विकास की ओर बढ़ता बस्तर; नियद नेल्ला नार योजना से बदल रही जमीनी तस्वीर, सुदूर गांवों तक पहुंची सरकार
The Sootr | Jan 27, 2026, 14:25 IST
Impact Feature
छत्तीसगढ़ की 'नियद नेल्ला नार योजना' बस्तर के नक्सल प्रभावित गांवों में सुरक्षा, शिक्षा और बुनियादी सुविधाएं पहुंचाकर विकास की नई इबारत लिख रही है।
Raipur. कभी बस्तर का नाम सुनते ही लोगों के मन में डर,हिंसा और पिछड़ेपन की तस्वीर उभरती थी। कई ऐसे गांव थे,जहां सरकारी योजनाएं कागजों में ही दिखाई देती थीं। सड़क,बिजली,स्कूल,अस्पताल और मोबाइल नेटवर्क जैसी सुविधाएं यहां के लोगों के लिए किसी सपने से कम नहीं थीं। कई परिवार डर और असुरक्षा के कारण अपने गांव छोड़ने को मजबूर थे।
अब तस्वीर बदल रही है। बस्तर धीरे-धीरे नई पहचान बना रहा है। इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह बनी है छत्तीसगढ़ सरकार की महत्वाकांक्षी'नियद नेल्ला नार योजना'। स्थानीय गोंडी और हलबी बोली में इसका अर्थ होता है-'आपका अच्छा गांव'। इस योजना का मकसद बस्तर अंचल के सबसे दूरस्थ,नक्सल प्रभावित और लंबे समय से उपेक्षित गांवों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ना है।
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में इस योजना को जमीन पर उतारा गया है। सरकार का प्रयास है कि जिन इलाकों में वर्षों से शासन की पहुंच सीमित रही,वहां प्रशासन और विकास दोनों एक साथ पहुंचें।
नियद नेल्ला नार योजना की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें सुरक्षा और विकास को एक साथ आगे बढ़ाया गया है। पहले जहां सुरक्षा बलों और प्रशासन की पहुंच सीमित थी,अब वहां स्थायी उपस्थिति दिखाई देने लगी है।
इस मॉडल की शुरुआत सुरक्षा कैंपों के आसपास 5 किलोमीटर क्षेत्र से हुई थी। अब इसे बढ़ाकर 10 किलोमीटर तक किया गया है। इस विस्तार के बाद अब तक 83 फॉरवर्ड कैंपों के आसपास बसे 430 से ज्यादा गांवों तक सरकारी सेवाएं पहुंचाई जा रही हैं,जिसे बस्तर के इतिहास का सबसे बड़ा सरकारी आउटरीच माना जा रहा है। इससे गांवों में प्रशासन के प्रति भरोसा बढ़ा है और लोगों में सुरक्षा की भावना मजबूत हुई है।
इस योजना के तहत कई विभागों की योजनाएं सीधे गांवों तक पहुंचाई जा रही हैं। इसमें स्वास्थ्य सेवा,स्कूल शिक्षा,आंगनबाड़ी,राशन वितरण,आयुष्मान कार्ड,आधार कार्ड,जाति और निवास प्रमाण पत्र,पेंशन योजना,उज्ज्वला योजना,प्रधानमंत्री आवास,रोजगार योजनाएं और किसान सहायता शामिल हैं।
पहले इन कामों के लिए लोगों को कई किलोमीटर पैदल चलकर ब्लॉक या जिला मुख्यालय जाना पड़ता था। अब मोबाइल टीम और कैंप के जरिए सेवाएं गांव के पास ही मिल रही हैं। इससे लोगों का समय और खर्च दोनों बच रहा है और सरकारी व्यवस्था पर विश्वास बढ़ा है।
सरकार का कहना है कि पिछले कुछ साल बस्तर के लिए बदलाव का समय रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा तय लक्ष्य के अनुसार नक्सलवाद खत्म करने की दिशा में काम तेज हुआ है। राज्य सरकार का कहना है कि विकास और भरोसे के इस मॉडल से नक्सल प्रभावित इलाकों में सरकारी पकड़ मजबूत हुई है और लोगों का रुझान मुख्यधारा की ओर बढ़ा है।
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छत्तीसगढ़ मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में सरकार ने नक्सलियों के पुनर्वास के लिए नई नीति बनाई है। इसके तहत आत्मसमर्पण करने वालों को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत घर,तीन साल तक हर महीने 10 हजार रुपए की सहायता,कौशल प्रशिक्षण और रोजगार के अवसर दिए जा रहे हैं। 'पंडुम कैफे' जैसे प्रयास सामाजिक बदलाव के प्रतीक बने हैं,जहां पूर्व नक्सली सम्मान के साथ काम कर रहे हैं और सामान्य जीवन जी रहे हैं।
योजना के प्रभाव से 430 से ज्यादा गांवों में फिर से आबादी लौट रही है। जहां लोग डर के कारण घर छोड़ चुके थे,वहां अब जीवन वापस आ रहा है। इन इलाकों में सड़कें बन रही हैं,बिजली पहुंच रही है और पेयजल की व्यवस्था हो रही है। स्कूल और स्वास्थ्य केंद्र शुरू हो रहे हैं। कई गांवों में वर्षों बाद तिरंगा फहराया गया है। चुनावों में लोग बिना डर के मतदान कर रहे हैं। मोबाइल नेटवर्क और राशन जैसी सुविधाएं अब आम हो रही हैं।
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बीजापुर जिले के बकनागुलगुड़ा गांव में नया प्राथमिक स्कूल भवन बना है। पहले यहां झोपड़ी में स्कूल चलता था। अब बच्चों को पक्के और सुरक्षित भवन में पढ़ाई का मौका मिल रहा है। इससे बच्चों में पढ़ाई के प्रति रुचि बढ़ी है और अभिभावकों का भरोसा मजबूत हुआ है। यह बदलाव दिखाता है कि दूरस्थ इलाकों में शिक्षा को प्राथमिकता दी जा रही है।
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सुकमा जिले में मनरेगा और मत्स्य पालन योजना के संयुक्त प्रयास से ग्रामीणों की आय बढ़ रही है। करीब 150 आजीविका डबरियां बनाई गई हैं। 30 ग्रामीणों को वैज्ञानिक तरीके से मछली पालन का प्रशिक्षण दिया गया है। इससे खेती मजबूत हुई है और लोगों को गांव में ही रोजगार के अवसर मिल रहे हैं।
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बीजापुर जिले के नम्बी गांव में जल जीवन मिशन के तहत बड़ा बदलाव आया है। यहां करीब 28.18 लाख रुपए की लागत से तीन सौर ऊर्जा आधारित नलकूप लगाए गए हैं। करीब 5185 मीटर पाइपलाइन बिछाकर 76 परिवारों को 'हर घर नल' कनेक्शन दिया गया। इससे गांव में पहली बार नियमित और साफ पेयजल मिलने लगा है।
सरकार ने डिजिटल कनेक्टिविटी पर भी जोर दिया है। कुंडापल्ली और अबूझमाड़ जैसे इलाकों में पहली बार मोबाइल नेटवर्क पहुंचा है। इससे बैंकिंग,ऑनलाइन शिक्षा,टेलीमेडिसिन और सरकारी योजनाओं की जानकारी लोगों तक पहुंच रही है। कई गांवों में पहली बार बिजली पहुंची है। बस सेवा शुरू होने से आवागमन आसान हुआ है।
बस्तर अब विकास के नए केंद्र के रूप में उभर रहा है। कृषि,वनोपज,पशुपालन और छोटे उद्योगों में नई संभावनाएं दिख रही हैं। नई औद्योगिक नीति में नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं।
पर्यटन को उद्योग का दर्जा मिलने से बस्तर की पहचान बढ़ी है। कुटुमसर गुफा,झरने,जंगल और जनजातीय संस्कृति पर्यटकों को आकर्षित कर रहे हैं। 'होम स्टे' मॉडल से ग्रामीणों की आय बढ़ रही है।
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नक्सल प्रभावित इलाकों में अब कई विभागों की दर्जनों योजनाएं लागू की जा रही हैं। विद्यार्थियों को तकनीकी और प्रोफेशनल शिक्षा के लिए ब्याज मुक्त ऋण की सुविधा दी जा रही है। कई गांवों में बाजार फिर से सक्रिय हुए हैं। सड़क,बिजली,राशन दुकान और मोबाइल टावर जैसी सुविधाएं तेजी से बढ़ी हैं। बीजापुर के तर्रेम क्षेत्र में पहला प्रधानमंत्री आवास बनने से पूरे गांव में उम्मीद जगी है। यह केवल घर नहीं,बल्कि विकास की नई शुरुआत का प्रतीक बना है।कुल मिलाकर 'नियद नेल्ला नार' योजना ने दिखाया है कि अगर नीति संवेदनशील हो और क्रियान्वयन मजबूत हो,तो सबसे कठिन इलाकों में भी बदलाव संभव है।RO-13257/9
अब तस्वीर बदल रही है। बस्तर धीरे-धीरे नई पहचान बना रहा है। इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह बनी है छत्तीसगढ़ सरकार की महत्वाकांक्षी'नियद नेल्ला नार योजना'। स्थानीय गोंडी और हलबी बोली में इसका अर्थ होता है-'आपका अच्छा गांव'। इस योजना का मकसद बस्तर अंचल के सबसे दूरस्थ,नक्सल प्रभावित और लंबे समय से उपेक्षित गांवों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ना है।
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में इस योजना को जमीन पर उतारा गया है। सरकार का प्रयास है कि जिन इलाकों में वर्षों से शासन की पहुंच सीमित रही,वहां प्रशासन और विकास दोनों एक साथ पहुंचें।
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सुरक्षा और विकास का मॉडल
इस मॉडल की शुरुआत सुरक्षा कैंपों के आसपास 5 किलोमीटर क्षेत्र से हुई थी। अब इसे बढ़ाकर 10 किलोमीटर तक किया गया है। इस विस्तार के बाद अब तक 83 फॉरवर्ड कैंपों के आसपास बसे 430 से ज्यादा गांवों तक सरकारी सेवाएं पहुंचाई जा रही हैं,जिसे बस्तर के इतिहास का सबसे बड़ा सरकारी आउटरीच माना जा रहा है। इससे गांवों में प्रशासन के प्रति भरोसा बढ़ा है और लोगों में सुरक्षा की भावना मजबूत हुई है।
गांव तक पहुंच रही योजनाएं
पहले इन कामों के लिए लोगों को कई किलोमीटर पैदल चलकर ब्लॉक या जिला मुख्यालय जाना पड़ता था। अब मोबाइल टीम और कैंप के जरिए सेवाएं गांव के पास ही मिल रही हैं। इससे लोगों का समय और खर्च दोनों बच रहा है और सरकारी व्यवस्था पर विश्वास बढ़ा है।
नक्सलवाद के खिलाफ निर्णायक लड़ाई
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आत्मसमर्पण करने वालों के लिए नई जिंदगी
फिर से बस रहे गांव, लौट रही जिंदगी
केस 01: शिक्षा में बदलाव की नई शुरुआत
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बीजापुर जिले के बकनागुलगुड़ा गांव में नया प्राथमिक स्कूल भवन बना है। पहले यहां झोपड़ी में स्कूल चलता था। अब बच्चों को पक्के और सुरक्षित भवन में पढ़ाई का मौका मिल रहा है। इससे बच्चों में पढ़ाई के प्रति रुचि बढ़ी है और अभिभावकों का भरोसा मजबूत हुआ है। यह बदलाव दिखाता है कि दूरस्थ इलाकों में शिक्षा को प्राथमिकता दी जा रही है।
केस 02: आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम
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सुकमा जिले में मनरेगा और मत्स्य पालन योजना के संयुक्त प्रयास से ग्रामीणों की आय बढ़ रही है। करीब 150 आजीविका डबरियां बनाई गई हैं। 30 ग्रामीणों को वैज्ञानिक तरीके से मछली पालन का प्रशिक्षण दिया गया है। इससे खेती मजबूत हुई है और लोगों को गांव में ही रोजगार के अवसर मिल रहे हैं।
केस 03: जल जीवन मिशन से पानी की समस्या खत्म
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बीजापुर जिले के नम्बी गांव में जल जीवन मिशन के तहत बड़ा बदलाव आया है। यहां करीब 28.18 लाख रुपए की लागत से तीन सौर ऊर्जा आधारित नलकूप लगाए गए हैं। करीब 5185 मीटर पाइपलाइन बिछाकर 76 परिवारों को 'हर घर नल' कनेक्शन दिया गया। इससे गांव में पहली बार नियमित और साफ पेयजल मिलने लगा है।
डिजिटल कनेक्टिविटी से बदल रही जिंदगी
पर्यटन संभावनाओं का भी विस्तार
पर्यटन को उद्योग का दर्जा मिलने से बस्तर की पहचान बढ़ी है। कुटुमसर गुफा,झरने,जंगल और जनजातीय संस्कृति पर्यटकों को आकर्षित कर रहे हैं। 'होम स्टे' मॉडल से ग्रामीणों की आय बढ़ रही है।
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योजनाओं का बड़ा विस्तार
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