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Photograph: (thesootr)
News in Short
22 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया।
बसंत पंचमी पर हिंदू-मुस्लिम पूजा का समय तय हुआ।
भोजशाला का इतिहास लगभग 990 वर्षों पुराना है।
1305 में खिलजी के हमले से भोजशाला को नुकसान हुआ।
भोजशाला को लेकर कई विवाद और कानूनी प्रक्रियाएं जारी हैं।
News in Detail
New Delhi/Bhopal.मध्यप्रदेश के धार जिले की ऐतिहासिक भोजशाला को लेकर सुप्रीम कोर्ट का बहुप्रतीक्षित फैसला आखिरकार आ गया है। शीर्ष अदालत ने 22 जनवरी 2026 को सुनवाई करते हुए कहा कि भोजशाला में बसंत पंचमी (23 जनवरी) पर हिंदू पक्ष सुबह से दोपहर 12 बजे तक पूजा कर सकेगा। इसके बाद मुस्लिम पक्ष जुमे की नमाज पढ़ेगा। इसके बाद के क्रम में हिंदू शाम 4 बजे से फिर मां सरस्वती की उपासना कर सकेंगे।
बसंत पंचमी इस बार शुक्रवार को है। इसे लेकर हिंदू और मुस्लिम पक्ष पूजा व नमाज को लेकर आमने-सामने थे। इस बीच हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस ने पंचमी पर पूरे दिन सरस्वती पूजा की अनुमति के लिए 20 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। अब शीर्ष अदालत ने इस मामले में अपना फैसला दिया है। सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की पीठ ने मामले की सुनवाई की और फैसला दिया।
पढ़िए द सूत्र की यह खास रिपोर्ट...
कब-कब शुक्रवार को पड़ी बसंत पंचमी
23 जनवरी को बसंत पंचमी के दिन भोजशाला पर एक बार फिर से नजरें टिकी हैं। यह दिन खास है, क्योंकि इस बार बसंत पंचमी शुक्रवार के दिन है, जो पहले भी तीन बार (2003, 2007, 2016) शुक्रवार को आई थी। हर बार विवाद की वजह बनी। इन विवादों को देखते हुए प्रशासन ने इस बार सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए हैं, ताकि कोई अप्रिय घटना न हो।
990 बरस पुराना इतिहास
भोजशाला का इतिहास करीब 990 वर्षों पुराना है। इसे राजा भोज ने 1034 ईसवीं में बनवाया था। उन्होंने ही यहां मां वाग्देवी की प्रतिमा स्थापित कराई थी। यह जगह 200 वर्षों तक समृद्धि और वैभव का प्रतीक बनी रही, लेकिन 1305 ईसवीं में मोहम्मद खिलजी के आक्रमण के बाद इसे नुकसान पहुंचा और उसके बाद कई मुस्लिम आक्रांताओं ने भोजशाला पर हमले किए।
कई सालों तक भोजशाला में मां सरस्वती की प्रतिमा दबी रही, लेकिन जब अंग्रेजों ने यहां खुदाई की तो वे वाग्देवी की प्रतिमा को लंदन के म्यूजियम ले गए। खिलजी के आक्रमण से लेकर अब तक भोजशाला को उसकी पहचान दिलाने के लिए संघर्ष जारी है।
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2003 में लगा था कर्फ्यू
भोजशाला की अहमियत केवल ऐतिहासिक नहीं, बल्कि सांप्रदायिक और धार्मिक दृष्टि से भी है। 2003 में हिंदू जागरण मंच ने यहां हिंदुओं के नियमित प्रवेश की मांग की थी, जिसके बाद हिंसक आंदोलन हुआ और सांप्रदायिक तनाव पैदा हुआ। इस आंदोलन के चलते धार में कई दिनों तक कर्फ्यू लगा था और कई बार तनाव के मामले सामने आए थे।
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हाईकोर्ट में याचिका
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एएसआई (आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया) से भोजशाला का वैज्ञानिक सर्वे करने का आदेश दिया था, ताकि इस स्थल के धार्मिक स्वरूप का स्पष्ट रूप से निर्धारण हो सके। इस विवाद को लेकर एक और याचिका इंदौर हाई कोर्ट में दायर की गई थी, जिसमें मांग की गई थी कि भोजशाला का पूरी तरह से आधिपत्य हिंदुओं को सौंपा जाए।
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भोजशाला: मंदिर या मस्जिद?
भोजशाला को लेकर चल रहे विवाद में यह सवाल भी उठता है कि यह स्थल असल में एक मंदिर है या मस्जिद। इस सवाल का हल निकालने के लिए हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस ने 1 मई 2022 को इंदौर हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी।
याचिका में यह मांग की गई थी कि भोजशाला का कैरेक्टर तय करने के लिए एएसआई से वैज्ञानिक सर्वे कराया जाए। इसके तहत एएसआई को 6 हफ्तों के भीतर रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया गया, जिसे बाद में बढ़ाकर 15 जुलाई 2024 तक कर दिया गया। इसके बाद एएसआई ने रिपोर्ट पेश कर दी। पूरा मामला न्यायालय के विचाराधीन है।
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भोजशाला में ऐतिहासिक अध्ययन
माइकल विलिस के शोध पत्र के मुताबिक, भोजशाला का नाम "हॉल ऑफ भोज" से लिया गया है और यह राजा भोज के संस्कृत अध्ययन केंद्र को दर्शाता है। विलिस ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि भोजशाला की मस्जिद को लेकर भी कई ऐतिहासिक विवाद रहे हैं और इसे धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक तनाव का केंद्र माना गया है।
इसके अलावा, राजा भोज द्वारा स्थापित भोजशाला के अवशेष अब भी धार जिले के प्रसिद्ध कमाल मौला मस्जिद में देखे जा सकते हैं। मस्जिद में एक बड़ा खुला प्रांगण है, जो इस स्थल के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को दर्शाता है।
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भोजशाला एक गौरवमयी धरोहर
राजा भोज का नाम भारतीय इतिहास में बड़े आदर और सम्मान के साथ लिया जाता है। उनका शासनकाल 1000 से 1055 ईस्वी तक रहा। वे उज्जयिनी (अब उज्जैन) के राजा विक्रमादित्य की परंपरा के ग्यारहवें राजा थे। राजा भोज ने अपनी राजधानी उज्जयिनी से धार स्थानांतरित की और वहां भोजशाला की स्थापना की।
राजा भोज एक महान शासक ही नहीं, बल्कि कला और शिक्षा के भी समर्थक थे। उन्होंने कई स्थानों पर भोजशाला की स्थापना की, जिनमें धार की भोजशाला सबसे प्रसिद्ध है। "भोजशाला" शब्द दो भागों से बना है- "भोज" और "शाला", जिसका अर्थ है राजा भोज द्वारा स्थापित शाला। यह सिर्फ बच्चों की स्कूल नहीं थी, बल्कि एक विश्वविद्यालय था, जहां देश-विदेश के छात्र शिक्षा प्राप्त करने आते थे।
राजा भोज ने भोजशाला में देवी वाग्देवी (सरस्वती) की मूर्ति भी स्थापित की थी, क्योंकि हिंदू धर्म में सरस्वती को ज्ञान और वाणी की देवी माना जाता है। 1808 में हुई खुदाई के दौरान यह मूर्ति प्राप्त हुई थी, जिसे अंग्रेजों ने लंदन ले जाकर संग्रहालय में रखा। इस मूर्ति के शिलालेख में राजा भोज और वाग्देवी का उल्लेख भी किया गया है।
भोजशाला न केवल शिक्षा का केंद्र था, बल्कि यह राजा भोज के समय का एक महान धरोहर स्थल था। इस स्थान से जुड़ी जानकारी और इतिहास आज भी हमारे लिए प्रेरणादायक है।
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राजा भोज का दृष्टिकोण
राजा भोज केवल एक महान शासक नहीं थे, बल्कि वे एक विद्वान, आर्किटेक्ट और समाज सुधारक भी थे। उनके शासन काल में मालवा क्षेत्र को अपार समृद्धि मिली। भोजशाला की स्थापना भी राजा भोज के ज्ञान के प्रति उनकी गहरी श्रद्धा को दर्शाती है।
भोजशाला सिर्फ एक साधारण विद्यालय नहीं था, बल्कि यह एक विश्वविद्यालय थी, जहाँ शिक्षा के विभिन्न पहलुओं पर ध्यान दिया जाता था। राजा भोज ने यहाँ देवी वाग्देवी (सरस्वती) की मूर्ति स्थापित की थी, जो ज्ञान की देवी मानी जाती हैं।
भोजशाला की महानता
भोजशाला का महत्व केवल इसलिए नहीं था कि यह शिक्षा का केंद्र थी, बल्कि यह स्थान भारत के प्राचीन संस्कृत और प्राकृत साहित्य का एक प्रमुख स्थल भी था। यहाँ के शिलालेखों और संस्कृत रचनाओं से यह स्पष्ट होता है कि यहाँ अध्ययन के लिए दूर-दूर से छात्र आते थे। भोजशाला का यह विश्वविद्यालय न केवल हिंदू छात्रों के लिए, बल्कि अन्य धर्मों के छात्रों के लिए भी एक आकर्षण का केंद्र था।
मुगल आक्रमण और भोजशाला का विध्वंस
किसी भी महापुरुष के योगदान को नष्ट करने की कोशिशें इतिहास में देखने को मिलती हैं, और राजा भोज की महान धरोहर भोजशाला भी इससे अछूती नहीं रही।
13वीं शताब्दी में जब मंगोलों और मुगलों का भारत में आक्रमण हुआ, तो भोजशाला को भी इसका नुकसान हुआ। मुगलों ने भोजशाला को नष्ट कर दिया और इसे एक मजार में बदल दिया। इसके बाद हिंदू समाज से पूजा का अधिकार छीन लिया गया, और यहां मुस्लिम आस्थावानों के लिए नमाज अदा की जाने लगी।
भोजशाला का पुनर्निर्माण और विवाद
भोजशाला अभी भी हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के बीच विवाद का केंद्र बना हुआ है। आज भी इस स्थान पर दोनों पक्षों के बीच अधिकार का संघर्ष जारी है। 14वीं और 15वीं शताब्दी में, भोजशाला के दोनों ओर मस्जिदों का निर्माण हुआ, और इस स्थान को लेकर कई बार विवाद उठ चुके हैं।
आधुनिक समय में भी भोजशाला का इतिहास विवादों से घिरा हुआ है। 2024 में, इंदौर हाई कोर्ट के आदेश पर, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा भोजशाला का सर्वेक्षण किया गया।
निष्कर्ष
राजा भोज द्वारा स्थापित भोजशाला न केवल एक शैक्षिक केंद्र था, बल्कि यह भारतीय इतिहास और संस्कृति का प्रतीक भी था। हालांकि, भोजशाला का इतिहास कई उतार-चढ़ावों से भरा हुआ है, फिर भी इसका महत्व कभी कम नहीं हुआ।
आज भी यह स्थान भारतीय समाज के लिए एक प्रेरणा है, और इसके पुनः प्राप्ति की दिशा में कई प्रयास किए जा रहे हैं। भोजशाला की पुनः प्राप्ति से न केवल हमारे गौरवशाली इतिहास का पुनर्निर्माण होगा, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक धरोहर को पुनः जीवित करेगा।
कीवर्ड्स:
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