छिंदवाड़ा कलेक्टर को हाईकोर्ट की फटकार, कोर्ट ने कहा आंख मूंद कर जारी कर रहे आदेश, लगाया 50 हजार का जुर्माना
News In Short
- अवैध खनन केस में छिंदवाड़ा कलेक्टर का आदेश हाईकोर्ट ने रद्द किया।
- बिना जांच गलत व्यक्ति को ट्रक मालिक मानकर कार्रवाई की गई।
- कोर्ट ने 50 हजार का हर्जाना राज्य सरकार पर लगाया है।
- दोषी अधिकारियों से वसूली के निर्देश, व्यक्तिगत जवाबदेही तय होगी।
- आंख मूंदकर आदेश पर हाईकोर्ट ने सख्त टिप्पणी दी।
News In Detail
जबलपुर हाईकोर्ट में यह मामला तब पहुंचा जब चौरई (छिंदवाड़ा) में एक ट्रक को अवैध खनिज परिवहन करते हुए पकड़ा गया। पूछताछ में ड्राइवर ने ट्रक का मालिक सारंग रघुवंशी को बताया और इसी एक बयान के आधार पर पूरा केस तैयार कर लिया गया।
बाद में इसी आधार पर कलेक्टर (आईएएस हरेंद्र नारायण) ने वाहन राजसात करने और जुर्माना लगाने का आदेश पारित कर दिया। जिम्मेदार अधिकारियों ने ट्रक के रजिस्टर्ड मलिक की जानकारी निकालने तक की जहमत नहीं उठाई।
असली मालिक की पहचान तक नहीं की गई
सुनवाई के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि प्रशासन ने न तो वाहन के रजिस्ट्रेशन दस्तावेजों की जांच की और न ही वास्तविक मालिक बलवीर सिंह से संपर्क किया। कोर्ट ने पाया कि पूरी कार्रवाई केवल मौखिक बयान पर आधारित थी, जो प्रशासनिक प्रक्रिया की गंभीर खामी को दर्शाता है।
आंख मूंदकर आदेश देना दुर्भाग्यपूर्ण- HC
मामले की सुनवाई जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिवीजन बेंच ने की। कोर्ट ने कलेक्टर की कार्यप्रणाली पर नाराजगी जताते हुए कहा कि एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी से अपेक्षा की जाती है कि वह तथ्यों की स्वतंत्र जांच करे, न कि अधीनस्थ की रिपोर्ट को आंख मूंदकर स्वीकार करे।
छिंदवाड़ा कलेक्टर का आदेश रद्द, 50 हजार का हर्जाना
हाईकोर्ट ने 27 जनवरी 2025 को पारित कलेक्टर के आदेश को अवैध और अस्थिर बताते हुए निरस्त कर दिया। साथ ही राज्य सरकार को निर्देश दिया गया कि वह याचिकाकर्ता को 50 हजार रूपए का हर्जाना दे, जिससे उसे हुए नुकसान की भरपाई हो सके।
जवाबदेही तय, अधिकारियों से होगी वसूली
अदालत ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि यह राशि सरकारी खजाने से नहीं बल्कि उन अधिकारियों से वसूली जाएगी जिनकी लापरवाही के कारण यह गलत निर्णय लिया गया। कोर्ट का यह रुख प्रशासनिक जवाबदेही तय करने की दिशा में एक मजबूत संदेश माना जा रहा है।
अब बिना जांच कार्रवाई नहीं चलेगी
इस फैसले के जरिए हाईकोर्ट ने साफ संकेत दिया है कि अवैध माइनिंग जैसे गंभीर मामलों में भी जल्दबाजी या लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। न्यायालय ने यह स्थापित किया कि अर्ध-न्यायिक शक्तियों का उपयोग तथ्यों की पूरी जांच और निष्पक्षता के साथ ही किया जाना चाहिए, वरना अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराया जाएगा।
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