बालाघाट में बैगा बच्चों की मौत: छिंदवाड़ा-इंदौर के बाद फिर उजागर सिस्टम की लापरवाही
समझें क्या है पूरा मामला...
- इंदौर, छिंदवाड़ा के बाद अब बालाघाट में मासूमों की मौत।
- सिस्टम सोया रहा, बैगा बच्चे तड़प-तड़प कर मरते रहे।
- नकली सिरप से जहरीले पानी तक, तीन जिलों में एक कहानी।
- 24 मौतें, फिर भी दो अफसर सिर्फ पद से हटाए गए।
- राष्ट्रीय मानव का दर्जा, फिर भी मौत की कतार लगी।
पूनम राउत@BALAGHAT.
मध्यप्रदेश के तीन जिलों में लापरवाही से मासूमों की जान गई। छिंदवाड़ा में नकली कफ सिरप से बच्चे मरे। इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी ने कई जानें लीं।
बालाघाट के बिरसा इलाके में बैगा बच्चे कुपोषण और बीमारी से मर गए। हर बार सिस्टम सोता रहा, जांच की घोषणा हुई, पर बड़ी कार्रवाई नहीं हुई।
तीन जिले, एक जैसी कहानी
मध्यप्रदेश में बीते कुछ महीनों में तीन बड़े हादसे हुए। हर बार वजह अलग रही, पर नतीजा एक जैसा रहा। मासूमों की जान गई, सिस्टम की लापरवाही सामने आई। नेता पहुंचे, संवेदना जताई, फिर सब भूल गए।
छिंदवाड़ा में जहर बनी दवा, इंदौर में जहर बना पानी। बालाघाट में भूख और बीमारी ने बच्चों की जान ली। तीनों मामलों में जिम्मेदार अफसरों पर बड़ी कार्रवाई नहीं हुई।
लगता है जनता को अब मौन रहने की आदत हो गई है। सवाल पूछने वाले लोग कम होते जा रहे हैं। हर हादसे के बाद दो-चार दिन मातम मनता है। फिर सब कुछ भुला दिया जाता है।
छिंदवाड़ा का सिरप कांड
छिंदवाड़ा में अक्टूबर 2025 में मामला सामने आया। दूषित कफ सिरप पीने से कई बच्चों की मौत हुई। आधिकारिक आंकड़ों में 20 से ज्यादा मौतें दर्ज हुईं। मीडिया रिपोर्ट में यह संख्या और ज्यादा बताई गई।
घटना के बाद सियासत तेज हुई। सत्ता पक्ष और विपक्ष एक-दूसरे पर आरोप लगाते रहे। जांच के नाम पर खानापूर्ति हुई। किसी बड़े अफसर या कंपनी मालिक को सजा नहीं मिली।
इंदौर का भागीरथपुरा कांड
इंदौर के भागीरथपुरा में दिसंबर-जनवरी में हादसा हुआ। दूषित पानी पीने से कई लोगों की मौत हुई। सरकार ने विधानसभा में 22 मौतों की पुष्टि की। स्थानीय लोग और मीडिया इससे ज्यादा मौतें बताते हैं।
इंदौर शहर को स्वच्छता के लिए कई बार पुरस्कार मिले हैं। इसी शहर में एक छह महीने का बच्चा भी मर गया। सवाल है कि नेताओं ने इससे कोई सबक लिया या नहीं।
बालाघाट के बैगा बच्चे
अब बात बालाघाट के बिरसा इलाके की। यह क्षेत्र आदिवासी बहुल है, यहां बैगा समाज रहता है। बैगा समाज को सरकार "विशेष पिछड़ी जनजाति" और "राष्ट्रीय मानव" कहती है। फिर भी यहां स्वास्थ्य सुविधाएं और बाकी विभाग वेंटिलेटर पर थे।
प्रशासन कहता है कि सिर्फ आठ बच्चों की मौत हुई। स्थानीय लोग और सामाजिक संगठन बताते हैं कि करीब 24 बैगा बच्चे मर चुके हैं। स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट में बड़ी लापरवाही सामने आई है।
बच्चों को खसरे का टीका नहीं लगा। मलेरिया से बचाव भी नहीं मिला। सही पोषण नहीं मिला, बच्चे गंदा पानी पीते रहे। कुपोषण का शिकार होकर वे धीरे-धीरे मरते गए।
जंगल का सीना चीर कर जीने वाला बैगा समाज आज अपने ही बच्चों की लाशें गिन रहा है। जिसे सरकार कागजों में सम्मान देती है, उसी समाज के मासूम बच्चे बीमारी से तड़पकर मर रहे हैं।
कार्रवाई के नाम पर छलावा
जब बच्चे मर गए, तब प्रशासन जागा। अफसर एसी कमरों से निकलकर गांवों में पहुंचे। सत्ता पक्ष और विपक्ष के नेता भी वहां गए। उन्होंने परिवारों से मुलाकात की, सोशल मीडिया पर संवेदना दिखाई।
मलेरिया अधिकारी मनीषा जुनेजा और टीकाकरण अधिकारी डॉ. परेश उपलप को हटाया गया। दोनों को सिर्फ उनके पद से हटाया गया, सस्पेंड नहीं किया गया।
खास बात यह कि डॉ. परेश उपलप ही फिलहाल प्रभारी सीएमएचओ (CMHO – Chief Medical and Health Officer) हैं। उन पर अब तक कोई बड़ी कार्रवाई नहीं हुई है।
जनता की चुप्पी क्यों?
अपनों की मौत पर भी हम सवाल नहीं पूछते। नेताओं से इस्तीफा नहीं मांगते। दोषी अफसर की गिरफ्तारी नहीं होती। हम अगले हादसे तक सब भूल जाते हैं।
वोट देने वाली जनता ही सरकार चुनती है। फिर भी हादसों के बाद जनता खामोश हो जाती है। जब तक हम खुद सवाल नहीं पूछेंगे, सिस्टम नहीं सुधरेगा।
सिस्टम से सवाल
सवाल बहुत हैं, जवाब किसी के पास नहीं। खसरे का टीका क्यों नहीं लगा? मलेरिया वैक्सीनेशन करने वाले अफसर कहां थे? महिला बाल विकास विभाग के अधिकारी कहां थे? आशा कार्यकर्ता कहां थी? आंगनबाड़ी बंद क्यों थी, पोषण आहार समय पर क्यों नहीं मिला?
एक तरफ सरकार चांद पर जाने की बात करती है। दूसरी तरफ गांव के बच्चे कुपोषण से मर रहे हैं। सरकार कहती है खजाना खुला है, फिर मौतें क्यों हुईं?
तीनों जिलों में एक जैसी कहानी दोहराई गई। जनता मरती रही, सिस्टम सोता रहा। सवाल यह है कि आखिर कब तक यही सिलसिला चलेगा।
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