आईएएस सुबोध सिंह ऊर्जा विभाग के बने नए मुखिया, अब टेक्नोलॉजी से सुधरेगी व्यवस्था
NEWS IN SHORT
- 1997 बैच के आईएएस सुबोध सिंह को ऊर्जा विभाग की पूरी कमान मिली।
- आईआईटी कानपुर के छात्र रहे सुबोध सिंह तकनीकी सुधारों के पक्षधर हैं।
- माइनिंग और बिजली बिलिंग को ऑनलाइन कर भ्रष्टाचार पर लगाई लगाम।
- डॉ. रमन सिंह के सचिवालय में 10 साल रहे, फिर भी निर्विवाद छवि।
- रायपुर और बिलासपुर में सिटी बस सेवा शुरू करने का श्रेय।
- वर्तमान में मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव और ऊर्जा विभाग के मुखिया।
NEWS IN DEATIL
छत्तीसगढ़ की प्रशासनिक व्यवस्था में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो सरकारें बदलने के बावजूद अपनी जगह और साख बनाए रखते हैं। 1997 बैच के आईएएस अधिकारी सुबोध कुमार सिंह उन्हीं चुनिंदा अफसरों में से एक हैं। अपनी बेदाग छवि, तकनीक के प्रति लगाव और भ्रष्टाचार पर कड़े प्रहार के लिए जाने जाने वाले सुबोध सिंह को मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने अब बिजली विभाग की सर्वोच्च जिम्मेदारी सौंपी है।
शिक्षक के बेटे से आईआईटीयन और फिर आईएएस तक का सफर
उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले के एक सामान्य परिवार में जन्मे सुबोध सिंह की सफलता की कहानी किसी प्रेरणा से कम नहीं है। उनके पिता एक प्राथमिक शाला में शिक्षक थे। बचपन से ही मेधावी सुबोध ने कानपुर आईआईटी से इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की और फिर यूपीएससी की कठिन परीक्षा पास कर आईएएस बने। उनकी सफलता का प्रभाव ऐसा था कि उनके गांव के आसपास के आधा दर्जन से अधिक युवाओं ने उन्हें देखकर प्रशासनिक सेवाओं का रुख किया।
राजनीतिक दलों से ऊपर निर्ववाद छवि
सुबोध सिंह के करियर की सबसे बड़ी खूबी उनकी 'निष्पक्षता' रही है। 2002 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने उन्हें रायगढ़ का कलेक्टर बनाया था, लेकिन 2003 में भाजपा सरकार आने के बाद भी उनकी कार्यशैली को देखते हुए उन्हें हटाया नहीं गया। वे पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के सचिवालय में करीब एक दशक तक रहे, लेकिन उन पर कभी किसी दल विशेष का 'लेबल' नहीं लगा। विपक्षी दलों के नेता भी उनकी ईमानदारी की मिसाल देते हैं।
भ्रष्टाचार के खिलाफ हथियार: डिजिटल क्रांति
सुबोध सिंह का मानना है कि भ्रष्टाचार को खत्म करने का एकमात्र रास्ता सिस्टम को ऑनलाइन करना है। छत्तीसगढ़ के विकास में उनके कुछ प्रमुख योगदान निम्नलिखित हैं:
माइनिंग का ऑनलाइन पोर्टल: रमन सरकार के दौरान उन्होंने खनिज विभाग को पूरी तरह ऑनलाइन किया, जिससे उस दौर में माइनिंग घोटाले की गुंजाइश खत्म हो गई।
बिजली बिल ऑनलाइन: जब डिजिटल भुगतान का चलन नहीं था, तब बिजली वितरण कंपनी के एमडी रहते हुए उन्होंने बिलों के ऑनलाइन भुगतान की शुरुआत की।
ई-ऑफिस और बायोमेट्रिक्स: हाल ही में दिल्ली से लौटने के बाद मुख्यमंत्री की मंशा अनुरूप उन्होंने सरकारी दफ्तरों में कार्यशैली सुधारने के लिए बायोमेट्रिक हाजिरी और ई-ऑफिस सिस्टम को मजबूती से लागू किया।
कलेक्टर के रूप में छोड़ी छाप
रायपुर और बिलासपुर जैसे महत्वपूर्ण जिलों में कलेक्टर रहते हुए उन्होंने सिटी बस सेवा की शुरुआत की, जिसने शहरी यातायात की शक्ल बदल दी। रायपुर में उन्हें दो बार कलेक्टर बनने का दुर्लभ अवसर मिला, जो उनकी प्रशासनिक पकड़ को साबित करता है।
सरकार ने बढ़ाया कद
उनकी 'रिजल्ट ओरिएंटेड' कार्यप्रणाली को देखते हुए साय सरकार ने उन्हें अब प्रमुख सचिव ऊर्जा के साथ-साथ सभी बिजली कंपनियों का चेयरमैन नियुक्त किया है। बिजली विभाग में सुधार और उपभोक्ताओं को पारदर्शी सेवाएं देना अब उनकी प्राथमिकता होगी।
FAQs
1. सुबोध कुमार सिंह किस बैच के आईएएस अधिकारी हैं?
वे 1997 बैच के छत्तीसगढ़ कैडर के आईएएस अधिकारी हैं।
2. उन्हें वर्तमान में सरकार ने क्या नई जिम्मेदारी दी है?
उन्हें प्रमुख सचिव (ऊर्जा) और सभी बिजली कंपनियों का चेयरमैन बनाया गया है।
3. भ्रष्टाचार रोकने के लिए उनकी कार्यशैली क्या है?
वे सिस्टम को ऑनलाइन (डिजिटल) करने और ई-ऑफिस को बढ़ावा देने में विश्वास रखते हैं।
निष्कर्ष
सुबोध कुमार सिंह जैसे अधिकारियों की मौजूदगी यह सुनिश्चित करती है कि यदि नेतृत्व मजबूत हो और अफसर ईमानदार, तो सिस्टम को न केवल बदला जा सकता है बल्कि उसे जनता के प्रति जवाबदेह भी बनाया जा सकता है। बिजली विभाग में उनके आने से अब प्रदेश के उपभोक्ताओं को नई उम्मीदें जगी हैं।
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