पाटन चुनाव याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा निर्देश, भूपेश बघेल की आपत्ति पर पहले छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट करेगा सुनवाई
रायपुर: छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से जुड़े पाटन विधानसभा चुनाव मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को महत्वपूर्ण निर्देश दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने बघेल की ओर से उठाई गई उस आपत्ति को स्वीकार किया है, जिसमें 2023 के विधानसभा चुनाव को चुनौती देने वाली चुनाव याचिका की समय-सीमा पर सवाल उठाया गया था। शीर्ष अदालत ने कहा है कि इस आपत्ति का फैसला अंतिम चरण में करने के बजाय छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में प्रारंभिक स्तर पर किया जाए।
क्या है मामला
मामला 2023 के पाटन विधानसभा चुनाव से जुड़ा है। इस चुनाव में भूपेश बघेल ने जीत दर्ज की थी। भाजपा नेता विजय बघेल ने उनके निर्वाचन को चुनौती देते हुए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में चुनाव याचिका दायर की थी। इसके बाद भूपेश बघेल की ओर से याचिका की वैधानिकता और उसके समय पर दायर किए जाने को लेकर आपत्ति उठाई गई।बघेल पक्ष का मुख्य तर्क है कि चुनाव याचिका निर्धारित कानूनी समय-सीमा के भीतर प्रस्तुत नहीं की गई।
जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 81(1) के तहत चुनाव परिणाम घोषित होने के 45 दिनों के भीतर चुनाव याचिका दायर करने का प्रावधान है। पाटन सीट का चुनाव परिणाम 3 दिसंबर 2023 को घोषित हुआ था। बघेल पक्ष का कहना है कि निर्धारित 45 दिन की अवधि 17 जनवरी 2024 को समाप्त हो गई थी, जबकि चुनाव याचिका से जुड़े दस्तावेजों में बाद की तारीखें दर्ज हैं।
इसी आधार पर बघेल की ओर से हाईकोर्ट में चुनाव याचिका को प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज करने की मांग की गई थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने माना कि केवल याचिका के पंजीकरण की तारीख के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि उसे कानून में निर्धारित अवधि के भीतर प्रस्तुत किया गया था या नहीं। याचिका वास्तव में किस तारीख को पेश हुई, उस समय क्या आपत्तियां थीं और बाद में उन कमियों को किस तरह दूर किया गया—इन बिंदुओं की जांच आवश्यक बताई गई।
सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला
हाईकोर्ट के इसी रुख के खिलाफ मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। बघेल पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने दलील दी कि समय-सीमा से जुड़ी आपत्ति को पहले ही तय किया जाना चाहिए। दूसरी ओर, विजय बघेल पक्ष ने इस आपत्ति का विरोध करते हुए कहा कि चुनाव याचिका की सुनवाई आगे बढ़ चुकी है और संबंधित मुद्दों पर साक्ष्यों के आधार पर फैसला किया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष भी मुख्य सवाल यही रहा कि क्या समय-सीमा से जुड़ी आपत्ति को अंतिम सुनवाई के दौरान देखा जाना चाहिए या इसे प्रारंभिक मुद्दे के रूप में पहले तय किया जा सकता है। शीर्ष अदालत ने बघेल पक्ष की आपत्ति को इसी सीमित पहलू पर स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट को निर्देश दिया कि इस मुद्दे का प्रारंभिक स्तर पर निराकरण किया जाए।
इसका अर्थ यह नहीं है कि सुप्रीम कोर्टने पाटन चुनाव को चुनौती देने वाली विजय बघेल की याचिका को खारिज कर दिया है। चुनाव याचिका की वैधता और उसके आगे चलने का फैसला हाईकोर्ट को करना है।
45 दिन की समय-सीमा पर विवाद
इस मामले में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 81(1) महत्वपूर्ण है। हाईकोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार, बघेल पक्ष ने दावा किया कि चुनाव परिणाम 3 दिसंबर 2023 को घोषित हुआ और इसलिए चुनाव याचिका 45 दिनों के भीतर, यानी 17 जनवरी 2024 तक प्रस्तुत होनी चाहिए थी। रिकॉर्ड में याचिका के सत्यापन और शपथपत्र की तारीख 22 जनवरी 2024 तथा उसके पंजीकरण की तारीख 24 जनवरी 2024 दर्ज होने का भी उल्लेख है।
हालांकि, हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल पंजीकरण की तारीख को याचिका प्रस्तुत करने की अंतिम तारीख मान लेना पर्याप्त नहीं है। वास्तविक प्रस्तुति की तारीख, रजिस्ट्री की आपत्तियां और उन आपत्तियों के निराकरण की प्रक्रिया भी देखना जरूरी है। इसी वजह से अदालत ने पहले ही चरण में याचिका को खारिज करने से इनकार किया था।
अब हाईकोर्ट में आगे क्या होगा
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद अब छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में बघेल की समय-सीमा संबंधी आपत्ति पर प्रारंभिक स्तर पर सुनवाई होगी। यदि हाईकोर्ट इस आपत्ति को स्वीकार करता है तो चुनाव याचिका की आगे की सुनवाई पर असर पड़ सकता है। वहीं, यदि अदालत इसे खारिज करती है तो विजय बघेल की चुनाव याचिका पर आगे सुनवाई और साक्ष्य की प्रक्रिया जारी रहेगी।
हाईकोर्ट के 17 सितंबर 2026 के आदेश में भी मामले को साक्ष्य के लिए आगे बढ़ाने का उल्लेख है और चुनाव याचिका को 5 अक्टूबर 2026 को चुनाव याचिकाकर्ता तथा उसके गवाहों के साक्ष्य के लिए सूचीबद्ध किया गया था।
इस तरह सुप्रीम कोर्टके ताजा निर्देश के बाद पाटन चुनाव मामले में कानूनी लड़ाई का अगला महत्वपूर्ण पड़ाव छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट होगा। वहां पहले यह तय किया जाएगा कि चुनाव याचिका की समय-सीमा को लेकर भूपेश बघेल की आपत्ति प्रारंभिक स्तर पर स्वीकार करने योग्य है या नहीं। इसके बाद ही मामले की आगे की सुनवाई की दिशा स्पष्ट होगी।