छत्तीसगढ़ में स्कूल फेल हुए, कांग्रेस के आत्मानंद अब शुरु होंगे बीजेपी के विवेकानंद

Arun Tiwari | May 22, 2026, 15:33 IST
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छत्तीसगढ़ में पिछले 26 वर्षों से शिक्षा व्यवस्था में निरंतर नए राजनीतिक प्रयोग हो रहे हैं, लेकिन बुनियादी सुविधाओं और शिक्षकों की कमी के कारण बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है।

RAIPUR : छत्तीसगढ़ में स्कूल शिक्षा प्रयोगशाला बन गई है। यहां पिछले 26 सालों से पढ़ाई लिखाई सुधारने के नए नए प्रयोग हो रहे हैं लेकिन ये कुछ खास कामयाबी हासिल नहीं कर पाए। पिछली कांग्रेस सरकार ने आत्मानंद स्कूल खोले थे। मकसद था बच्चों को इंग्लिश मीडियम से बेहतर शिक्षा मिलेगी। लेकिन आत्मानंद स्कूलों में टीचर ही नहीं हैं। अब बीजेपी सरकार विवेकानंद स्कूल खोल रही है। यह स्कूल भी इंग्लिश मीडियम होंगे और हर ब्लॉक में खोले जाएंगे।



स्कूल बने प्रयोगशाला :

छत्तीसगढ़ में सरकारी स्कूलों को लेकर एक बार फिर राजनीति और प्रयोगों का दौर तेज हो गया है। पहले कांग्रेस सरकार ने बड़े स्तर पर स्वामी आत्मानंद अंग्रेजी माध्यम स्कूलों की शुरुआत की थी। वहीं अब बीजेपी सरकार विवेकानंद स्कूलों के नाम से नई व्यवस्था लागू करने की तैयारी में है। लगातार बदलते मॉडल और योजनाओं के बीच सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर इन प्रयोगों का असर बच्चों की पढ़ाई और शिक्षा व्यवस्था पर कितना पड़ रहा है। प्रदेश में वर्तमान समय में स्वामी आत्मानंद स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी बनी हुई है। जानकारी के अनुसार करीब दो हजार शिक्षकों के पद खाली हैं।



बीजेपी के विवेकानंद :

बीजेपी सरकार प्रदेश के हर ब्लॉक में एक विवेकानंद स्कूल खोलने जा रही है। इसी शिक्षा सत्र से प्रदेश में 150 विवेकानंद स्कूल शुरु हो जाएंगे। यह सभी स्कूल इंग्लिश मीडियम होंगे। इन स्कूलों के जरिए सरकार की कोशिश स्कूली शिक्षा को बेहतर करना है। स्कूली शिक्षा को लेकर यह नया प्रयोग किया जा रहा है। शुरुवात में ये स्कूल बेसिक स्तर से शुरु होंगे लेकिन आने वाले समय में इनको अत्याधुनिक और एजुकेशन के लिए मॉडल बनाने की योजना है।



कांग्रेस के आत्मानंद :

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की भूपेश सरकार ने 751 स्वामी आत्मानंद स्कूल शुरू किए थे। इन स्कूलों को कांग्रेस सरकार की महत्वाकांक्षी योजना माना गया था। दावा किया गया था कि इन स्कूलों के माध्यम से गरीब और ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों को अंग्रेजी माध्यम में बेहतर शिक्षा उपलब्ध कराई जाएगी। शुरुआत में इन स्कूलों को लेकर उत्साह भी दिखाई दिया। लेकिन समय के साथ शिक्षकों की कमी, संसाधनों की दिक्कत और प्रशासनिक समस्याएं सामने आने लगीं। कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि बीजेपी सरकार आत्मानंद मॉडल को कमजोर कर रही है।सरकार कहती है कि स्वामी आत्मानंद स्कूल जहां संचालित हो रहे हैं, वे आगे भी चलते रहेंगे और फिलहाल उन्हें बंद करने की कोई योजना नहीं है। वहीं दूसरी ओर शिक्षा विभाग के भीतर संसाधनों और स्टाफ की कमी को लेकर चिंता बनी हुई है।



केंद्र के मॉडल स्कूल :

साल 2011-12 में तत्कालीन केंद्र सरकार ने स्कूली शिक्षा व्यवस्था को सुधारने के लिए मॉडल स्कूल खोलने का फैसला किया था। इन स्कूलों के बेहतर इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए केंद्र सरकार ने भारी भरकम फंड भी जारी किया। इसके बाद रमन सरकार ने इन स्कूलों को डीएवी के हवाले कर दिया और इनको पीपीपी मोड चलाने का फैसला लिया। बाद में सरकार ने इन स्कूलों को अनुदान देना बंद कर दिया जिससे इन स्कूलों की हालत कमजोर होती गई।



मोदी के पीएमश्री स्कूल :

केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना पीएम श्री (प्रधानमंत्री स्कूल फॉर राइजिंग इंडिया) का मकसद देश के सरकारी स्कूलों को आधुनिक सुविधाओं से लैस आदर्श शिक्षण संस्थानों के रूप में विकसित करना है। इस योजना के तहत चयनित स्कूलों में राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लागू किया जा रहा है, ताकि विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण, आधुनिक और समग्र शिक्षा मिल सके। पीएम श्री स्कूलों में अत्याधुनिक बुनियादी ढांचे पर विशेष ध्यान दिया जाता है। इन विद्यालयों में स्मार्ट क्लासरूम, डिजिटल बोर्ड, आधुनिक विज्ञान लैब,लाइब्रेरी और खेल सुविधाएं विकसित की जाती हैं।



रमन के इग्नाइट स्कूल :

तत्कालीन डॉ रमन सिंह सरकार ने प्राइमरी शिक्षा की बेहतरी के लिए 305 इग्नाइट स्कूल खोले थे। 10 स्कूल शुरुवात में ही बंद हो गए। जो 295 स्कूल बचे हैं वे भी वेंटीलेटर पर हैं। उनमें न शिक्षक हैं और न ही किताबें समय पर पहुंच रही हैं।



जोगी का सीबीएसई मॉडल :

मध्यप्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ राज्य बना। कांग्रेस ने अजीत जोगी को छत्तीसगढ़ का पहला मुख्यमंत्री बनाया। प्रशासनिक सेवा से आने वाले अजीत जोगी ने आते ही स्कूली शिक्षा पर फोकस किया। सरकारी स्कूलों को सीबीएसई स्कूलों में तब्दील कर दिया। लेकिन इसका कुछ खास फायदा नहीं मिला और रिजल्ट खराब आने लगे। रिजल्ट बिगड़ने के कारण इनको बंद कर दिया गया।



क्या कहते हैं जानकार :

शिक्षा विशेषज्ञ ओपी मिश्रा का कहना है कि पहले से चल रही व्यवस्थाओं को मजबूत किए बिना नए प्रयोग करना शिक्षा की गुणवत्ता पर असर डाल सकता है। शिक्षा के क्षेत्र में प्रयोग पर प्रयोग हो रहे हैं लेकिन पढ़ाई के स्तर में कुछ खास सुधार नहीं आया है। सरकार को चाहिए कि वो नए प्रयोग करने की जगह शिक्षा की वर्तमान प्रणाली को मजबूत बनाए। शिक्षकों की कमी दूर करे और क्वालिटेटिव एजुकेशन पर फोकस करे।



शिक्षाविदों का मानना है कि सरकारों को स्कूलों के नाम और मॉडल बदलने के बजाय बुनियादी शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने पर ध्यान देना चाहिए। शिक्षकों की नियुक्ति, बेहतर प्रशिक्षण, आधारभूत सुविधाएं और बच्चों के सीखने के स्तर में सुधार सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए। उनका कहना है कि यदि लगातार नए प्रयोग होते रहे और पुरानी योजनाओं का मूल्यांकन नहीं किया गया तो इसका सीधा असर विद्यार्थियों के भविष्य पर पड़ेगा।



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