छिंदवाड़ा कफ सिरप कांड: कोर्ट ने कहा 27 मृत बच्चों के अभिभावकों को जोड़ें, डॉक्टर ने वापस ली याचिका
समझें क्या है पूरा मामला
- छिंदवाड़ा के परासिया में कफ सिरप से बच्चों की मौत का मामला है।
- डॉक्टर प्रवीण सोनी ने FIR और चार्जशीट रद्द करने की मांग की थी।
- उन्होंने BNS की धारा 105 समेत कई धाराओं को चुनौती दी थी।
- कोर्ट ने 27 मृत बच्चों के अभिभावकों को पक्षकार बनाने का निर्देश दिया।
- इस निर्देश के बाद डॉक्टर ने अपनी मौजूदा याचिका वापस ले ली।
27 बच्चों के परिवारों को जोड़ने का निर्देश
छिंदवाड़ा कफ सिरप कांड में अब नया कानूनी मोड़ आया है।।आरोपी डॉक्टर प्रवीण कुमार सोनी ने अपनी याचिका वापस ले ली। यह मामला परासिया थाने के अपराध क्रमांक 296/2025 से जुड़ा है। डॉक्टर ने हाई कोर्ट में इस मामले को चुनौती दी थी। सुनवाई के दौरान 27 बच्चों की मौत का मुद्दा सामने आया। सरकार ने बताया कि बच्चों के अभिभावक सीधे प्रभावित हैं। इसके बाद कोर्ट ने उन्हें पक्षकार बनाने का निर्देश दिया।
अभिभावक अभी याचिका में जुड़े नहीं थे
यह स्पष्ट करना जरूरी है कि 27 अभिभावक अभी पक्षकार नहीं बने थे।।कोर्ट ने उन्हें याचिका में जोड़ने का निर्देश दिया था। सरकार की ओर से इसी जरूरत की जानकारी कोर्ट को दी गई थी। अभिभावकों को जोड़ने की प्रक्रिया आगे बढ़नी थी।।इसी बीच आरोपी डॉक्टर की ओर से नया आवेदन आया। इस आवेदन में मौजूदा याचिका आगे नहीं बढ़ाने की बात कही गई। कानूनी जानकारों के अनुसार कोर्ट का रुख देते हुए मजबूरी में डॉक्टर की याचिका वापस ले ली गई।
FIR और चार्जशीट रद्द करने की मांग की थी
डॉक्टर प्रवीण सोनी ने BNSS की धारा 528 के तहत याचिका लगाई थी। उन्होंने FIR और चार्जशीट को रद्द करने की मांग की थी।
यह याचिका M.Cr.C. नंबर 14619/2026 के रूप में दाखिल हुई। याचिका में अपराध क्रमांक 296/2025 को चुनौती दी गई थी। यह अपराध परासिया थाने में दर्ज किया गया था। डॉक्टर इस पूरी कार्रवाई को खत्म कराने की मांग कर रहे थे।
धारा 105 हटाने के लिए भी दी गई थी दलील
याचिका में BNS की धारा 105 को चुनौती दी गई थी। यह धारा गैर इरादतन हत्या से जुड़ी है।।डॉक्टर ने अपने खिलाफ इस धारा को गलत बताया था।।उन्होंने खुद को पंजीकृत डॉक्टर बताया था। उनका तर्क था कि धारा 106 का प्रावधान लागू होना चाहिए।।धारा 106 चिकित्सा प्रक्रिया के दौरान मौत से जुड़ी है। डॉक्टर ने इलाज सद्भावना से करने का भी दावा किया था।
डॉक्टर ने उठाए थे सवाल
याचिका में कई दूसरी धाराओं को भी चुनौती दी गई थी। इनमें BNS की धारा 276 और 238 शामिल थीं। धारा 336(3) और 3(5) भी चार्जशीट में लगाई गई थीं। ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट की धारा 27(a) भी लगी थी। डॉक्टर ने इन आरोपों के लिए पर्याप्त सबूत नहीं होने की बात कही। उन्होंने कूटरचना और दवा में मिलावट से इनकार किया था। सोनी ने साक्ष्य मिटाने जैसे आरोपों को भी गलत बताया था।
याचिका में डॉक्टर ने क्या सफाई दी थी
डॉक्टर ने कहा था कि उन्होंने बच्चों का इलाज किया था। उनके अनुसार इलाज बच्चों के माता-पिता की सहमति से हुआ। उन्होंने किसी बच्चे की मौत की मंशा से इनकार किया था। याचिका में उन्होंने खुद को प्रतिष्ठित डॉक्टर बताया था। उन्होंने अपने खिलाफ कार्रवाई को अनुचित भी बताया था। इन दलीलों के आधार पर चार्जशीट रद्द करने की मांग हुई थी।
27 बच्चों के अभिभावकों की बात उठाई
सुनवाई के दौरान सरकार ने मृत बच्चों का मुद्दा उठाया। सरकार ने बताया कि इस घटना में 27 बच्चों की मौत हुई। इन बच्चों के अभिभावक घटना से सीधे प्रभावित बताए गए। इसी आधार पर उन्हें मामले में पक्षकार बनाने की बात कही गई। कोर्ट ने इस दलील पर आवश्यक निर्देश जारी किया। निर्देश के तहत अभिभावकों को याचिका में जोड़ा जाना था।
इस मामले की सुनवाई जस्टिस प्रमोद कुमार अग्रवाल की बेंच में 23 सितंबर को हुई। कोर्ट के निर्देश के बाद डॉक्टर की ओर से आवेदन दिया गया। आवेदन में मौजूदा मामले को आगे नहीं बढ़ाने की बात कही गई। इस आवेदन के जरिए याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी गई।
आवेदन डॉक्टर के बड़े भाई अयोध्या प्रसाद सोनी ने दिया। उन्होंने डॉक्टर की ओर से शपथ पत्र भी पेश किया। अयोध्या प्रसाद सोनी परासिया निवासी और सुनार हैं। इस आवेदन को स्वीकार करते हुए कोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए उसे डिसमिस कर दिया है।
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