कैंसर और शुगर को मात देने आया छत्तीसगढ़ का संजीवनी चावल, रसायन की जगह गोबर और गौमूत्र
RAIPUR : क्या आपने कभी ऐसे चावल के बारे में सुना है, जिसे पकाया नहीं जाता बल्कि सुबह-शाम दवा की तरह कच्चा चबाया जाता है। और एक ऐसा अनोखा धान, जो थाली की शोभा बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि ब्रेस्ट कैंसर और शुगर जैसी घातक बीमारियों को मात देने के लिए उपजाया जा रहा है। छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले के एक छोटे से गांव कौंदकेरा में इन दिनों कुछ ऐसा ही चमत्कार का दावा किया जा रहा है।
संजीवनी धान की खेती:
महासमुंद जिले के छोटे से गांव कौंदकेरा के किसान योगेश्वर चंद्राकर अपने खेत में कोई आम धान नहीं, बल्कि औषधीय गुणों का खजाना कहे जाने वाले संजीवनी धान की अनोखी खेती कर रहे हैं। यह चावल शुगर और ब्रेस्ट कैंसर जैसी बीमारियों के लिए रामबाण माना जा रहा है। इस चावल की डिमांड इतनी है कि दिल्ली-मुंबई से लेकर बिहार और ओडिशा तक के लोग फसल कटने से पहले ही एडवांस बुकिंग करा रहे हैं।
भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर की लैब में पास हुआ जादुई चावल :
यह कोई हवा-हवाई दावा नहीं है, बल्कि देश के बड़े वैज्ञानिकों की मुहर लगी हकीकत है। मुंबई के मशहूर भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र (Bhabha Atomic Research Centre) में जब इस संजीवनी चावल का चूहों पर वैज्ञानिक परीक्षण किया गया, तो नतीजे चौंकाने वाले थे। रिसर्च में सामने आया कि यह चावल स्तन कैंसर (Breast Cancer) की कोशिकाओं को नष्ट करने में पूरी तरह कारगर है। रायपुर के इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक डॉ. दीपक शर्मा की सलाह पर शुरू हुई इस खेती ने अब चिकित्सा जगत की उम्मीदें बढ़ा दी हैं।
फाइटो कैमिकल्स से भरपूर:
सामान्य धान के मुकाबले इसमें 231 अतिरिक्त फाइटोकेमिकल्स मिलते हैं। जिनमें से 7 मेटाबोलाइट सीधे इंसानी शरीर की इम्युनिटी को रॉकेट की तरह बढ़ा देते हैं। इसके अलावा यह शरीर में खून की कमी (एनीमिया) को दूर करने और डायबिटीज को कंट्रोल करने में भी चमत्कारी माना गया है।
6 फीट ऊंचे पौधे:
6 फ़ीट लंबे इन पौधों में न यूरिया की जरूरत होती है और न मशीन की एंट्री। इस अनोखे धान को उगाने और सहेजने की कहानी भी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं है।
मशीनों को नो एंट्री':
इस धान की सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इसकी कुटाई किसी आधुनिक राइस मिल या मशीन में नहीं होती। चावल का दाना खराब न हो, इसलिए आज भी हाथ से ही इसका छिलका अलग किया जाता है।
कैमिकल से सख्त परहेज:
योगेश्वर इस फसल को पूरी तरह 'ऑर्गेनिक' रखते हैं। खेत में यूरिया या डीएपी डालना सख्त मना है, क्योंकि रसायनों से इसके औषधीय गुण नष्ट हो जाते हैं। कीड़ों से बचाने के लिए वे गोमूत्र, नीमास्त्र, छाछ और पंचगव्य का देसी कॉकटेल छिड़कते हैं।
बांस की लाठियों का सहारा:
संजीवनी धान के पौधे आम पौधों की तरह छोटे नहीं होते, बल्कि 6 फीट तक ऊंचे हो जाते हैं। कद काठी भारी होने के कारण तेज हवा में इनके गिरने का डर रहता है, इसलिए किसान इन्हें बांस और लोहे की कड़ियों का सहारा देकर सीधा खड़ा रखते हैं।
खाने का तरीका भी अलग:
> इस संजीवनी को खाने का तरीका बिल्कुल अलग है। रात में तीन चम्मच कच्चे चावल को एक कटोरी पानी में भिगोकर रख दिया जाता है। सुबह और शाम को इसी भीगे हुए कच्चे चावल को दवा की खुराक की तरह चबाकर खाया जाता है। करीब 145 दिनों की कड़ी तपस्या के बाद तैयार होने वाली यह खरीफ फसल आने वाले समय में चिकित्सा के क्षेत्र में एक बड़ा गेमचेंजर साबित हो सकती है। फिलहाल, महासमुंद के कौंदकेरा गांव का यह खेत देश के नक्शे पर एक नई उम्मीद बनकर चमक रहा है।
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