विशेषज्ञों ने बताए 8 नुस्खे, सरकार मान ले तो स्कूलों की बदल जाएगी तस्वीर

VINAY VERMA | Jun 06, 2026, 19:16 IST
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छत्तीसगढ़ में स्कूल शिक्षा व्यवस्था और गिरते परीक्षा परिणामों को लेकर प्राचार्यों ने सरकार के सामने कई अहम सुझाव और मांगें रखी हैं। रायपुर में हुई प्राचार्य फेडरेशन की मासिक बैठक में 5वीं और 8वीं की नो डिटेंशन पॉलिसी को खत्म करने की मांग उठी।

NEWS IN SHORT:

  • 5वीं-8वीं में नो डिटेंशन खत्म करने की मांग
  • 17 साल से नहीं बदला स्कूलों का स्टाफ सेटअप
  • आत्मानंद स्कूलों में कॉमर्स-आर्ट्स शुरू करने का सुझाव
  • रिटायरमेंट वाले दिन ही भुगतान और PPO की मांग

NEWS IN DETAIL:

छत्तीसगढ़ में स्कूलों के गिरते परिणाम और शिक्षा व्यवस्था की चुनौतियों के बीच प्राचार्यों ने सरकार को आठ बड़े सुझाव दिए हैं। दावा है कि यदि इन पर अमल हुआ तो स्कूलों की व्यवस्था सुधरेगी और पढ़ाई का स्तर भी ऊपर जाएगा। रायपुर में हुई छत्तीसगढ़ प्राचार्य फेडरेशन की मासिक बैठक में शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर लंबी चर्चा हुई। बैठक में कई ऐसे प्रस्ताव सामने आए, जिन्हें सीधे तौर पर स्कूलों के रिजल्ट से जोड़कर देखा जा रहा है।



नो डिटेंशन पर फैसला जरूरी:

बैठक में सबसे प्रमुख मांग 5वीं और 8वीं की परीक्षा से जुड़ी रही। प्राचार्यों ने कहा कि "कोई फेल नहीं होगा" वाली व्यवस्था ने पढ़ाई की गंभीरता कम की है। विद्यार्थियों पर परीक्षा का दबाव नहीं रहता। इसका असर आगे की कक्षाओं में दिखाई देता है। इसलिए नो डिटेंशन पॉलिसी खत्म करने की मांग रखी गई।





Principals Federation meeting


17 साल पुराने ढांचे पर चल रहे स्कूल:

प्राचार्यों ने स्टाफ की कमी को भी बड़ा कारण बताया। उनका कहना है कि स्कूलों में छात्र संख्या लगातार बढ़ी है, लेकिन स्टाफ सेटअप नहीं बदला। वर्ष 2008 के बाद इस दिशा में कोई बड़ा संशोधन नहीं हुआ। नतीजा यह है कि कई स्कूल कम कर्मचारियों के भरोसे चल रहे हैं।



पढ़ाई छोड़ दूसरे कामों में उलझे शिक्षक:

आरएमएसए स्कूलों में लिपिक, भृत्य, स्वीपर और चौकीदार के पद स्वीकृत करने की मांग भी उठी। प्राचार्यों का तर्क है कि सहायक स्टाफ नहीं होने से शिक्षकों और प्राचार्यों पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है। इसका सीधा असर शैक्षणिक गतिविधियों पर पड़ता है।



प्राचार्यों से वापस मांगे गए अधिकार:

बैठक में परीक्षा संचालन को लेकर भी असंतोष दिखा। प्राचार्यों ने कहा कि तिमाही, छमाही और स्थानीय परीक्षाओं के आयोजन का अधिकार पहले की तरह उन्हें दिया जाना चाहिए। इससे स्कूल स्तर पर बेहतर निगरानी और जवाबदेही तय होगी।



आत्मानंद स्कूलों के लिए भी सुझाव:

स्वामी आत्मानंद उत्कृष्ट विद्यालयों को लेकर भी कई प्रस्ताव आए। प्राचार्यों ने मांग की कि प्रधानाध्यापकों को पहले की तरह आकस्मिक मद से 20 हजार रुपए तक खर्च करने का अधिकार मिले। साथ ही सभी आत्मानंद विद्यालयों में वाणिज्य और कला संकाय शुरू किए जाएं ताकि विद्यार्थियों को अधिक विकल्प मिल सकें।



समीक्षा बैठकों का बदले तरीका:

मिशन उत्कर्ष की समीक्षा बैठकों को लेकर भी प्राचार्यों ने अपनी बात रखी। उनका कहना है कि अधिकारियों को केवल समीक्षा करने के बजाय मार्गदर्शक और सहयोगी की भूमिका निभानी चाहिए। इससे स्कूलों की समस्याओं का समाधान तेजी से हो सकेगा।



रिटायरमेंट वाले दिन ही मिले पूरा हक:

बैठक में कर्मचारियों के हितों का मुद्दा भी उठा। मांग की गई कि सेवानिवृत्ति के दिन ही सभी देयकों का भुगतान हो। साथ ही उसी दिन PPO भी जारी किया जाए। इससे कर्मचारियों को दफ्तरों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे।



सरकार के पाले में गेंद:

बैठक के अंत में प्राचार्य फेडरेशन ने सरकार और शिक्षा विभाग से इन सभी मांगों पर जल्द फैसला लेने की अपील की। फेडरेशन का मानना है कि स्कूलों की असली जरूरतों को समझकर निर्णय लिए गए तो सिर्फ व्यवस्था ही नहीं सुधरेगी, बल्कि आने वाले वर्षों में बोर्ड परीक्षाओं के नतीजे भी बेहतर दिखाई देंगे।



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