CGPSC 2003 घोटाला: 23 साल बाद लोक अदालत में समझौते की कोशिश, याचिकाकर्ता बोलीं- कॉम्प्रोमाइज नामंजूर
छत्तीसगढ़ PSC 2003 भर्ती घोटाला में एक बार फिर बड़ा मोड़ आ गया है। इस बहुचर्चित मामले की मुख्य याचिकाकर्ता वर्षा डोंगरे समेत अन्य पक्षकारों को सुप्रीम कोर्ट द्वारा आयोजित विशेष लोक अदालत में उपस्थित होने के लिए नोटिस जारी किया गया है। वर्षों से लंबित इस विवाद में अब समझौते के जरिए समाधान की कोशिश की जा रही है, हालांकि याचिकाकर्ता पक्ष ने साफ कर दिया है कि वे किसी समझौते के पक्ष में नहीं हैं।
क्या है पूरा मामला?
छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (PSC) की वर्ष 2003 भर्ती प्रक्रिया शुरू से ही विवादों में रही। आरोप लगे कि चयन प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर अनियमितताएं हुईं, उत्तर पुस्तिकाओं में अंकों की हेराफेरी की गई और नियमों को दरकिनार कर अपात्र उम्मीदवारों को फायदा पहुंचाया गया।
इस मामले को लेकर वर्ष 2006 में वर्षा डोंगरे ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। लंबी सुनवाई के बाद वर्ष 2017 में हाई कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में भर्ती प्रक्रिया में भ्रष्टाचार और गड़बड़ी को सही माना।
कोर्ट ने माना था कि उत्तर पुस्तिकाओं में नंबर बदले गए। स्केलिंग प्रक्रिया में गड़बड़ी की गई। कम अंक पाने वाले उम्मीदवारों का चयन किया गया। कई अपात्र उम्मीदवारों को इंटरव्यू तक पहुंचाया गया। हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को पूरी चयन सूची संशोधित कर नई मेरिट सूची जारी करने का आदेश दिया था।
सुप्रीम कोर्ट में मामला और स्टे
हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए संजय चंदन त्रिपाठी समेत अन्य चयनित अधिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। प्रारंभिक सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी थी। तब से यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। अब सुप्रीम कोर्ट की विशेष लोक अदालत के जरिए इस विवाद को आपसी सहमति से सुलझाने की पहल की जा रही है। इसी सिलसिले में वर्षा डोंगरे, राज्य सरकार और प्रतिवादी निरुपमा लोनहरे सहित अन्य पक्षकारों को मुंगेली और कबीरधाम जिला विधिक सेवा प्राधिकरण में उपस्थित होने के लिए नोटिस जारी किए गए हैं।
वर्षा डोंगरे ने समझौते से किया इनकार
मुख्य याचिकाकर्ता वर्षा डोंगरे ने स्पष्ट कहा है कि “हाई कोर्ट ने हमारे पक्ष में फैसला दिया था। राज्य सरकार को उस आदेश का पालन करना चाहिए था। इस मामले में समझौते की कोई गुंजाइश नहीं है। अंतिम फैसला सुप्रीम कोर्ट से ही होना चाहिए।”
उन्होंने कहा कि एसीबी जांच में भी बड़े पैमाने पर गड़बड़ी की पुष्टि हुई थी।
किन अधिकारियों पर पड़ा असर?
यदि हाई कोर्ट के आदेश के अनुसार दोबारा स्केलिंग कर नई मेरिट सूची जारी होती, तो दो दर्जन से अधिक अधिकारियों की नियुक्तियां प्रभावित होतीं। इनमें कई ऐसे अधिकारी भी शामिल हैं जो अब वरिष्ठ प्रशासनिक पदों पर पहुंच चुके हैं और कुछ आईएएस तक बन चुके हैं।
हाई कोर्ट और एसीबी रिपोर्ट के अनुसार राजीव सिंह चौहान को सामान्य वर्ग का होने के बावजूद एससी कोटे में लेखाधिकारी नियुक्त किया गया था। कोर्ट ने उन्हें सेवा से हटाने का आदेश दिया था। ऊषा किरण बरई का चयन वर्षा डोंगरे से कम अंक होने के बावजूद हुआ।
सारिका रामटेके, मनोज लारोकर और सुनील कुमार के चयन पर भी सवाल उठे। नेहा पाण्डेय का चयन विवादित बताया गया, जबकि ओबीसी वर्ग से हीरालाल देवांगन का चयन होना चाहिए था। अजय शर्मा की जगह सौदागर सिंह के चयन का भी मामला सामने आया।
इसके अलावा 52 उम्मीदवार ऐसे पाए गए जो इंटरव्यू के लिए पात्र ही नहीं थे, फिर भी चयनित हो गए। 17 पात्र उम्मीदवार चयन सूची से बाहर कर दिए गए।
राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में बढ़ी हलचल
सुप्रीम कोर्ट की विशेष लोक अदालत में मामले की सुनवाई की खबर के बाद प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। यदि भविष्य में हाई कोर्ट के फैसले को बहाल किया जाता है, तो कई वरिष्ठ अधिकारियों की सेवा और पदोन्नति पर असर पड़ सकता है। अब सबकी नजर सुप्रीम कोर्ट की आगामी कार्यवाही पर टिकी हुई है, क्योंकि यह मामला केवल भर्ती विवाद नहीं बल्कि राज्य की प्रशासनिक पारदर्शिता और न्यायिक प्रक्रिया से भी जुड़ा हुआ माना जा रहा है।
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