भगवान विष्णु की तप से कैसे प्रकट हुईं मां बगलामुखी, एमपी में हैं माता के दो चमत्कारी मंदिर
Baglamukhi Mata Temple: हिंदू धर्म में मां बगलामुखी की साधना को सबसे ज्यादा चमत्कारी माना गया है। माता को दस महाविद्याओं में आठवां स्थान मिला है। इन्हें प्यार से पीतांबरा भी कहते हैं क्योंकि इन्हें पीला रंग बेहद पसंद है।
पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक, माता का यह दिव्य स्वरूप विशेष रूप से शत्रुओं के नाश, कोर्ट-कचहरी के मामलों में जीत और लाइफ की बड़ी से बड़ी रुकावटों को दूर करने के लिए जाना जाता है।हर साल वैशाख महीने की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को माता का जन्मोत्सव बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। आइए जानते हैं माता के चमत्कारी मंदिरों और उनकी महिमा की पूरी कहानी।
मां बगलामुखी के प्रकट होने की कथा
पौराणिक कथा के मुताबिक, सतयुग में एक बार विनाशकारी ब्रह्मांडीय तूफान उठा था। इस भीषण तूफान ने पूरी सृष्टि को नष्ट करना शुरू कर दिया था। चारों ओर हाहाकार मच गया और चराचर जगत पर संकट छा गया।
सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान विष्णु अत्यंत चिंतित हो उठे। विष्णु जी ने सौराष्ट्र क्षेत्र में हरिद्रा सरोवर के तट पर तपस्या की। उनकी कठोर भक्ति से प्रसन्न होकर माता बगलामुखी प्रकट हुईं।
माता का तेज इतना दिव्य था कि उन्होंने तूफान को स्तंभित कर दिया। देवी की शक्ति से विनाश रुक गया और ब्रह्मांड सुरक्षित हो गया। माता ने वैशाख शुक्ल अष्टमी के दिन अवतार लिया था। उन्हें पीतांबरा भी कहा जाता है क्योंकि वे पीले वस्त्र धारण करती हैं।
तभी से माता की पूजा का विधान शुरू हुआ। वे हर संकट से अपने भक्तों को बचाती हैं। आज भी भक्त शत्रुओं के नाश और संकटों से मुक्ति हेतु माता की शरण में जाते हैं। माता की असीम कृपा से हर बिगड़ा काम बन जाता है।
शत्रुओं पर विजय और बाधाओं का अंत
मां बगलामुखी की साधना बहुत शक्तिशाली और अचूक मानी जाती है। वे वाणी, बुद्धि और वाक्पटुता की देवी मानी जाती हैं। कोर्ट-कचहरी के मामलों में इनकी पूजा से सफलता मिलती है। जीवन के बड़े संकटों को टालने में माता सक्षम हैं।
इनकी कृपा से इंसान को हर क्षेत्र में जीत मिलती है। जो भक्त सच्चे मन से पूजा करते हैं, वे सुरक्षित रहते हैं। माता का आशीर्वाद भक्त को निर्भय और शक्तिशाली बना देता है।
भारत में मां बगलामुखी की प्रमुख मंदिर
भारत में मां बगलामुखी के तीन सबसे शक्तिशाली सिद्धपीठ माने जाते हैं। इन मंदिरों का इतिहास और महत्व बहुत ही खास है। आइए इन तीनों मंदिरों के बारे में विस्तार से जानते हैं:
- प्राचीन बगलामुखी मंदिर, नलखेड़ा (मध्य प्रदेश)
यह बगलामुखी माता मंदिर मध्य प्रदेश के आगर-मालवा जिले के नलखेड़ा में स्थित है। माना जाता है कि इसकी स्थापना पांडवों (महाभारतकालीन बगलामुखी मंदिर) ने श्रीकृष्ण के कहने पर की थी। महाभारत युद्ध में जीत हासिल करने के लिए पांडवों ने यहां पूजा की थी। यह मंदिर लखुंदर नदी के किनारे स्थित है और बहुत जागृत माना जाता है। यहां की प्रतिमा स्वयंभू है और पूजा में पीली वस्तुओं का प्रयोग होता है। भक्त यहां शत्रुओं पर विजय पाने के लिए विशेष अनुष्ठान करवाते हैं।
- मां पीतांबरा पीठ दतिया, (मध्य प्रदेश)
दतिया में स्थित मां पीतांबरा मंदिर देश के सबसे प्रसिद्ध शक्तिपीठों में से एक है। इसकी स्थापना साल 1935 में एक महान तपस्वी स्वामीजी द्वारा की गई थी। इस मंदिर को 'सत्ता की देवी' का स्थान भी कहा जाता है। यहां बड़े-बड़े राजनेता और मशहूर हस्तियां अपनी मनोकामना लेकर आती रहती हैं। मंदिर परिसर में मां बगलामुखी के साथ धूमावती माता का भी मंदिर है। ऐसा माना जाता है कि यहां की गई प्रार्थना कभी खाली नहीं जाती है।
- बगलामुखी मंदिर, बनखंडी (हिमाचल प्रदेश)
हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के बनखंडी में माता का यह धाम स्थित है। यह मंदिर अपनी अलौकिक शक्ति और शांत वातावरण के लिए बहुत प्रसिद्ध है। यहां विशेष रूप से कोर्ट-कचहरी और कानूनी विवादों में सफलता के लिए पूजा होती है। भक्त यहां घी के दीये जलाकर माता की विशेष साधना और हवन करते हैं। इस मंदिर का संबंध भी पांडव काल के अज्ञातवास से जोड़ा जाता है। यहां आने वाले श्रद्धालु जीवन के बड़े से बड़े संकट से मुक्ति पाते हैं।
मां बगलामुखी पूजा का शुभ मुहूर्त
इस साल पूजा के लिए विशेष समय तय किया गया है। सुबह की पूजा का मुहूर्त 5.47 से 10.41 तक है। तांत्रिक पूजा अक्सर रात के समय ही की जाती है।
हालांकि सामान्य भक्त दिन में सात्विक पूजा कर सकते हैं। पूजा के समय पीले रंग का प्रयोग करना शुभ है। पीले वस्त्र पहनकर ही माता की आराधना शुरू करनी चाहिए। मुहूर्त में की गई पूजा का फल जल्दी प्राप्त होता है।
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