शरिया कोर्ट को तलाक देने का अधिकार नहीं, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पलटा फैसला

Harrison Masih | Sept 08, 2026, 14:07 IST
शरिया कोर्ट का फैसला अमान्य
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा कि निजी धार्मिक संस्था या शरिया कोर्ट किसी महिला की वैवाहिक स्थिति का कानूनी फैसला नहीं कर सकती। कोर्ट ने इदारा-ए-शरिया के तलाक संबंधी आदेश को कानूनी अधिकार के बिना जारी माना है।

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मुस्लिम महिला के वैवाहिक अधिकारों से जुड़े मामले में अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोई भी निजी धार्मिक संस्था या खुद को शरिया कोर्ट बताने वाला संगठन कानून से बनी अदालत का दर्जा नहीं रखता। ऐसी संस्थाएं किसी व्यक्ति की वैवाहिक स्थिति तय नहीं कर सकतीं और न ही अपने आदेश से किसी शादी को कानूनी रूप से खत्म कर सकती हैं।



क्या है पूरा मामला?

यह मामला रायपुर के टिकरापारा की रहने वाली निरोश अब्बासी से जुड़ा है। उनके पहले पति का 2015 में निधन हो गया था। इसके बाद उन्होंने 18 जुलाई 2020 को मोहम्मद आबिद खान से शादी की।



शादी के बाद बच्चों के नए परिवार में समायोजन को लेकर पति-पत्नी के बीच विवाद शुरू हो गया। महिला का आरोप था कि विवाद बढ़ने के बाद पति और ससुराल वालों ने उनका उत्पीड़न किया।



मामले को सुलझाने के लिए वन स्टॉप सखी सेंटर में काउंसिलिंग भी हुई, लेकिन विवाद का समाधान नहीं हो सका। इसके बाद महिला ने 7 अक्टूबर 2021 को SSP से शिकायत की।



शिकायत के आधार पर 1 नवंबर 2021 को महिला थाना रायपुर में पति और ससुराल वालों के खिलाफ IPC की धारा 498-A और 34 के तहत FIR दर्ज की गई।



पति ने किया तलाक-ए-हसन का दावा

दूसरी ओर, पति का दावा था कि उसने तलाक-ए-हसन के तहत तीन चरणों में तलाक दिया था। उसके मुताबिक 31 अगस्त, 30 सितंबर और 30 अक्टूबर 2021 को डिजिटल माध्यम से तलाक की घोषणा की गई थी।



इसी बीच रायपुर की इदारा-ए-शरिया इस्लामी कोर्ट ने 18 जनवरी 2022 को एक आदेश जारी कर महिला को उसके पति से तलाकशुदा घोषित कर दिया।



शरिया कोर्ट का आदेश कानूनी अधिकार से बाहर

इदारा-ए-शरिया के इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। मामले की सुनवाई जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद ने की।



कोर्ट ने कहा कि निजी धार्मिक संस्था को कानून से स्थापित अदालत का दर्जा हासिल नहीं है। इसलिए उसका कोई आदेश किसी व्यक्ति की वैवाहिक स्थिति या कानूनी अधिकारों को अपने आप नहीं बदल सकता।



हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के 'विश्व लोचन मदन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया' मामले के फैसले का भी हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि दारुल कजा या फतवा जारी करने वाली निजी संस्थाएं कानूनी अदालत नहीं हैं। वे धार्मिक राय दे सकती हैं, लेकिन उनकी राय किसी व्यक्ति के कानूनी अधिकार, वैवाहिक स्थिति या जिम्मेदारियों पर बाध्यकारी नहीं हो सकती।



सक्षम अदालत ही कर सकती है फैसला

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि विवाह खत्म होने या वैवाहिक अधिकारों में बदलाव का कानूनी फैसला सक्षम अदालत या संबंधित कानूनी प्राधिकारी ही कर सकता है।



कोर्ट ने याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए इदारा-ए-शरिया के 18 जनवरी 2022 के आदेश को कानूनी अधिकार के बिना जारी किया गया आदेश माना।



हालांकि, हाईकोर्ट ने इस मामले में तलाक-ए-हसन की संवैधानिक वैधता पर कोई फैसला नहीं दिया। कोर्ट ने साफ किया कि उसका आदेश FIR या पक्षकारों के अन्य कानूनी उपायों पर कोई प्रतिकूल असर नहीं डालेगा।



FAQ

  1. क्या शरिया कोर्ट तलाक का कानूनी फैसला कर सकती है?
    नहीं। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा कि निजी धार्मिक संस्था या शरिया कोर्ट कानून से बनी अदालत नहीं है और उसका आदेश किसी व्यक्ति की वैवाहिक स्थिति को कानूनी रूप से नहीं बदल सकता।
  2. क्या धार्मिक संस्था किसी व्यक्ति को तलाकशुदा घोषित कर सकती है?
    धार्मिक संस्था अपनी धार्मिक राय दे सकती है, लेकिन उसकी राय कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है। विवाह खत्म होने का कानूनी निर्धारण सक्षम अदालत या संबंधित कानूनी प्राधिकारी ही कर सकता है।


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