सरकारी आंकड़ों में छत्तीसगढ़ में बेरोजगारी घटी, पर काम की गुणवत्ता पर सवाल
NEWS IN SHORT
- छत्तीसगढ़ में बेरोजगारी दर घटकर मात्र 2.3 प्रतिशत दर्ज हुई।
- श्रम बल में शामिल 97.7 प्रतिशत लोगों के पास रोजगार है।
- कम बेरोजगारी दर के पीछे प्रच्छन्न और अल्प-रोजगार की भूमिका।
- गुजरात और मध्य प्रदेश में भी बेरोजगारी दर काफी कम रही।
- केवल रोजगार ही नहीं, काम की गुणवत्ता पर भी सवाल बरकरार।
NEWS IN DATAIL
भारत सरकार के सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की हालिया PLFS 2025 रिपोर्ट ने रोजगार के मोर्चे पर एक नई बहस छेड़ दी है। रिपोर्ट के अनुसार, छत्तीसगढ़ में बेरोजगारी दर मात्र 2.3%है, जो राष्ट्रीय औसत से काफी कम है। वहीं, पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश में यह 1.5% और गुजरात में 1% से भी कम (0.9%)दर्ज की गई है। लेकिन क्या ये आंकड़े राज्य की आर्थिक समृद्धि का पूर्ण पैमाना हैं?
बेरोजगारी दर का असली गणित
आम जनता में यह धारणा होती है कि बेरोजगारी दर का मतलब कुल जनसंख्या में बेरोजगारों का हिस्सा है। जबकि वास्तविकता अलग है। बेरोजगारी दर का अर्थ है श्रम बल (Labor Force) में शामिल उन लोगों का प्रतिशत जो सक्रिय रूप से काम की तलाश कर रहे हैं, लेकिन उन्हें काम नहीं मिल रहा।
श्रम बल = (काम कर रहे लोग) + (काम की तलाश कर रहे लोग)
छत्तीसगढ़ के संदर्भ में, यदि दर 2.3% है, तो इसका मतलब है कि काम चाहने वाले हर 100 लोगों में से लगभग 98 को किसी न किसी रूप में काम मिला हुआ है।
क्या 97.7% लोग 'सुरक्षित' रोजगार में हैं?
तकनीकी रूप से इसका उत्तर हाँ है, लेकिन व्यावहारिक धरातल पर इसके पीछे अल्प-रोजगार (Under-employment) और प्रच्छन्न बेरोजगारी (Disguised Unemployment) का बड़ा हाथ है।
अल्प-रोजगार: छत्तीसगढ़ में एक बड़ी आबादी कृषि और असंगठित क्षेत्रों में लगी है। कम मजदूरी, दिहाड़ी मजदूरी या छोटा-मोटा स्वरोजगार करने वालों को भी रिपोर्ट में रोजगारशुदा माना जाता है।
प्रच्छन्न बेरोजगारी: खेतों में जरूरत से ज्यादा लोग लगे हुए हैं। यदि उन्हें वहां से हटा भी दिया जाए, तो उत्पादन पर फर्क नहीं पड़ेगा, फिर भी वे बेरोजगार नहीं कहलाते।
राज्यों का तुलनात्मक परिदृश्य
गुजरात (0.9%): यहां कम दर का मुख्य कारण औद्योगिक और विनिर्माण (Manufacturing) गतिविधियां हैं। जहां अकुशल श्रमिकों को आसानी से काम मिल जाता है। हालांकि, यहां भी 'जॉब क्वालिटी' और न्यूनतम वेतन एक बड़ी चुनौती है।
छत्तीसगढ़ (2.3%): राज्य की अर्थव्यवस्था में ग्रामीण और कृषि क्षेत्र का वर्चस्व है। मनरेगा जैसी योजनाओं और स्थानीय स्तर पर कृषि कार्यों ने लोगों को काम में लगाए रखा है, जिससे वे 'बेरोजगार' की श्रेणी से बाहर हो जाते हैं।
निष्कर्ष
ये आंकड़े दर्शाते हैं कि लोग जीवित रहने के लिए किसी न किसी काम में लगे हुए हैं, चाहे वह उनकी योग्यता के अनुरूप हो या नहीं। चुनौती अब केवल 'रोजगार देने' की नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण और सम्मानजनक वेतन वाले रोजगार सृजित करने की है। 2.3% का आंकड़ा संतोषजनक हो सकता है, लेकिन 'पक्के रोजगार' की तलाश अभी भी प्रदेश के युवाओं के लिए एक बड़ा संघर्ष है।
यह खबरें भी पढ़ें...
Unemployment Rate India 2025 रिपोर्ट जारी, माइनॉरिटी कम्यूनिटी में बेरोजगारी दर बढ़ा, ये हैं कारण
‘करप्शन, कर्ज और बेरोजगारी से घिरा एमपी’: जीतू पटवारी का हमला, बोले-सीएम का नैरेटिव पूरी तरह बिगड़ा
MP में बेरोजगारी पर सरकार का बड़ा खुलासा, रोजगार पोर्टल पर रजिस्टर्ड इतने बेरोजगार युवा