भाजपा सांसद महेश केवट पर फर्जीवाड़े का आरोप, चुनावी हलफनामे में सरकारी भूमि को बताया पुश्तैनी
समझें क्या है पूरा मामला...
- महेश केवट के चुनावी हलफनामे को लेकर निर्वाचन आयोग में शिकायत हुई है।
- शिकायत में हलफनामे में तीन झूठी संपत्ति घोषणाएं बताई गई हैं।
- आरोप है कि 16 साल पहले बेची जमीन को पुश्तैनी बताया गया था।
- सरकारी जमीन को भी निजी पुश्तैनी संपत्ति दिखाने का आरोप लगा है।
- शिकायतकर्ता ने धारा 125ए के तहत जांच और एफआईआर की मांग की है।
भाजपा के राज्यसभा सांसद महेश केवट अब एक नए विवाद में घिर गए हैं। कांग्रेस की राज्यसभा प्रत्याशी मीनाक्षी नटराजन का नामांकन निरस्त होने के बाद प्रदेश की राजनीति में हलचल मची थी।
अब उसी चुनाव से जुड़े भाजपा सांसद महेश केवट के हलफनामे को लेकर शिकायत सामने आई है। महेंद्र सिंह उर्फ संतोष सिंह ठाकुर ने निर्वाचन आयोग में यह शिकायत दर्ज कराई है।
क्या है पूरी शिकायत
शिकायतकर्ता का आरोप है कि केवट ने 5 जून 2026 को राज्यसभा चुनाव के लिए फॉर्म-26 दाखिल किया था। इस हलफनामे में संपत्तियों से जुड़ी कम से कम तीन बातें झूठी और भ्रामक बताई गई हैं। शिकायत में तीन अलग-अलग बिंदुओं पर आपत्ति जताई गई है। हर बिंदु सीधे संपत्ति के मालिकाना हक और रकबे से जुड़ा है।
16 साल पुरानी जमीन का दावा
शिकायत के अनुसार खसरा नंबर 455/5 की जमीन साल 2010 में ही बेची जा चुकी थी। इसी जमीन से बने खसरा 455/5/1 को महेश केवट ने 2026 के हलफनामे में अपनी पुश्तैनी संपत्ति बताया है। शिकायतकर्ता का दावा है कि इस जमीन पर उनका मालिकाना हक 16 साल पहले ही खत्म हो चुका था। ऐसे में इसे पुश्तैनी संपत्ति बताना गलत जानकारी माना जा रहा है।
सरकारी जमीन पर भी सवाल
दूसरा आरोप खसरा नंबर 455/14 को लेकर है। हलफनामे में इस जमीन को भी पुश्तैनी संपत्ति के तौर पर दिखाया गया है। वहीं, शिकायत में कहा गया है कि राजस्व रिकॉर्ड में यह जमीन शासकीय यानी सरकारी भूमि के रूप में दर्ज है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि सरकारी जमीन को निजी विरासत बताकर गलत घोषणा की गई है।
क्षेत्रफल बढ़ाकर दिखाने का आरोप
तीसरा आरोप जमीन के क्षेत्रफल और रकबे से जुड़ा है। शिकायत के मुताबिक सरकारी जमीन यानी खसरा 455/14 का क्षेत्रफल असली आंकड़े से 2.35 गुना ज्यादा दिखाया गया है। वहीं बेची जा चुकी जमीन 455/5/1 का क्षेत्रफल तीन गुना से भी अधिक बताया गया है। दोनों खसरों का रकबा भी वास्तविक राजस्व रिकॉर्ड से कहीं ज्यादा दर्शाने का आरोप है।
धारा 125ए में कार्रवाई की मांग
शिकायतकर्ता ने इस पूरे मामले को जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 125ए से जोड़ा है। यह धारा चुनावी हलफनामे में गलत जानकारी देने से जुड़े मामलों में लागू होती है। शिकायतकर्ता ने निर्वाचन आयोग से मांग की है कि हलफनामे में दी गई संपत्ति की जानकारी का राजस्व रिकॉर्ड से मिलान कराया जाए।
साथ ही दोषी पाए जाने पर महेश केवट के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग भी की गई है। शिकायत में राजस्व अधिकारियों के जरिए विस्तृत जांच कराने की बात भी कही गई है।
आगे क्या हो सकता है
निर्वाचन आयोग अब इस शिकायत की जांच करेगा। यदि राजस्व रिकॉर्ड से आरोप सही साबित होते हैं तो केवट के खिलाफ कार्रवाई हो सकती है। यह मामला आने वाले दिनों में प्रदेश की राजनीति में एक बड़ा मुद्दा बन सकता है। जब तक जांच पूरी नहीं होती, तब तक इसे सिर्फ आरोप के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।
यह खबर क्यों जरूरी है
यह खबर लोकतांत्रिक व्यवस्था में पारदर्शिता से जुड़ी है। चुनावी हलफनामे में सही जानकारी देना हर उम्मीदवार का कानूनी दायित्व है। संविधान नागरिकों को अपने जनप्रतिनिधियों के बारे में सही जानकारी जानने का अधिकार देता है।
यह खबर आरोपों पर आधारित है, इसलिए निष्पक्ष जांच पूरी होने तक अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है। निर्वाचन आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की भूमिका ऐसे मामलों में निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करना है। जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही तय करना लोकतंत्र की मजबूती के लिए जरूरी है।
FAQ
- महेश केवट पर निर्वाचन आयोग में क्या शिकायत की गई है?
शिकायतकर्ता महेंद्र सिंह ने आरोप लगाया है कि महेश केवट ने राज्यसभा चुनाव के हलफनामे में बिकी हुई जमीन और सरकारी भूमि को अपनी पुश्तैनी संपत्ति बताया है। यह शिकायत अभी जांच के चरण में है।
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