छत्तीसगढ़ के राष्ट्रपति की चर्चा दिल्ली तक, राष्ट्रपति भवन पहुंचा मामला, जानिए अनोखी घटना

Arun Tiwari | Oct 19, 2026, 10:05 IST
छत्तीसगढ़ के ग्रामीण का नाम राष्ट्रपति होने का मामला
छत्तीसगढ़ के एक ग्रामीण का नाम राष्ट्रपति होने का मामला अब राष्ट्रपति भवन तक पहुंच गया है। देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद का नाम किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत पहचान के रूप में दर्ज होने के इस अनोखे मामले ने एक नई बहस छेड़ दी है। अब इस मामले में संवैधानिक पदों से जुड़े शब्दों के व्यक्तिगत नाम के रूप में इस्तेमाल को लेकर कानूनी प्रावधान बनाने की मांग उठी है।

इस संबंध में ब्लॉक कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष सौरव मिश्रा ने राष्ट्रपति सचिवालय में याचिका प्रस्तुत की थी।



राष्ट्रपति सचिवालय ने याचिका को आवश्यक कार्रवाई के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय समेत संबंधित विभागों को भेज दिया है। हालांकि अभी तक इस संबंध में किसी नए कानून या नियम को मंजूरी मिलने की आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है।



घुटरा गांव के ग्रामीण का नाम है राष्ट्रपति

यह पूरा मामला छत्तीसगढ़ के एमसीबी जिले के ग्राम घुटरा का है। यहां रहने वाले एक ग्रामीण का नाम सरकारी दस्तावेजों में राष्ट्रपति दर्ज है। यह कोई हाल में रखा गया नाम नहीं है, बल्कि दशकों से सरकारी रिकॉर्ड में इसी नाम से दर्ज है।



उपलब्ध जानकारी के अनुसार संबंधित ग्रामीण का नाम प्राथमिक विद्यालय के दाखिला रजिस्टर में 14 जुलाई 1988 को राष्ट्रपति के रूप में दर्ज किया गया था। इसके बाद से शैक्षणिक दस्तावेजों और अन्य आधिकारिक रिकॉर्ड में भी यही नाम चला आ रहा है।विद्यालय के प्रधानपाठक अनिल राय के अनुसार, स्कूल के रिकॉर्ड में संबंधित व्यक्ति का नाम राष्ट्रपति ही दर्ज है। नाम दर्ज करने में किसी प्रकार की गलती होने की जानकारी सामने नहीं आई है।



खास बात यह है कि संबंधित व्यक्ति की शैक्षणिक अंकसूची और बैंक पासबुक में भी यही नाम दर्ज है। इस तरह देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद से जुड़ा शब्द एक ग्रामीण की व्यक्तिगत पहचान बन गया है। यह मामला इसलिए भी चर्चा में है, क्योंकि सामान्य बोलचाल और सरकारी कामकाज में ‘राष्ट्रपति’ शब्द का इस्तेमाल देश के राष्ट्राध्यक्ष के लिए किया जाता है। ऐसे में किसी व्यक्ति के नाम के रूप में इसके इस्तेमाल से भ्रम की स्थिति पैदा होने की आशंका जताई जा रही है।




संवैधानिक पदों के नाम पर नियम बनाने की मांग

इस मामले को राष्ट्रपति सचिवालय तक पहुंचाने वाले ब्लॉक कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष सौरव मिश्रा ने केंद्र सरकार से संवैधानिक पदों और राष्ट्रीय पहचान से जुड़े शब्दों के इस्तेमाल पर स्पष्ट नियम बनाने की मांग की है।उनकी याचिका में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और राज्यपाल जैसे संवैधानिक पदों के साथ-साथ भारत जैसे राष्ट्रीय पहचान से जुड़े शब्दों के व्यक्तिगत नाम के रूप में उपयोग को लेकर स्पष्ट कानूनी व्यवस्था बनाने का आग्रह किया गया है।



याचिकाकर्ता का कहना है कि ऐसे महत्वपूर्ण शब्दों के इस्तेमाल को लेकर नियम स्पष्ट होने चाहिए, ताकि भविष्य में इस तरह के मामलों में किसी प्रकार का भ्रम या विवाद पैदा न हो।इसके लिए मौजूदा कानूनी प्रावधानों की समीक्षा करने और जरूरत पड़ने पर नया कानून बनाने का सुझाव भी दिया गया है। याचिका में कानूनी विशेषज्ञों से परामर्श लेकर उपयुक्त विधेयक या कानूनी प्रावधान तैयार करने की मांग रखी गई है।




राष्ट्रपति सचिवालय से गृह मंत्रालय तक पहुंचा मामला

इस प्रकरण में महत्वपूर्ण घटनाक्रम यह है कि याचिका राष्ट्रपति सचिवालय तक पहुंचने के बाद संबंधित मंत्रालयों को भेज दी गई है। इससे अब मामले पर केंद्र सरकार के स्तर पर विचार किए जाने की संभावना बनी है। राष्ट्रपति सचिवालय में आम नागरिकों की याचिकाएं प्राप्त करने और उन्हें संबंधित मंत्रालयों या विभागों तक भेजने की व्यवस्था है। किसी याचिका को संबंधित विभाग को भेजे जाने का अर्थ यह नहीं होता कि उसमें की गई सभी मांगों को स्वीकार कर लिया गया है। आगे की कार्रवाई संबंधित मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र और उपलब्ध कानूनी प्रावधानों के आधार पर होती है।



ऐसे में अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि गृह मंत्रालय और संबंधित विभाग इस मांग पर क्या रुख अपनाते हैं। क्या मौजूदा कानूनों के तहत इस विषय पर कोई दिशा-निर्देश जारी किए जा सकते हैं या इसके लिए नए कानूनी प्रावधानों की आवश्यकता महसूस की जाएगी, इसका जवाब आगे की कार्रवाई से ही स्पष्ट होगा।



क्या नाम रखने की स्वतंत्रता पर भी होगी बहस

यह मामला केवल एक व्यक्ति के नाम तक सीमित नहीं है। इसके साथ नागरिकों को अपनी पसंद का नाम रखने की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय-संवैधानिक प्रतीकों की गरिमा जैसे सवाल भी जुड़े हैं।भारत में नाम व्यक्ति की पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। जन्म के समय रखा गया नाम स्कूल के रिकॉर्ड, शैक्षणिक प्रमाणपत्रों, बैंक खातों और दूसरे सरकारी दस्तावेजों में दर्ज होता है। बाद में नाम बदलने की प्रक्रिया भी कई दस्तावेजों में संशोधन की जरूरत पैदा कर सकती है।



ऐसे में यदि संवैधानिक पदों से जुड़े शब्दों के व्यक्तिगत नाम के रूप में इस्तेमाल पर रोक लगाने की मांग पर विचार होता है, तो इसके कानूनी और व्यावहारिक पहलुओं की समीक्षा करनी होगी। खासकर उन लोगों के मामलों में, जिनके नाम दशकों पहले दर्ज किए गए थे और जो लंबे समय से उसी नाम से अपनी पहचान रखते हैं।



यह भी विचारणीय होगा कि प्रस्तावित नियम केवल भविष्य में रखे जाने वाले नामों पर लागू होंगे या पहले से दर्ज नामों के संबंध में भी कोई व्यवस्था बनाई जाएगी।




अब केंद्र सरकार के फैसले पर निगाहें

घुटरा गांव के ग्रामीण का नाम राष्ट्रपति होने का मामला अब स्थानीय चर्चा से आगे बढ़कर राष्ट्रीय स्तर पर पहुंच गया है। एक ओर सरकारी दस्तावेजों में दशकों से दर्ज नाम है, तो दूसरी ओर संवैधानिक पदों से जुड़े शब्दों के इस्तेमाल पर स्पष्ट नियम बनाने की मांग।



फिलहाल इस मामले में किसी नए कानून की घोषणा नहीं हुई है और न ही संबंधित ग्रामीण का नाम बदलने के संबंध में किसी आधिकारिक आदेश की जानकारी सामने आई है। इसलिए पूरे प्रकरण में अगला कदम गृह मंत्रालय और संबंधित विभागों की प्रतिक्रिया पर निर्भर करेगा।



अब सवाल यह है कि क्या केंद्र सरकार इस अनोखे मामले को आधार बनाकर संवैधानिक पदों से जुड़े शब्दों के व्यक्तिगत इस्तेमाल पर कोई नीति तैयार करेगी या मौजूदा कानूनी व्यवस्था को पर्याप्त मानेगी। आने वाले समय में इस पर होने वाली कार्रवाई से ही स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।



  1. छत्तीसगढ़ में राष्ट्रपति नाम का मामला कहां का है?
    यह मामला छत्तीसगढ़ के एमसीबी (मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर) जिले के घुटरा गांव का है, जहां एक ग्रामीण का नाम सरकारी दस्तावेजों में ‘राष्ट्रपति’ दर्ज है।
  2. छत्तीसगढ़ के राष्ट्रपति नाम वाले ग्रामीण का नाम कब दर्ज हुआ था?
    उपलब्ध जानकारी के अनुसार, ग्रामीण का नाम प्राथमिक विद्यालय के दाखिला रजिस्टर में 14 जुलाई 1988 को ‘राष्ट्रपति’ दर्ज किया गया था।
  3. राष्ट्रपति नाम का मामला राष्ट्रपति भवन तक कैसे पहुंचा?
    ब्लॉक कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष सौरव मिश्रा ने इस मामले में राष्ट्रपति सचिवालय में याचिका प्रस्तुत की थी। इसमें संवैधानिक पदों से जुड़े शब्दों के व्यक्तिगत नाम के रूप में इस्तेमाल पर स्पष्ट कानूनी प्रावधान बनाने की मांग की गई।
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