199 दिन बाद भी संचालक के खिलाफ एफआईआर नहीं प्रशासन और संचालक के बीच सांठगांठ की अटकलें।
निष्कर्ष
खरोरा मोजो मशरूम फैक्ट्री का यह मामला बाल श्रम और प्रशासनिक लापरवाही का प्रतीक बन गया है। नाबालिगों के अधिकारों की अनदेखी और एफआईआर की देरी गंभीर सवाल खड़े करती है। अब यह देखना होगा कि प्रशासन मामले में सख्त कार्रवाई कर पाएगा या संचालक और ठेकेदार की सांठगांठ जारी रहेगी।
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