एमपी में 2.40 लाख शस्त्र लाइसेंस पर सवाल, रिकॉर्ड में गड़बड़ी क्यों? अब ऑनलाइन होगी पूरी प्रक्रिया
लाइसेंसों के रिकॉर्ड में आखिर गड़बड़ी कहां हुई?
सरकार आवेदन, नवीनीकरण और हथियार हस्तांतरण की प्रक्रिया डिजिटल करना चाहती है। हथियारों और कारतूसों की खरीद-बिक्री का ऑनलाइन रिकॉर्ड रखा जाएगा। इससे निगरानी और पारदर्शिता बढ़ाने की योजना है। इसी बीच करीब 2.40 लाख शस्त्र लाइसेंसों के रिकॉर्ड पर सवाल खड़े हुए हैं।
जानकारी के अनुसार नेशनल डेटाबेस ऑफ आर्म्स लाइसेंस (एनडीएएल) पोर्टल पर कई लाइसेंस एक्सपायर दिख रहे हैं। इसकी एक वजह नवीनीकरण की जानकारी अपडेट नहीं होना बताई जा रही है। आवेदनों के निराकरण की जानकारी भी पोर्टल पर दर्ज नहीं होने की बात सामने आई है।
हालांकि पोर्टल पर एक्सपायर दिखने का मतलब सभी लाइसेंसों का अवैध होना नहीं है। इसके लिए संबंधित जिलों के मूल रिकॉर्ड की जांच जरूरी होगी। नवीनीकरण आदेशों का भी केंद्रीय पोर्टल के डेटा से मिलान करना होगा।
पोर्टल पर जानकारी क्यों नहीं पहुंची?
इस मामले में प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल उठ रहे हैं। यदि किसी लाइसेंस का नियमानुसार नवीनीकरण हुआ तो जानकारी पोर्टल पर क्यों नहीं पहुंची? केंद्रीय डेटाबेस में रिकॉर्ड अपडेट करने की जिम्मेदारी किसकी थी? शस्त्र लाइसेंस का रिकॉर्ड केवल कागजी औपचारिकता नहीं है। इसका सीधा संबंध सार्वजनिक सुरक्षा और हथियारों के वैध स्वामित्व से है। प्रशासनिक निगरानी के लिए भी सही रिकॉर्ड होना जरूरी है। ऐसे में डिजिटल रिकॉर्ड और वास्तविक स्थिति के बीच अंतर दूर करना चुनौती होगी। नई व्यवस्था लागू करने से पहले इन विसंगतियों को सुधारना जरूरी होगा।
गृह विभाग को प्रस्ताव भेजने की व्यवस्था बदलेगी
राज्य सरकार शस्त्र लाइसेंस (Arms License) से संबंधित आवेदन प्रक्रिया ऑनलाइन करने की तैयारी कर रही है। इसके तहत जिलों से सीधे गृह विभाग को प्रस्ताव भेजने की व्यवस्था बदलेगी। आवेदक केंद्र सरकार के एनडीएएल पोर्टल या एमपी ऑनलाइन से आवेदन कर सकेंगे। नई व्यवस्था लागू होने के बाद ऑफलाइन आवेदन प्रणाली बंद करने की योजना है।
मध्य प्रदेश राज्य इलेक्ट्रॉनिक्स विकास निगम नया पोर्टल तैयार कर रहा है। इसे केंद्रीय डेटाबेस से जोड़ा जाएगा। इससे आवेदन, नवीनीकरण और हथियार हस्तांतरण की जानकारी डिजिटल प्रणाली में उपलब्ध हो सकेगी। संबंधित रिकॉर्ड को एक व्यवस्थित प्रणाली में रखने की तैयारी है।
कारतूस किसने खरीदे और कितने खरीदे?
प्रस्तावित व्यवस्था में हथियारों और कारतूसों की खरीद-बिक्री की डिजिटल निगरानी भी शामिल है। शस्त्र विक्रेताओं को कारतूसों की प्रत्येक बिक्री की जानकारी ऑनलाइन दर्ज करनी होगी।
इससे प्रशासन के पास लाइसेंसधारकों की खरीद संबंधी जानकारी उपलब्ध होगी। किसने किस दुकान से कारतूस खरीदे, इसका रिकॉर्ड रहेगा। खरीद की तारीख और कारतूसों की संख्या भी दर्ज होगी।
कारतूसों के उपयोग से जुड़ी जानकारी भी निगरानी प्रणाली में शामिल करने की तैयारी है। इससे खरीद-बिक्री का हिसाब रखना आसान हो सकता है। हालांकि रिकॉर्ड की विश्वसनीयता विक्रेताओं की ओर से दर्ज जानकारी पर निर्भर करेगी। विक्रेताओं को समय पर सही जानकारी दर्ज करनी होगी।
शूटिंग खिलाड़ियों के लाइसेंस पर अतिरिक्त जांच
शूटिंग प्रतियोगिताओं में भाग लेने वाले खिलाड़ियों के आवेदनों की जांच भी मजबूत होगी। प्रशासन संबंधित खिलाड़ियों की सक्रिय खेल गतिविधियों का सत्यापन कराएगा। यह सत्यापन स्टेट राइफल एसोसिएशन या नेशनल राइफल एसोसिएशन ऑफ इंडिया से कराया जाएगा। संबंधित खेल संस्था की पुष्टि मिलने के बाद आवेदन प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। इसका उद्देश्य खिलाड़ियों के नाम पर किए जाने वाले आवेदनों की वास्तविकता जांचना है।
शस्त्र लाइसेंस के लिए कौन से दस्तावेज जरूरी होंगे?
शस्त्र लाइसेंस के आवेदकों को निर्धारित दस्तावेज प्रस्तुत करने होंगे। इनमें पहचान पत्र और निवास प्रमाण पत्र शामिल हैं। मेडिकल फिटनेस प्रमाण पत्र और आय संबंधी दस्तावेज भी देने होंगे।
आवेदन के साथ दी गई जानकारी का सत्यापन किया जाएगा। आपराधिक पृष्ठभूमि की जांच भी लाइसेंस संबंधी निर्णय में महत्वपूर्ण होगी। हालांकि किसी आपराधिक मामले में नाम दर्ज होना हमेशा अयोग्यता का आधार नहीं होता। हर परिस्थिति में लाइसेंस से स्वतः वंचित नहीं किया जा सकता। संबंधित निर्णय शस्त्र अधिनियम, 1959 और लागू नियमों के अनुसार होगा। इसमें संबंधित तथ्यों और कानूनी परिस्थितियों को ध्यान में रखा जाएगा।
पुराने रिकॉर्ड का मिलान जरूरी
नई ऑनलाइन व्यवस्था से शस्त्र लाइसेंस (Online Arms License) की आवेदन प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ने की उम्मीद है। हथियार हस्तांतरण और कारतूसों की खरीद-बिक्री की निगरानी भी बेहतर हो सकती है। हालांकि पुराने रिकॉर्ड की विसंगतियों को दूर करना भी उतना ही जरूरी है।
कई जिलों के नवीनीकरण आदेश और केंद्रीय पोर्टल के आंकड़ों में अंतर बताया जा रहा है। ऐसे में लाइसेंसों की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करना जरूरी होगा। इसके लिए जिलेवार रिकॉर्ड का मिलान करना होगा। लंबित प्रविष्टियों का सत्यापन भी जरूरी होगा। डेटा अपडेट करने की जिम्मेदारी भी तय करनी होगी। सबसे बड़ा सवाल है कि करीब 2.40 लाख लाइसेंसों के रिकॉर्ड में अंतर क्यों आया? नवीनीकरण की जानकारी पोर्टल पर दर्ज क्यों नहीं हुई? इन रिकॉर्ड को सुधारने की जिम्मेदारी आखिर कौन लेगा?