जमीन के नीचे दबा नक्सलियों का सोना, हाईटेक तकनीक से होगी खजाने की खोज
NEWS IN SHORT
- नक्सलियों ने 80-100 करोड़ की लेवी वसूली
- 15-25 करोड़ रुपए की बरामदगी हुई
- लेवी के पैसे जमीन में गाड़े गए
- सोना सुरक्षित विकल्प बन गया
- विशेष तकनीकों से तलाश जारी
NEWS IN DETAIL
छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में सक्रिय माओवादियों के वित्तीय नेटवर्क को लेकर सुरक्षा एजेंसियों ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया है। खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, दशकों से बस्तर के जंगलों में समानांतर सरकार चलाने का दावा करने वाले नक्सलियों ने लेवी (जबरन वसूली) के जरिए लगभग 1,000 करोड़ रुपए का विशाल कोष इकट्ठा कर लिया है। सुरक्षा बलों के लिए अब सबसे बड़ी चुनौती इस छिपे हुए खजाने को ढूंढना और नक्सलियों की आर्थिक कमर तोड़ना है।
लेवी का बड़ा खेल और बरामदगी का अंतर
सुरक्षा एजेंसियों द्वारा जारी हालिया आंकड़ों के मुताबिक, नक्सली हर साल बस्तर के विभिन्न इलाकों से 80 से 100 करोड़ रुपए की लेवी वसूलते हैं। यह वसूली मुख्य रूप से सड़क निर्माण के ठेकेदारों, तेंदूपत्ता व्यापारियों, खदान संचालकों और स्थानीय व्यवसायों से की जाती है। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में चलाए गए बड़े सर्च ऑपरेशनों के दौरान सुरक्षा बलों के हाथ केवल 15 से 25 करोड़ रुपए ही लगे हैं। राजस्व वसूली और बरामदगी के बीच का यह भारी अंतर सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ा रहा है।
जमीन के नीचे छिपी है रकम
बस्तर के आईजी सुंदरराज पी. के नेतृत्व में एक विशेष जांच टीम (SIT) इस वित्तीय जाल की पड़ताल कर रही है। आत्मसमर्पण कर चुके नक्सलियों और पकड़े गए कैडरों से पूछताछ में यह बात सामने आई है कि लेवी की बड़ी रकम को प्लास्टिक के ड्रमों में भरकर जंगलों में जमीन के नीचे गाड़ दिया गया है।
जांच में पता चला है कि इन 'नोटों के भंडार' के ठिकाने की जानकारी केवल कुछ चुनिंदा शीर्ष कमांडरों को ही होती है। इसके लिए विशेष कोड और गुप्त नक्शों का उपयोग किया जाता है। अब सुरक्षा बल जीपीआर (ग्राउंड पेनिट्रेटिंग राडार) और इंटेलिजेंस मैपिंग जैसी आधुनिक तकनीकों का सहारा ले रहे हैं ताकि जमीन के भीतर छिपे इन ड्रमों का पता लगाया जा सके।
निवेश के नए ठिकाने: सोना और रियल एस्टेट
नोटबंदी के बाद नक्सलियों ने अपनी निवेश रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। अब वे नकदी के बजाय सोने को सुरक्षित विकल्प मान रहे हैं। हाल ही में बीजापुर और जगदलपुर में हुई छापेमारी में 8 किलो सोना बरामद किया गया है, जिसकी बाजार कीमत लगभग 6.5 से 7 करोड़ रुपए आंकी गई है।
इसके साथ ही, एजेंसियों को अंदेशा है कि लेवी का एक बड़ा हिस्सा शहरी क्षेत्रों में बेनामी संपत्तियों और रियल एस्टेट में खपाया गया है। नक्सलियों के कोरियर और मददगारों के जरिए यह पैसा शहरों तक पहुंच रहा है, जिसका इस्तेमाल आधुनिक हथियार, वर्दी, दवाइयां और राशन खरीदने में किया जाता है।
निष्कर्ष
बस्तर में जारी यह अभियान केवल हथियारों की लड़ाई नहीं, बल्कि एक आर्थिक युद्ध भी है। यदि सुरक्षा एजेंसियां नक्सलियों के इस 1000 करोड़ के वित्तीय ढांचे को ध्वस्त करने में सफल रहती हैं, तो यह क्षेत्र में माओवाद के खात्मे की दिशा में सबसे निर्णायक कदम साबित होगा।
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