रायपुर में वॉटर इमरजेंसी : कई क्षेत्रों में 1500 फीट खिसका पानी
NEWS IN SHORT
- रायपुर के कई इलाकों में पानी 1500 फीट नीचे पहुंचा।
- आउटर की नई कॉलोनियां पूरी तरह टैंकरों पर निर्भर हैं।
- तालाबों के पटने से भू-जल रिचार्ज बेहद कम हुआ।
- डूंडा में 186 करोड़ की लागत से फिल्टर प्लांट बनेगा।
- मानसून से पहले सरकारी जमीनों पर वॉटर हार्वेस्टिंग अनिवार्य होगी।
NEWS IN DETAIL
राजधानी रायपुर इस समय भीषण जल संकट और वॉटर इमरजेंसी के दौर से गुजर रही है। शहर के आउटर ही नहीं, बल्कि कई भीतरी इलाकों में भी ग्राउंड वॉटर लेवल (भू-जल स्तर) चिंताजनक रूप से नीचे गिर चुका है। सड्डू, मोवा, कचना, वीआईपी रोड और सेजबहार जैसे इलाकों में पानी का स्तर 1000 फीट से भी नीचे चला गया है, जिसके चलते कई क्षेत्रों में गंभीर जल संकट पैदा हो गया है।
सिलतरा और उरला में स्थिति सबसे भयावह
भू-जल स्तर गिरने के मामले में औद्योगिक और बाहरी क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। आंकड़ों के अनुसार, सिलतरा में साल 2010 में जो पानी 400 फीट पर मिल जाता था, वह 2026 में 1500 फीट की गहराई तक पाताल में जा चुका है। वहीं उरला और भनपुरी जैसे क्षेत्रों में भी बोरबेल 1200 से 1000 फीट तक गहरे हो चुके हैं। शहर के पॉश और अंदरूनी इलाके जैसे सिविल लाइन, राजेंद्र नगर, कटोरा तालाब, तेलीबांधा और अनुपम नगर भी अब 'डीप बोरबेल' वाले क्षेत्र बन चुके हैं, जहाँ पानी 700 से 900 फीट नीचे चला गया है।
टैंकरों पर निर्भरता और वित्तीय बोझ
इन प्रभावित क्षेत्रों में मार्च के शुरुआती दिनों से ही पानी के टैंकर मंगवाने पड़ते हैं। बारिश के मौसम को छोड़कर साल के बाकी सभी महीनों में यहाँ पानी की भारी किल्लत रहती है। टैंकरों के माध्यम से पानी की आपूर्ति के लिए स्थानीय परिवारों को हर महीने एक बड़ी रकम चुकानी पड़ रही है।
कारण: डिस्चार्ज ज्यादा, रिचार्ज कम
हाइड्रोलॉजिस्ट डॉ. विपिन दुबे के अनुसार, रायपुर के तेजी से होते विकास के कारण आबादी अत्यधिक बढ़ गई है। आउटर में लगातार बस रही नई कॉलोनियों में पानी का एकमात्र स्रोत भू-जल ही है, जिससे लगातार नए बोर हो रहे हैं। इसके अलावा तालाबों का पाटा जाना और रेन वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम के प्रति उदासीनता भी बड़ी वजह है। सीधे शब्दों में कहें तो जमीन से पानी निकालने की दर (रेट ऑफ डिस्चार्ज) ज्यादा है और जमीन में पानी वापस जाने की दर (रेट ऑफ रिचार्ज) बेहद कम है।
नगर निगम का एक्शन प्लान
इस संकट से निपटने के लिए नगर निगम दो मुख्य रणनीतियों पर काम कर रहा है:
डूंडा में नया फिल्टर प्लांट: नगर निगम करीब 186 करोड़ रुपए की लागत से डूंडा में नया फिल्टर प्लांट बनाने जा रहा है। इसकी शुरुआती तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। इसके बनने से डूंडा, बोरिया खुर्द, देवपुरी, सेजबहार, अमलीडीह, मोवा, सड्डू, कचना और वीआईपी रोड सहित कई इलाकों में पेयजल व्यवस्था बेहतर होगी।
अनिवार्य वॉटर हार्वेस्टिंग: रायपुर की महापौर मीनल चौबे के अनुसार, इस संकट का एकमात्र स्थायी उपाय वॉटर हार्वेस्टिंग है। मानसून के आने से पहले सभी जोनों में सरकारी जमीन का सर्वे कर वहाँ वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं। नियमों का पालन न करने वालों की राशि राजसात की जा रही है।
निष्कर्ष
रायपुर में गहराता जल संकट अनियंत्रित शहरीकरण और भू-जल के अत्यधिक दोहन का परिणाम है। केवल नए फिल्टर प्लांट बनाना इसका स्थायी समाधान नहीं है। जब तक हर नागरिक और प्रशासन मिलकर रेन वॉटर हार्वेस्टिंग को कड़ाई से नहीं अपनाएंगे, तब तक राजधानी को इस 'वॉटर इमरजेंसी' से बाहर निकालना असंभव होगा।
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