जमानत के बाद भी 12 दिन जेल में रहा आरोपी, हाईकोर्ट ने कहा - बाबू जज नहीं होता
News in Short
- हाईकोर्ट से जमानत मिलने के बाद भी आरोपी 12 दिन तक जेल में रहा।
- जमानत आदेश में एक धारा टाइपिंग से छूट गई और रीडर ने लौटाया।
- विशेष न्यायालय के रीडर ने जमानत की कागजात वापस कर दिए।
- हाईकोर्ट ने कहा- रीडर का काम आदेश पर फैसला करना नहीं है।
- अदालत ने टाइपिंग गलती सुधारकर जमानत आदेश को प्रभावी माना।
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जबलपुर में एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। हाईकोर्ट से जमानत मिलने के बावजूद एक आरोपी को 12 दिन तक जेल में रहना पड़ा। इसकी वजह कोर्ट के बाबू द्वारा की गई टाइपिंग की गलती थी। इस पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी की आजादी को तकनीकी खामियों की वजह से नहीं रोका जा सकता।
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जमानत आदेश में छूटी एक धारा
जबलपुर में रहने वाले जीशान खान को 10 जुलाई 2025 से एक आपराधिक मामले में जेल में रखा गया था। बाद में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर पीठ ने उसकी जमानत मंजूर कर दी। अगले ही दिन यानी 20 फरवरी को जमानत से जुड़े कागजात जबलपुर के विशेष न्यायाधीश की अदालत में पेश किए गए। लेकिन यहां एक अजीब स्थिति पैदा हो गई, जिसके कारण जमानत मिलने के बावजूद आरोपी को तुरंत राहत नहीं मिल सकी।
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रीडर ने टाइपिंग गलती बताकर लौटा दिए कागजात
मामले में सामने आया कि अदालत के क्रिमिनल रीडर ने जमानत आदेश में एक धारा का उल्लेख नहीं होने का हवाला दिया। हाईकोर्ट के आदेश में आरोपी पर लगी छह धाराओं में से अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम की धारा 3(1)(s) का उल्लेख छूट गया था।
इसी “तकनीकी कमी” को आधार बनाते हुए रीडर ने जमानत के कागजात स्वीकार नहीं किए और वकील को आदेश में सुधार करवाकर लाने के लिए वापस कर दिए। इसका नतीजा यह हुआ कि जमानत मिलने के बावजूद जीशान खान को करीब 12 दिन और जेल में रहना पड़ा।
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इस पूरे मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस अवनींद्र सिंह की बेंच ने अदालत के रीडर की कार्यप्रणाली पर सख्त नाराजगी जताई। कोर्ट ने साफ कहा कि यदि आदेश में कोई कमी दिखाई दे रही थी तो रीडर का कर्तव्य था कि वह कागजात न्यायाधीश के सामने रखता। यह फैसला करना न्यायाधीश का अधिकार है कि आदेश में क्या करना है, न कि किसी क्लर्क या रीडर का।
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पहचान साफ थी, फिर भी रोकी गई जमानत
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि हाईकोर्ट के आदेश में केस नंबर 261/2025, अपराध क्रमांक 485/2025 और आरोपी का नाम पूरी तरह स्पष्ट था। ऐसी स्थिति में केवल एक धारा छूट जाने से आरोपी की पहचान या केस में कोई भ्रम नहीं था। इसलिए इस आधार पर जमानत प्रक्रिया रोकना और आरोपी को जेल में रखना उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन माना जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी दिया हवाला
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया के एक हालिया फैसले का भी उल्लेख किया। यह मामला Aftab vs State of Uttar Pradesh (2025) से जुड़ा था। एक उप-धारा का उल्लेख न होने के कारण व्यक्ति को 28 दिन अतिरिक्त जेल में रहना पड़ा था। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार पर 5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया। कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता को छोटी-छोटी तकनीकी गलतियों के कारण नहीं छीना जा सकता।
हाईकोर्ट ने सुधारी टाइपिंग गलती
हाईकोर्ट ने जमानत आदेश में टाइपोग्राफिकल गलती सुधारी। आदेश में छूटी धारा 3(1)(s) को शामिल किया गया। कोर्ट ने यह भी कहा कि संशोधन 19 फरवरी 2026 के आदेश से प्रभावी होगा।
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अदालत की सख्त चेतावनी
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट संदेश दिया कि किसी व्यक्ति की आजादी बेहद महत्वपूर्ण अधिकार है। अदालत ने कहा कि छोटी-छोटी क्लर्कीय गलतियों या तकनीकी खामियों के आधार पर अदालत के आदेशों में देरी करना गंभीर लापरवाही है। इस फैसले को न्यायालयों में काम करने वाले कर्मचारियों और अधिकारियों के लिए एक कड़ी चेतावनी माना जा रहा है, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएं न हों।