खिलजी के हमले में भोजशाला को हुआ नुकसान, अंग्रेज लंदन ले गए थे वाग्देवी की प्रतिमा
Jitendra Shrivastava | Jan 22, 2026, 17:46 IST
Photograph: (thesootr)
भोजशाला का इतिहास 990 साल पुराना है। राजा भोज ने इसे स्थापित किया था। खिलजी के हमले में नष्ट हुआ। अब सुप्रीम कोर्ट ने पूजा-नमाज पर फैसला दिया।
News in Short
- 22 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया।
- बसंत पंचमी पर हिंदू-मुस्लिम पूजा का समय तय हुआ।
- भोजशाला का इतिहास लगभग 990 वर्षों पुराना है।
- 1305 में खिलजी के हमले से भोजशाला को नुकसान हुआ।
- भोजशाला को लेकर कई विवाद और कानूनी प्रक्रियाएं जारी हैं।
News in Detail
बसंत पंचमी इस बार शुक्रवार को है। इसे लेकर हिंदू और मुस्लिम पक्ष पूजा व नमाज को लेकर आमने-सामने थे। इस बीच हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस ने पंचमी पर पूरे दिन सरस्वती पूजा की अनुमति के लिए 20 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। अब शीर्ष अदालत ने इस मामले में अपना फैसला दिया है। सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की पीठ ने मामले की सुनवाई की और फैसला दिया।
पढ़िए द सूत्र की यह खास रिपोर्ट...
कब-कब शुक्रवार को पड़ी बसंत पंचमी
990 बरस पुराना इतिहास
कई सालों तक भोजशाला में मां सरस्वती की प्रतिमा दबी रही, लेकिन जब अंग्रेजों ने यहां खुदाई की तो वे वाग्देवी की प्रतिमा को लंदन के म्यूजियम ले गए। खिलजी के आक्रमण से लेकर अब तक भोजशाला को उसकी पहचान दिलाने के लिए संघर्ष जारी है।
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हाईकोर्ट में याचिका
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भोजशाला: मंदिर या मस्जिद?
याचिका में यह मांग की गई थी कि भोजशाला का कैरेक्टर तय करने के लिए एएसआई से वैज्ञानिक सर्वे कराया जाए। इसके तहत एएसआई को 6 हफ्तों के भीतर रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया गया, जिसे बाद में बढ़ाकर 15 जुलाई 2024 तक कर दिया गया। इसके बाद एएसआई ने रिपोर्ट पेश कर दी। पूरा मामला न्यायालय के विचाराधीन है।
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भोजशाला में ऐतिहासिक अध्ययन
इसके अलावा, राजा भोज द्वारा स्थापित भोजशाला के अवशेष अब भी धार जिले के प्रसिद्ध कमाल मौला मस्जिद में देखे जा सकते हैं। मस्जिद में एक बड़ा खुला प्रांगण है, जो इस स्थल के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को दर्शाता है।
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भोजशाला एक गौरवमयी धरोहर
राजा भोज एक महान शासक ही नहीं, बल्कि कला और शिक्षा के भी समर्थक थे। उन्होंने कई स्थानों पर भोजशाला की स्थापना की, जिनमें धार की भोजशाला सबसे प्रसिद्ध है। "भोजशाला" शब्द दो भागों से बना है- "भोज" और "शाला", जिसका अर्थ है राजा भोज द्वारा स्थापित शाला। यह सिर्फ बच्चों की स्कूल नहीं थी, बल्कि एक विश्वविद्यालय था, जहां देश-विदेश के छात्र शिक्षा प्राप्त करने आते थे।
राजा भोज ने भोजशाला में देवी वाग्देवी (सरस्वती) की मूर्ति भी स्थापित की थी, क्योंकि हिंदू धर्म में सरस्वती को ज्ञान और वाणी की देवी माना जाता है। 1808 में हुई खुदाई के दौरान यह मूर्ति प्राप्त हुई थी, जिसे अंग्रेजों ने लंदन ले जाकर संग्रहालय में रखा। इस मूर्ति के शिलालेख में राजा भोज और वाग्देवी का उल्लेख भी किया गया है।
भोजशाला न केवल शिक्षा का केंद्र था, बल्कि यह राजा भोज के समय का एक महान धरोहर स्थल था। इस स्थान से जुड़ी जानकारी और इतिहास आज भी हमारे लिए प्रेरणादायक है।
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राजा भोज का दृष्टिकोण
भोजशाला सिर्फ एक साधारण विद्यालय नहीं था, बल्कि यह एक विश्वविद्यालय थी, जहाँ शिक्षा के विभिन्न पहलुओं पर ध्यान दिया जाता था। राजा भोज ने यहाँ देवी वाग्देवी (सरस्वती) की मूर्ति स्थापित की थी, जो ज्ञान की देवी मानी जाती हैं।
भोजशाला की महानता
मुगल आक्रमण और भोजशाला का विध्वंस
13वीं शताब्दी में जब मंगोलों और मुगलों का भारत में आक्रमण हुआ, तो भोजशाला को भी इसका नुकसान हुआ। मुगलों ने भोजशाला को नष्ट कर दिया और इसे एक मजार में बदल दिया। इसके बाद हिंदू समाज से पूजा का अधिकार छीन लिया गया, और यहां मुस्लिम आस्थावानों के लिए नमाज अदा की जाने लगी।
भोजशाला का पुनर्निर्माण और विवाद
आधुनिक समय में भी भोजशाला का इतिहास विवादों से घिरा हुआ है। 2024 में, इंदौर हाई कोर्ट के आदेश पर, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा भोजशाला का सर्वेक्षण किया गया।
निष्कर्ष
आज भी यह स्थान भारतीय समाज के लिए एक प्रेरणा है, और इसके पुनः प्राप्ति की दिशा में कई प्रयास किए जा रहे हैं। भोजशाला की पुनः प्राप्ति से न केवल हमारे गौरवशाली इतिहास का पुनर्निर्माण होगा, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक धरोहर को पुनः जीवित करेगा।
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