स्कूल के मास्साब को रास छत्तीसगढ़ की सियासत, कोई सीएम तो कोई बना पार्टी का मुखिया
RAIPUR : कभी हाथ में चॉक थी और सामने बच्चों की क्लास। कोई गणित या विज्ञान पढ़ाता था तो कोई कॉलेज में लेक्चरर था। कुछ शिक्षाकर्मी के रूप में स्कूलों में सेवाएं दे रहे थे। लेकिन समय के साथ इनकी जिंदगी ने करवट ली और क्लासरूम से निकलकर ये राजनीति के मैदान में उतर गए।
छत्तीसगढ़ की राजनीति में ऐसे कई नेता रहे हैं, जिन्होंने सियासी पारी शुरू करने से पहले शिक्षा के क्षेत्र में काम किया। इनमें से किसी ने विधायक बनने के बाद मंत्री की जिम्मेदारी संभाली, कोई पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बना और एक नाम ऐसा भी है, जिसने शिक्षक से शुरुआत कर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री तक का सफर तय किया।
अजीत जोगी: शिक्षक से छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री:
शिक्षक से राजनीति तक के सफर की बात हो तो अजीत जोगी का नाम सबसे अलग है। छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री बनने से पहले वे रायपुर के इंजीनियरिंग कॉलेज में अध्यापन कर चुके थे। 1964-65 के दौरान उन्होंने कॉलेज में पढ़ाया।
इसके बाद उन्होंने भारतीय प्रशासनिक सेवा का रास्ता चुना और आईएएस अधिकारी बने। आगे चलकर प्रशासनिक सेवा छोड़कर सक्रिय राजनीति में आए।
कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा पहुंचे, राज्यसभा सदस्य रहे और पार्टी में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं। 2000 में मध्यप्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ नया राज्य बना तो अजीत जोगी इसके पहले मुख्यमंत्री बने।
इसी परिवार में उनकी पत्नी डॉ. रेणु जोगी का भी शिक्षा से गहरा जुड़ाव रहा। राजनीति में आने से पहले वे इंदौर और रायपुर के मेडिकल कॉलेजों में नेत्र विभाग की प्रोफेसर थीं। बाद में वे कोटा से विधायक बनीं।
रामविचार नेताम: सरकारी शिक्षक से मंत्री तक:
बलरामपुर के सनावल गांव से आने वाले रामविचार नेताम ने राजनीति में आने से पहले शिक्षक के तौर पर काम किया। वे रामचंद्रपुर ब्लॉक के चाकी गांव स्थित शासकीय प्राथमिक स्कूल में शिक्षक रहे।
गांव में बच्चों को पढ़ाने के साथ उनका सामाजिक जुड़ाव भी बढ़ता गया। धीरे-धीरे वे सामाजिक गतिविधियों से राजनीति की तरफ बढ़े। 1990 में उन्होंने पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ा और जीत हासिल की।
उस समय छत्तीसगढ़ मध्यप्रदेश का हिस्सा था। इसके बाद उनका राजनीतिक कद लगातार बढ़ता गया। वे विधायक के साथ राज्य और केंद्र की राजनीति में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालते रहे और कई बार मंत्री भी बने। वर्तमान में वे छत्तीसगढ़ सरकार में मंत्री हैं।
विजय शर्मा: फिजिक्स की क्लास से डिप्टी सीएम तक:
कवर्धा से आने वाले विजय शर्मा ने भौतिक शास्त्र में एमएससी की। पढ़ाई के बाद 1996 से 1998 के बीच उन्होंने रायपुर के सेंट्रल कॉलेज, प्रगति कॉलेज और इंजीनियरिंग कॉलेज में लेक्चरर के रूप में काम किया।
कॉलेज के इस दौर में वे छात्रों को फिजिक्स पढ़ाते थे, लेकिन छात्र जीवन से ही उनका राजनीतिक जुड़ाव भी रहा। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के जरिए वे संगठन की राजनीति में सक्रिय हुए।
2023 में भाजपा ने उन्हें कवर्धा से विधानसभा चुनाव में उतारा। उन्होंने तत्कालीन मंत्री मोहम्मद अकबर को हराकर पहली बार विधानसभा में प्रवेश किया। इसके बाद उन्हें राज्य सरकार में उपमुख्यमंत्री की जिम्मेदारी मिली।
टंकराम वर्मा: सरकारी शिक्षक से कैबिनेट मंत्री
टंकराम वर्मा का राजनीतिक सफर भी शिक्षा विभाग से होकर गुजरा है। उन्होंने सरकारी शिक्षक के रूप में नौकरी की और बाद में शिक्षा विभाग से सेवानिवृत्त हुए।
शिक्षक रहते हुए ही उनका सामाजिक और राजनीतिक जुड़ाव बढ़ता गया। भाजपा से जुड़ने के बाद उन्होंने संगठन में काम किया। वे वरिष्ठ भाजपा नेता रमेश बैस के साथ भी जुड़े रहे और बाद में उनके निजी सहायक के रूप में काम किया।
2023 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने उन्हें बलौदाबाजार से टिकट दिया। चुनाव जीतकर वे पहली बार विधानसभा पहुंचे और इसके बाद राज्य सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाए गए।
मोहन मरकाम: शिक्षाकर्मी से कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष और मंत्री तक
मोहन मरकाम नियमित सरकारी शिक्षक नहीं, बल्कि शिक्षाकर्मी के रूप में शिक्षा विभाग से जुड़े रहे। उन्होंने शिक्षाकर्मी वर्ग-1 और वर्ग-2 के रूप में काम किया।छात्र जीवन से ही उनका राजनीतिक झुकाव था।
बाद में उन्होंने नौकरी छोड़कर सक्रिय राजनीति को अपना रास्ता बनाया। 1990 में कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता लेने के बाद उनका राजनीतिक सफर आगे बढ़ा।
2008 में वे कोंडागांव से पहली बार विधायक बने। इसके बाद संगठन में उनका कद बढ़ता गया। 2019 में उन्हें छत्तीसगढ़ कांग्रेस का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया। 2023 में भूपेश बघेल सरकार में उन्हें मंत्री की जिम्मेदारी भी मिली।
डोमनलाल कोर्सेवाड़ा: 26 साल पढ़ाया, फिर राजनीति में उतरे
डोमनलाल कोर्सेवाड़ा ने शिक्षक के रूप में लंबी पारी खेली। उन्होंने 1972 में सहायक शिक्षक के तौर पर नौकरी शुरू की। उनकी पहली पोस्टिंग प्राथमिक शाला साजा, गुंडरदेही ब्लॉक में हुई।
1987 में वे उच्च श्रेणी शिक्षक बने और आगे चलकर व्याख्याता के पद तक पहुंचे। करीब 26 साल शिक्षा विभाग में काम करने के बाद 1998 में सेवानिवृत्त हुए।
हालांकि नौकरी से रिटायरमेंट के बाद उनका सार्वजनिक जीवन खत्म नहीं हुआ। भाजपा की राजनीति में सक्रिय हुए और 2023 में अहिवारा विधानसभा सीट से चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे।
रामपुकार सिंह: शिक्षक से विधानसभा के वरिष्ठ चेहरों में शामिल
पत्थलगांव के वरिष्ठ कांग्रेस नेता रामपुकार सिंह भी राजनीति में आने से पहले शिक्षक रहे। शिक्षा के क्षेत्र से सार्वजनिक जीवन में आए और धीरे-धीरे पत्थलगांव की राजनीति में अपनी मजबूत जगह बनाई।
वे कई बार विधायक रहे और विधानसभा के वरिष्ठ सदस्यों में गिने जाते हैं। 2018 में उन्हें विधानसभा में प्रोटेम स्पीकर की जिम्मेदारी भी मिली।
चंद्रदेव राय: शिक्षाकर्मी आंदोलन से विधानसभा तक
चंद्रदेव राय का राजनीतिक सफर शिक्षाकर्मी आंदोलन से जुड़ा रहा। उन्होंने 2003 में शिक्षाकर्मी के रूप में नौकरी शुरू की और अध्यापन के साथ शिक्षाकर्मी संगठन में सक्रिय रहे।
स्कूल में पढ़ाने के साथ वे शिक्षाकर्मियों की समस्याओं और अधिकारों की आवाज उठाने लगे। यही सक्रियता उन्हें राजनीति की ओर ले गई।
2018 में कांग्रेस के टिकट पर बिलाईगढ़ से चुनाव लड़कर वे पहली बार विधायक बने। बाद में उन्हें संसदीय सचिव की जिम्मेदारी भी मिली।
सावित्री मंडावी: क्लासरूम छोड़कर चुनावी मैदान में उतरीं
सावित्री मंडावी राजनीति में आने से पहले रायपुर के कटोरा तालाब स्थित सरकारी स्कूल में लेक्चरर थीं। पति मनोज मंडावी के निधन के बाद 2022 में भानुप्रतापपुर विधानसभा सीट पर उपचुनाव हुआ।
इसके लिए उन्होंने शिक्षिका की नौकरी से इस्तीफा दिया और कांग्रेस के टिकट पर चुनाव मैदान में उतरीं। उन्होंने उपचुनाव जीतकर विधानसभा में प्रवेश किया।
खास बात यह है कि विधायक बनने के बाद भी उनका शिक्षक वाला जुड़ाव बना रहा। 2024 में अपने बचपन के स्कूल पहुंचने पर उन्होंने बच्चों के बीच जाकर करीब 30 मिनट तक साइंस भी पढ़ाया।
चातुरी नंद: व्याख्याता की नौकरी छोड़ी, पहली कोशिश में विधायक बनीं
सरायपाली की विधायक चातुरी नंद राजनीति में आने से पहले शासकीय व्याख्याता थीं। उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़कर सक्रिय राजनीति का रास्ता चुना।
2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने उन्हें सरायपाली से टिकट दिया। यह उनका पहला विधानसभा चुनाव था और पहली ही कोशिश में उन्होंने जीत दर्ज की।
विक्रम उसेंडी: शिक्षक से प्रदेश भाजपा अध्यक्ष तक
विक्रम उसेंडी ने भी राजनीति में सक्रिय होने से पहले शिक्षक के रूप में काम किया। अध्यापन के बाद उनका भाजपा संगठन से जुड़ाव बढ़ा और वे सक्रिय राजनीति में आ गए।
इसके बाद वे विधायक बने, लोकसभा पहुंचे और सांसद के रूप में भी काम किया। संगठन में उनका कद बढ़ा तो उन्हें छत्तीसगढ़ भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी मिली।
शिक्षक से नेता बने कई और चेहरे:
छत्तीसगढ़ की राजनीति में शिक्षक से नेता बनने वाले चेहरों की सूची इससे भी लंबी है। अरविंद नेताम राजनीति में आने से पहले अध्यापन से जुड़े रहे। बाद में वे कांकेर से कई बार सांसद और विधायक रहे तथा केंद्र सरकार में मंत्री की जिम्मेदारी संभाली।
डॉ. शक्राजीत नायक कॉलेज में प्रोफेसर रहे। राजनीति में आने के बाद रायगढ़ से विधायक बने और छत्तीसगढ़ सरकार में मंत्री भी रहे। उनका राजनीतिक सफर भाजपा और कांग्रेस, दोनों दलों से जुड़ा रहा।
नंदकुमार साय भी राजनीति में आने से पहले शिक्षक रहे। बाद में वे भाजपा के बड़े आदिवासी नेताओं में शामिल हुए। वे कई बार सांसद रहे और संगठन में राष्ट्रीय स्तर की जिम्मेदारियां संभालीं। बाद में कांग्रेस में शामिल हुए और राज्य सरकार में भी जिम्मेदारी मिली।
देवलाल दुग्गा ने भी शिक्षक के रूप में काम किया। राजनीति में आने के बाद विधायक बने और आगे चलकर अनुसूचित जाति-जनजाति आयोग के अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाली।
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