1942 भारत छोड़ो आंदोलन: जब रायपुर के युवाओं ने अंग्रेजों के छुड़ाए पसीने

Umeshwari Baghel | Aug 15, 2026, 19:00 IST
रायपुर का गुप्त स्वतंत्रता संग्राम
1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में रायपुर ने भी अहम भूमिका निभाई। बड़े नेताओं की गिरफ्तारी के बाद युवाओं ने भूमिगत रहकर आंदोलन संभाला। गुप्त बैठकें, पर्चों का वितरण और पुलिस की गतिविधियों की जानकारी जुटाकर अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष जारी रखा।

समझें क्या है पूरा मामला

  • जश्न-ए-आजादी 1942 का रायपुर
  • आजादी की अनसुनी रायपुर की कहानी
  • आजादी के आंदोलन का गुप्त अध्याय
  • जब रायपुर में भूमिगत हुआ स्वतंत्रता संग्राम
  • अंग्रेजों के खिलाफ रायपुर का गुप्त संघर्ष

अगस्त 1942 में जब पूरे देश में अंग्रेजों भारत छोड़ो की आवाज गूंज रही थी, तब रायपुर भी आजादी की लड़ाई में पीछे नहीं था। अंग्रेज सरकार आंदोलन को रोकने के लिए लगातार नेताओं और कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर रही थी। लेकिन एक के बाद एक गिरफ्तारी के बावजूद आंदोलन थमा नहीं। बड़े नेताओं के जेल जाने के बाद युवाओं ने मोर्चा संभाल लिया और रायपुर में आंदोलन धीरे-धीरे भूमिगत रूप ले गया।



8 अगस्त 1942 को भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित होने के बाद अंग्रेज सरकार ने कांग्रेस नेताओं की धरपकड़ शुरू कर दी। रायपुर जिले के कई नेता बंबई से लौट रहे थे, लेकिन अपने घर पहुंचने से पहले ही गिरफ्तार कर लिए गए। इनमें पं. रविशंकर शुक्ल, घनश्याम सिंह गुप्ता, महंत लक्ष्मीनारायण दास, बैरिस्टर छेदीलाल और यतियतनलाल सहित 69 लोग शामिल थे। इसके बाद जिले के अलग-अलग इलाकों से भी गिरफ्तारियां हुईं। रायपुर जिले में बंदियों की संख्या बढ़कर 447 तक पहुंच गई।



गिरफ्तारी के बाद गुप्त बैठकों का दौर

नेताओं के जेल जाने के बाद अंग्रेजों को लगा कि आंदोलन कमजोर पड़ जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। गिरफ्तारी से बचने वाले कार्यकर्ता गुप्त ठिकानों पर इकट्ठा होने लगे। यहां आंदोलन को आगे बढ़ाने की रणनीति तैयार की जाती थी। कौन कहां संपर्क करेगा, लोगों तक आजादी का संदेश कैसे पहुंचाया जाएगा और अंग्रेजों की नजर से कैसे बचा जाए, इन सब पर चर्चा होती थी।



उस समय आजादी की बात लोगों तक पहुंचाना भी आसान नहीं था। अंग्रेज सरकार आंदोलनकारियों पर नजर रख रही थी। इसके बावजूद पर्चे और छोटी पुस्तिकाएं छापी गईं और उन्हें चुपचाप अलग-अलग लोगों तक पहुंचाया गया। इस तरह रायपुर में आंदोलन खुले मैदान से निकलकर गुप्त गतिविधियों के जरिए आगे बढ़ता रहा। रायपुर गजेटियर में 1942 के इस दौर को सक्रिय भूमिगत आंदोलन के तौर पर दर्ज किया गया है।



पुलिस के अंदर से भी मिलती थी जानकारी

रायपुर के स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी घटनाओं में पुलिस विभाग से जुड़ा एक दिलचस्प पहलू भी सामने आता है। स्वतंत्रता सेनानी रामकृष्ण सिंह को पुलिस की कार्रवाई और योजनाओं की जानकारी कई बार पहले ही मिल जाती थी। बताया जाता है कि पुलिस विभाग में उनके कुछ सहयोगी थे, जो उन्हें जरूरी सूचनाएं पहुंचाते थे।



इन जानकारियों से आंदोलनकारियों को अपनी रणनीति बनाने और कई बार पुलिस की कार्रवाई से बचने में मदद मिलती थी। यानी अंग्रेजी शासन की व्यवस्था के भीतर मौजूद कुछ लोग भी गुप्त रूप से स्वतंत्रता आंदोलन के समर्थकों की मदद कर रहे थे।



जेल की सजा भी नहीं रोक सकी आंदोलन

1942 के आंदोलन में रायपुर के कई युवाओं को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया। रामकृष्ण सिंह और बलमदास गुप्ता को गिरफ्तार कर डेढ़-डेढ़ साल के कारावास की सजा सुनाई गई। इसके बावजूद आंदोलन की गतिविधियां पूरी तरह बंद नहीं हुईं।



बाद में ईश्वरचरण शुक्ल को 1944 में गिरफ्तार किया गया। उन पर रायपुर रेलवे स्टेशन जलाने के आरोप में मुकदमा चलाया गया। लगातार गिरफ्तारी, जेल और मुकदमों के बावजूद स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े लोगों का उत्साह कम नहीं हुआ।



1942 से पहले ही रायपुर में तैयार हो चुकी थी जमीन

रायपुर में आजादी की भावना 1942 में अचानक पैदा नहीं हुई थी। इससे पहले भी यहां स्वतंत्रता आंदोलन लगातार मजबूत हो रहा था। महात्मा गांधी के व्यक्तिगत सत्याग्रह के दौरान महाकौशल क्षेत्र के शुरुआती 500 स्वतंत्रता सेनानियों को सत्याग्रह की अनुमति दी गई थी। इनमें रायपुर के 50 लोग शामिल थे।



4 मई 1941 तक रायपुर जिले में 276 सत्याग्रही गिरफ्तार किए जा चुके थे। पं. रविशंकर शुक्ल ने भी रायपुर के पास माना में सत्याग्रह किया था। इसके लिए उन्हें एक साल की जेल की सजा मिली थी।



आंदोलन से भूमिगत संघर्ष तक पहुंचा रायपुर

1941 के सत्याग्रह से लेकर 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन तक रायपुर में स्वतंत्रता की लड़ाई लगातार आगे बढ़ती रही। 1942 में जब बड़े नेता जेल भेज दिए गए, तब युवाओं और स्थानीय कार्यकर्ताओं ने आंदोलन की जिम्मेदारी अपने हाथ में ले ली।



गुप्त बैठकें, पर्चों का वितरण, पुलिस की गतिविधियों की जानकारी जुटाना और गिरफ्तारी के बावजूद आंदोलन को जारी रखना उस दौर की खास तस्वीर थी। अंग्रेजी हुकूमत की सख्ती के बीच रायपुर के लोगों ने यह दिखाया कि नेताओं की गिरफ्तारी से आजादी की आवाज को दबाया नहीं जा सकता। यही वजह रही कि 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन रायपुर के इतिहास में एक ऐसे दौर के रूप में दर्ज हुआ, जब युवाओं ने सामने आकर स्वतंत्रता संघर्ष को नई ताकत दी।



FAQ

  1. 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में रायपुर की क्या भूमिका थी?
    1942 में रायपुर के युवाओं और कार्यकर्ताओं ने अंग्रेजों के खिलाफ भूमिगत आंदोलन चलाया। गिरफ्तारी के बाद भी गुप्त बैठकों और पर्चों के जरिए आंदोलन जारी रखा।
  2. भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान रायपुर में कितने लोगों को गिरफ्तार किया गया था?
    रायपुर जिले में 1942 के आंदोलन के दौरान करीब 447 लोगों को गिरफ्तार किया गया था। इनमें कई प्रमुख नेता और कार्यकर्ता शामिल थे।
  3. रायपुर में स्वतंत्रता आंदोलन को युवाओं ने कैसे आगे बढ़ाया?
    नेताओं के जेल जाने के बाद युवाओं ने गुप्त बैठकें कीं, आजादी के संदेश वाले पर्चे बांटे और अंग्रेजों की कार्रवाई से बचते हुए आंदोलन को आगे बढ़ाया।

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