भागीरथपुरा कांड के बाद एक्शन में सरकार, रोबोट करेंगे पानी-सीवर लाइनों की जांच, 1.5 करोड़ होंगे खर्च
समझें क्या है पूरा मामला...
- इंदौर के भागीरथपुरा हादसे के बाद सरकार ने बड़ा फैसला लिया है।
- अब पानी और सीवर लाइनों की जांच रोबोट से होगी।
- दूषित पानी से भागीरथपुरा में 36 लोगों की मौत हुई थी।
- प्रदेश में ढाई लाख से ज्यादा खतरनाक क्रॉसिंग पॉइंट मिले हैं।
- इस काम पर सरकार करीब 1.5 करोड़ रुपए खर्च करेगी।
क्यों लेना पड़ा यह फैसला
इंदौर के भागीरथपुरा में दिसंबर 2025 में बड़ा हादसा हुआ था। दूषित पेयजल पीने से यहां 36 लोगों की मौत हो गई थी। जांच में पानी में मानव मल से जुड़े बैक्टीरिया मिले थे। पता चला कि सीवर लाइन लीक होकर पेयजल लाइन में मिल रही थी। अकेले भागीरथपुरा में ऐसे 260 पॉइंट्स मिले थे। इस हादसे ने पूरे प्रदेश को हिला दिया था। इसी के बाद सरकार ने बड़ा फैसला लेने की तैयारी शुरू की।
हादसे के बाद मध्यप्रदेश सरकार ने जीआईएस (Geographic Information System) प्लेटफॉर्म गरुड़ से पूरे प्रदेश की मैपिंग कराई। इस मैपिंग में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए। प्रदेश में 2.30 लाख से ज्यादा ऐसे पॉइंट्स मिले, जहां सीवर और पेयजल लाइनें एक दूसरे को क्रॉस कर रही हैं। इनमें से इंदौर में 30 हजार से ज्यादा डेंजर क्रॉसिंग पॉइंट्स हैं। भोपाल में भी 20 हजार से ज्यादा ऐसे खतरनाक पॉइंट्स मिले हैं। इन जगहों पर सीवर का पानी पेयजल में मिलने का खतरा बना रहता है।
अब रोबोट करेंगे जांच
सरकार ने अब इन डेंजर पॉइंट्स की जांच के लिए रोबोट तकनीक अपनाने का फैसला किया है। यह जांच ट्रेंचलेस टेक्नोलॉजी से होगी। इसका मतलब है कि सड़क खोदने की जरूरत नहीं पड़ेगी। रोबोट को सीसीटीवी क्रॉलर सिस्टम से पाइपलाइन में उतारा जाएगा।
इसे मौजूदा मैनहोल या एयर रिलीज वाल्व के जरिए भेजा जाएगा। रोबोट में हाई रिजॉल्यूशन कैमरा और सेंसर लगे होंगे। यह रोबोट करीब 300 मीटर लंबे केबल से जुड़ा रहेगा। पाइपलाइन के अंदर रोबोट लगातार वीडियो रिकॉर्डिंग करेगा। साथ ही जरूरी डेटा भी दर्ज करता रहेगा।
यह रोबोट 70 से 900 मिमी व्यास वाली पाइपलाइनों में काम करेगा। इसकी मदद से लीकेज, टूट फूट और अवैध कनेक्शन का पता चलेगा। इससे साफ हो जाएगा कि कहां कहां खतरा ज्यादा है। नगरीय प्रशासन एवं विकास संचालनालय ने सभी नगर निगमों को इसके निर्देश दिए हैं। नगर पालिकाओं और नगर परिषदों को भी यह आदेश दिया गया है। सभी जगह इस तकनीक से जांच अनिवार्य कर दी गई है।
एजेंसी को कैसे मिला काम
इस काम के लिए विभाग ने टेंडर जारी किया था। इसकी अनुमानित लागत 1.50 करोड़ रुपए रखी गई थी। यह काम 365 दिन में पूरा करना तय हुआ है। टेंडर में तीन कंपनियों ने बोली लगाई। इनकी दरों में जमीन आसमान का फर्क देखने को मिला।
डिजिटल सर्विलॉन्स ने 440 रुपए प्रति मीटर की दर रखी थी। फॉर्म डील ने 400 रुपए प्रति मीटर का रेट दिया था। लेकिन चेन्नई की पेरमा-लिनियर इंडस्ट्रीज ने सिर्फ 40 रुपए प्रति मीटर की बोली लगाई।
सबसे कम बोली होने के कारण इसी कंपनी को काम मिला है। कंपनी अप्रैल 2022 में रजिस्टर्ड हुई थी। इसके डायरेक्टर गणेशन और रेवती हैं। अब सभी नगरीय निकाय अपनी जरूरत के हिसाब से एस्टीमेट तैयार करेंगे। इसके बाद कंपनी को वर्क ऑर्डर जारी किया जाएगा।
देश के कई राज्यों में पहले से इस्तेमाल
मध्य प्रदेश में यह तकनीक पहली बार इस्तेमाल हो रही है। लेकिन देश के कई राज्यों में यह पहले से काम कर रही है। नीति आयोग की एक रिपोर्ट में इसका जिक्र किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक 15 से ज्यादा राज्यों में रोबोटिक पाइपलाइन जांच हो रही है। इनमें तमिलनाडु, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश शामिल हैं।
महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और दिल्ली में भी यह तकनीक इस्तेमाल हो रही है। इन राज्यों में चेन्नई की एक कंपनी के खास रोबोट काम कर रहे हैं। ये रोबोट हाई रिजॉल्यूशन कैमरों की मदद से जीआईएस मैपिंग करते हैं। साथ ही लीकेज की सटीक जानकारी भी देते हैं।
पुराने तरीके से होती थी दिक्कत
अब तक सीवर लाइनों की जांच पुराने तरीकों से होती थी। इसमें बड़े पैमाने पर सड़क और जमीन की खुदाई करनी पड़ती थी। इससे लंबे समय तक ट्रैफिक भी प्रभावित रहता था। खुदाई से कचरा बढ़ता था और पर्यावरण पर भी असर पड़ता था। आपात मरम्मत में भी काफी समय लग जाता था।
इसके अलावा बिजली और गैस जैसी अन्य भूमिगत यूटिलिटी को नुकसान का खतरा रहता था। घनी आबादी वाले इलाकों में तो जांच करना और मुश्किल हो जाता था। रोबोटिक तकनीक आने से यह सारी दिक्कतें कम होने की उम्मीद है।
खराबी मिलने पर तय समय में रिपोर्ट
रोबोटिक जांच में मिलने वाली खराबियों को तीन श्रेणियों में बांटा गया है। हर श्रेणी के लिए अलग डेडलाइन तय की गई है। क्रिटिकल श्रेणी में गंभीर लीकेज, अवैध टैपिंग और पाइपलाइन बैठने जैसी समस्याएं आती हैं। इसकी रिपोर्ट 48 घंटे के भीतर देना जरूरी होगा।
मेजर श्रेणी में सामान्य लीकेज, जॉइंट खिसकना और पाइप का आकार बिगड़ना शामिल है। इसकी रिपोर्ट तीन दिन के भीतर देनी होगी। माइनर श्रेणी में पाइप में जमी गंदगी और मामूली तलछट जैसी समस्याएं आती हैं। इन्हें मासिक रिपोर्ट में शामिल किया जाएगा।
भागीरथपुरा मामले में अब तक क्या हुआ
इंदौर के भागीरथपुरा में गंदे पानी की शिकायतें अक्टूबर नवंबर 2025 से ही आने लगी थीं। इसके बावजूद, उस समय ठोस कार्रवाई नहीं हुई थी। 24 दिसंबर को उल्टी दस्त के मामले बढ़े और मरीज अस्पताल पहुंचने लगे। 27 और 28 दिसंबर को बीमारियां तेजी से बढ़ीं।
स्वास्थ्य टीमों ने इलाके में सर्वे शुरू किया। 30 दिसंबर को 5 मौतों और 1000 से ज्यादा लोगों के बीमार होने की पुष्टि हुई। इसी दौरान पता चला कि चिह्नित लीकेज पाइपलाइन बदलने में पहले ही देरी हो चुकी थी।
31 दिसंबर को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव खुद भागीरथपुरा पहुंचे। उन्होंने पीड़ित परिवारों से मुलाकात की। 3 जनवरी 2026 को निगम आयुक्त को हटा दिया गया। एडिशनल कमिश्नर और एक ईई (Executive Engineer) को सस्पेंड किया गया।
17 जनवरी को कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी भागीरथपुरा पहुंचे। उन्होंने पीड़ित परिवारों से मुलाकात कर हालचाल जाना। 25 अगस्त 2026 को हाईकोर्ट में 36 मौतों की जांच पर सुनवाई हुई। इस दौरान 600 से ज्यादा पेज की जांच रिपोर्ट भी पेश की गई।
FAQ
- भागीरथपुरा हादसे में कितने लोगों की मौत हुई थी और इसकी वजह क्या थी?
इंदौर के भागीरथपुरा में दिसंबर 2025 में दूषित पेयजल पीने से 36 लोगों की मौत हो गई थी। जांच में पता चला कि सीवर लाइन लीक होकर पेयजल लाइन में मिल गई थी। पानी में मानव मल से जुड़े बैक्टीरिया भी पाए गए थे।
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