सोनेसिली जमीन विवाद में बड़ा खुलासा, जिसे समझ रहे थे निजी संपत्ति, वो निकली सरकारी चराई भूमि
NEWS IN SHORT
- सोनेसिली जमीन विवाद में तहसीलदार ने खोली पोल
- जांच में सामने आया सरकारी चराई भूमि पर निजी दावा असत्य
- ऐतिहासिक रिकॉर्ड बताते हैं जमीन हमेशा शासन की रही
- आवेदकों की कानूनी स्थिति भी विवाद में कमजोर पाई गई
- हाईकोर्ट सुनवाई के बीच मामला अब शासकीय भूमि पर दावेदारी का बना
NEWS IN DETAIL
गोबरा नवापारा (रायपुर)। छत्तीसगढ़ के ग्राम सोनेसिली में सालों से चले आ रहे जमीन विवाद में प्रशासन ने एक ऐसा खुलासा किया है, जिसने सबको चौंका दिया है। जिस जमीन को अब तक कुछ लोग अपनी निजी संपत्ति बताकर हक जता रहे थे, वह असल में सरकारी (शासकीय) भूमि निकली है। तहसीलदार की जांच रिपोर्ट में साफ हो गया है कि यह पूरी जमीन राजस्व रिकॉर्ड में "चराई मद" (मवेशियों के चरने की जगह) के रूप में दर्ज है। इस खुलासे के बाद अब यह पूरा मामला सरकारी जमीन पर अवैध दावेदारी के कानूनी जाल में फंस गया है।
सरकारी चराई जमीन पर कैसे हुआ दावा?
जांच में सबसे बड़ी बात यह सामने आई है कि जमीन पर दावा करने वाले लोगों ने जो दस्तावेज पेश किए थे, वे सरकारी राजस्व रिकॉर्ड से बिल्कुल भी मेल नहीं खाते हैं। कागजातों में इस बड़े अंतर ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब सवाल यह उठ रहा है कि आखिर किस आधार पर सरकारी चराई भूमि को निजी संपत्ति बताकर उस पर दावा ठोक दिया गया। यह मामला सिर्फ जमीन की लड़ाई का नहीं, बल्कि सरकारी रिकॉर्ड के साथ छेड़छाड़ या गलत दावेदारी की कोशिश की तरफ भी इशारा करता है।
क्या कहता है जमीन का इतिहास?
अगर इस जमीन के इतिहास पर नजर डालें, तो साल 1969-70 में यह जमीन पुराने खसरा नंबर 443 और 528 के तहत 'शासकीय घास मद' में दर्ज थी। इसके बाद साल 1970 में 'सामूहिक कृषि सहकारी समिति मर्यादित सोनेसिली' बनाई गई और जमीन का जिम्मा इस समिति को सौंप दिया गया। हालांकि, साल 1994-95 में तहसीलदार अभनपुर और अपर कलेक्टर के आदेश के बाद समिति का यह कब्जा खत्म कर दिया गया और जमीन दोबारा छत्तीसगढ़ शासन के नाम पर दर्ज हो गई। इसके साथ ही 20 फरवरी 1995 को इस सहकारी समिति का रजिस्ट्रेशन भी रद्द कर दिया गया था।
मौजूदा रिकॉर्ड में किसके नाम है जमीन?
करेंट राजस्व रिकॉर्ड को देखें तो यह पूरी तरह सरकार के पक्ष में है। इस समय खसरा नंबर 1018, 1136, 1137 और 1150 साफ तौर पर छत्तीसगढ़ शासन के राजस्व विभाग के नाम पर दर्ज हैं। वहीं, खसरा नंबर 352 आज भी सरकारी चराई जमीन का ही हिस्सा है। इन पुख्ता सरकारी आंकड़ों से यह साफ है कि इस जमीन का असली मालिक सिर्फ और सिर्फ शासन है, और किसी भी प्राइवेट व्यक्ति का इस पर कोई कानूनी हक नहीं बनता।
राजस्व मंडल और पंचायत का रुख
इस पूरे विवाद में राजस्व मंडल बिलासपुर का एक पुराना फैसला बेहद अहम भूमिका निभा रहा है। इस आदेश में साफ लिखा गया था कि किसी भी सरकारी जमीन पर पट्टा बांटने का हक सिर्फ राज्य सरकार के पास है। दूसरी तरफ, स्थानीय ग्राम पंचायत ने भी इस जमीन पर किसी भी तरह का पट्टा देने का कड़ा विरोध किया है। यानी न तो प्रशासन और न ही गांव की पंचायत, इस निजी दावे को सही मान रही है।
दावा करने वालों के पास खुद की जमीन
जांच रिपोर्ट में एक और दिलचस्प बात सामने आई है। जमीन पर हक जताने वाले आवेदक असल में भूमिहीन (बिना जमीन वाले) नहीं हैं। जांच में पता चला है कि ग्राम सोनेसिली में उनके नाम पर पहले से ही दूसरी जमीनें मौजूद हैं। नियम और नैतिकता के आधार पर भी उनका यह दावा बेहद कमजोर पड़ जाता है, क्योंकि वे खुद को भूमिहीन बताकर इस सरकारी जमीन पर हक नहीं जता सकते।
हाईकोर्ट की नजर और आगे का एक्शन
बिलासपुर हाईकोर्ट के निर्देश के बाद इस मामले में नए सिरे से आवेदनों पर सुनवाई चल रही है। तहसीलदार की इस नई और चौंकाने वाली रिपोर्ट के बाद अब यह मामला सिर्फ दो पक्षों का जमीनी झगड़ा नहीं रह गया है, बल्कि सरकारी जमीन को हथियाने की एक बड़ी कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। अब कोर्ट के आदेश, पुराने रिकॉर्ड्स और मौजूदा कानूनी स्थिति के आधार पर प्रशासन आगे की सख्त कार्रवाई की तैयारी में है।
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