जिस कोल माइंस का आदिवासी कर रहे विरोध, उसे एनजीटी ने दी मंजूरी, कहा बड़ी आबादी के फायदे को मिलनी चाहिए प्राथमिकता
RAIPUR : छत्तीसगढ़ की कोल माइंस का आदिवासी लंबे समय से विरोध कर रहे हैं। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने गारे पेलमा सेक्टर टू कोल माइन प्रोजेक्ट की पर्यावरण की मंजूरी को बरकरार रखा है। एनजीटी की बेंच रायगढ़ जिले की इस परियोजना को 13 अगस्त 2024 को दी गई पर्यावरण मंजूरी के खिलाफ स्थानीय निवासियों की अपील पर सुनवाई कर रही थी। एनजीटी ने कहा कि इस कोयले का राष्ट्रीय महत्व है। इस समय दुनिया ग्लोबल वॉर से गुजर रही है। ऐसे में यह देश के उर्जा संकट से निपटने के लिए जरुरी है। गारे पेलमा कोल माइन की क्षमता हर साल 23.6 मिलियन टन उत्पादन करने की है।
यह है NGT का आदेश :
एनजीटी ने इस संबध में 17 अप्रैल को आदेश दिया। एनजीटी ने कहा कि यह परियोजना ऊर्जा क्षेत्र से जुड़ी है। देश और दुनिया रुस-यूक्रेन वॉर और मिडिल ईस्ट के युद्ध के कारण संकट का सामना कर रहे हैं। देश और राज्य को ऊर्जा पर निर्भर रहना पड़ता है। इसलिए यह परियोजना राष्ट्रीय महत्व की है। प्रक्रिया या आदेश में किसी भी प्रकार की अवैधता या अनियमितता नहीं पाई गई है। रायगढ़ जिले की इस परियोजना को 13 अगस्त 2024 को दी गई पर्यावरण मंजूरी के खिलाफ स्थानीय निवासियों ने एनजीटी में अपील की थी।
विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन जरूरी :
NGT ने अपने फैसले में यह भी कहा कि किसी भी विकास कार्य के साथ पर्यावरण पर कुछ न कुछ असर पड़ना स्वाभाविक है। लेकिन सार्वजनिक हित की परियोजनाओं को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता। अदालत ने कहा कि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है। ट्रिब्यूनल ने कहा कि बड़ी आबादी को मिलने वाले लाभ को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
जबकि प्रभावित होने वाले सीमित लोगों की समस्याओं का समाधान उचित उपायों के जरिए किया जाना चाहिए। NGT ने अपने आदेश में कहा कि भारत एक ओर नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा दे रहा है। वहीं दूसरी ओर ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए कोयले का उपयोग भी बढ़ा रहा है। गारे पेल्मा प्रोजेक्ट इसी रणनीति का हिस्सा है।
क्या है विवाद :
इस मामले में स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया था कि परियोजना को दी गई नई पर्यावरणीय मंजूरी NGT के 15 जनवरी 2024 के आदेश का उल्लंघन है। उस आदेश में पहले की मंजूरी को रद्द करते हुए नई जनसुनवाई और पर्यावरणीय प्रभावों के फिर से मूल्यांकन करने के निर्देश दिए गए थे। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि नई मंजूरी देते समय जल संसाधनों, स्वास्थ्य प्रभावों और पर्यावरणीय भार जैसे मुद्दों को सही तरीके से नहीं देखा गया।
साथ ही नई जनसुनवाई भी नहीं कराई गई। ट्रिब्यूनल ने विस्तृत अध्ययन और विशेषज्ञ रिपोर्टों का विश्लेषण करने के बाद पाया कि परियोजना का दोबारा मूल्यांकन किया गया है और पहले की कमियों को दूर किया गया है। NGT ने माना कि जल स्रोतों के आसपास बफर जोन बनाए जाएंगे और आधुनिक खनन तकनीकों का इस्तेमाल किया जाएगा ताकि पर्यावरण नुकसान को कम किया जा सके।
यह खदान किसकी है :
यह खदान महाराष्ट्र सरकार की बिजली कंपनी को आवंटित है। यानी खदान की मालिक महाराष्ट्र सरकार की बिजली कंपनी है। खदान को चलाने एमडीओ अडानी ग्रुप है। माइन डेवलपर एंड ऑपरेटर को एमडीओ कहते हैं। यह बड़ा कोयला खदान प्रोजेक्ट है। जो छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले (तमनार क्षेत्र) में स्थित है।
यह भारत की बड़ी कोयला खदानों में से एक है। इसकी उत्पादन क्षमता लगभग 23.6 मिलियन टन सालाना है। इसमें सैकड़ों मिलियन टन कोयले का भंडार मौजूद है। यह प्रोजेक्ट सीधे बिजली उत्पादन से जुड़ा है। इससे हजारों मेगावाट बिजली बनेगी। आयात कम होगा और देश की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी। इसलिए एनजीटी ने इसे राष्ट्रीय महत्व का बताया है।
आदिवासियों का विरोध :
आदिवासियों का विरोध इसलिए क्योंकि इससे न सिर्फ पर्यावरण प्रभावित होगा बल्कि उनकी आजीविका और अस्तित्व का संकट पैदा हो जाएगा। इससे आधा दर्जन से जयादा गांव सीधे तौर पर प्रभावित होते हैं। इनमें सारसमाल,गारे,धूरा,धुरुमपाली,झिंकीपाली और कोडकेला जैसे गांव शामिल हैं।
छत्तीसगढ़ में कोयला खनन के लिए बड़े पैमाने पर जमीन साफ करनी पड़ती है। इस प्रोजेक्ट में सैकड़ों हेक्टेयर जमीन उपयोग में आती है जिसमें वन भूमि भी शामिल है। इससे लाखों पेड़ भी काटे जाएंगे। इसका सीधा असर न सिर्फ वन्य जीवों पर पड़ेगा बल्कि पानी और खेती पर भी बुरा प्रभाव पड़ेगा। यही कारण है सिर्फ यही नहीं छत्तीसगढ़ में चल रहे सभी कोल माइंस प्रोजेक्ट का लंबे समय से विरोध हो रहा है।
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