बागेश्वर धाम में श्रद्धालु की मौत, पुलिस-पत्रकार ने दिया कंधा
समझें क्या है पूरा मामला
- मुंबई के आयरोली निवासी 63 वर्षीय सतीश कामद बागेश्वर धाम दर्शन के लिए आए थे।
- राम दरबार में अचानक हार्ट अटैक आने से उनकी मौत हो गई।
- परिवार मुंबई से हवाई मार्ग से छतरपुर पहुंचा और यहीं अंतिम उनका संस्कार किया।
- पुलिसकर्मी, पत्रकार और स्वास्थ्यकर्मियों ने अर्थी को कंधा देकर इंसानियत की मिसाल पेश की है।
- बेटी कृतिका ने बताया कि बागेश्वर धाम में अंतिम सांस लेना उनके पिता की आखिरी इच्छा थी।
आस्था की आखिरी यात्रा
कुछ लोग जिंदगी भर एक सपना पालते हैं। मुंबई के आयरोली में रहने वाले 63 वर्षीय सतीश कामद का भी एक ऐसा ही सपना था। वे चाहते थे कि उनकी आखिरी सांस छतरपुर के बागेश्वर धाम में निकले और परिवार को पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री जी का आशीर्वाद मिले। नियति ने उनकी यह इच्छा पूरी कर दी, लेकिन जिस तरह से की, उसने पूरे छतरपुर को भावुक कर दिया।
कुछ दिन पहले सतीश जब बागेश्वर धाम के राम दरबार में बैठे थे, तभी अचानक उनकी तबीयत बिगड़ गई। हार्ट अटैक इतना तेज था कि वे संभल नहीं सके और वहीं उन्होंने अंतिम सांस ली।
परिवार वालों को घटना की सूचना कैसे मिली
घटना की सूचना मिलते ही बागेश्वर धाम पुलिस चौकी को जानकारी दी गई। शव को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल छतरपुर में सुरक्षित रखा गया। मुंबई में परिवार को जैसे ही खबर मिली, पत्नी स्नेह कामद, बेटी कृतिका और भाई दिनेश कामद तुरंत हवाई मार्ग से छतरपुर पहुंचे।
सैकड़ों किलोमीटर दूर से आए इस परिवार के पास उस वक्त सिर्फ दुख था और एक अजनबी शहर था। लेकिन छतरपुर ने उन्हें अकेला नहीं छोड़ा। पोस्टमार्टम की प्रक्रिया पूरी होने के बाद सागर रोड स्थित भैंसासुर मुक्ति धाम में अंतिम संस्कार किया गया। मृतक के भाई दिनेश ने उन्हें मुखाग्नि दी।
इस अंतिम यात्रा में जो दृश्य बना, वह देखने वालों की आंखें नम कर गया। बागेश्वर धाम पुलिस चौकी के प्रधान आरक्षक रविंद्र मिश्रा, स्थानीय पत्रकार विनोद मिश्रा और जिला अस्पताल की टीम से गोविंद और संजय ने अर्थी को कंधा दिया। ये सभी सतीश कामद को जानते तक नहीं थे। फिर भी एक इंसान की आखिरी विदाई में वे परिवार की तरह साथ खड़े रहे।
परिस्थितियों को देखते हुए परिवार ने तय किया कि अंतिम संस्कार छतरपुर में ही होगा। स्थानीय लोगों, पुलिस और स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारियों ने जिस तरह सहयोग दिया, उसके लिए परिवार ने आभार जताया।
इंसानियत का वह पल जो याद रहेगा
एक पुलिसकर्मी जो ड्यूटी पर था, एक पत्रकार जो खबर करने आया था और एक अस्पताल की टीम जो रोज मरीज देखती है, इन सबने उस दिन सिर्फ अपना काम नहीं किया। उन्होंने एक परिवार को वह दिया जो शायद दूर मुंबई में भी पूरा नहीं होता।
बागेश्वर धाम आस्था का केंद्र है। लेकिन उस दिन वहां से दूर छतरपुर की एक मुक्ति धाम में इंसानियत का जो दर्शन हुआ, वह किसी भी धर्म से बड़ा था।
यह खबर क्यों जरूरी है
यह घटना हमें याद दिलाती है कि समाज का असली चेहरा संकट की घड़ी में सामने आता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51A के तहत हर नागरिक का यह मौलिक कर्तव्य है कि वह मानवीय संवेदना और भाईचारे को बनाए रखे।
पुलिस, स्वास्थ्य विभाग और पत्रकार समुदाय का इस अंतिम विदाई में शामिल होना यही बताता है कि सरकारी सेवा सिर्फ नौकरी नहीं, एक सामाजिक जिम्मेदारी भी है। ऐसी खबरें समाज को जोड़ती हैं और यह विश्वास दिलाती हैं कि अनजान जगह पर भी अपने मिल जाते हैं।
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