मुख्यमंत्री ग्रामीण आवास मिशन बना कर्ज का दलदल: बैंकों के 1638 करोड़ रुपए फंसे

Amresh Kushwaha | Jul 04, 2026, 10:38 IST
मुख्यमंत्री ग्रामीण आवास मिशन में बैंकों के 1638 करोड़ रुपए फंसे
मध्य प्रदेश मुख्यमंत्री ग्रामीण आवास मिशन के तहत बैंकों के 1,638 करोड़ रुपए डूबने की कगार पर हैं। एसएलबीसी की 198वीं रिपोर्ट के अनुसार एनपीए बढ़कर 68.3% हो चुका है।

मध्य प्रदेश में ग्रामीण परिवारों को पक्के मकान की छत मुहैया कराने के उद्देश्य से मुख्यमंत्री ग्रामीण आवास मिशन शुरू किया गया था। यही मिशन अब वित्तीय संस्थाओं के लिए एक बड़ा सरदर्द बन चुका है। ग्रामीण क्षेत्रों में बांटे गए ऋणों (Loans) की वसूली वर्तमान समय में बैंकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती साबित हो रही है।



ताजा आंकड़ों के मुताबिक, इस महत्वाकांक्षी योजना के अंतर्गत बैंकों की कुल एक हजार 638 करोड़ रुपए की राशि डूबने की कगार पर पहुंच चुकी है। हाल ही में संपन्न हुई 198वीं राज्य स्तरीय बैंकर्स समिति (SLBC) की उच्च स्तरीय बैठक में पेश की गई आधिकारिक रिपोर्ट ने इस संकट की भयावहता को उजागर किया है।



रिपोर्ट के अनुसार, इस योजना के तहत बैंकों का एनपीए (Non-Performing Assets) यानी डूबा हुआ कर्ज चिंताजनक रूप से 68.3% के आंकड़े को छू चुका है, जिसने बैंकिंग जगत में खलबली मचा दी है।



सात सालों का पूरा लेखा-जोखा

यह बिगड़ती स्थिति न केवल बैंकों की आंतरिक वित्तीय सेहत को सीधे तौर पर नुकसान पहुंचा रही है, बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से सरकारी खजाने पर भी बोझ बढ़ा रही है। एसएलबीसी की वार्षिक और त्रैमासिक रिपोर्टों में दर्ज आंकड़े साफ गवाही देते हैं कि पिछले सात वर्षों की लंबी अवधि में इस योजना के तहत रिकवरी यानी कर्ज वसूली की जमीनी स्थिति लगातार बदतर होती चली गई है।



यदि पिछले कुछ सालों के ट्रेंड पर नजर डालें तो वित्तीय वर्ष मार्च 2020 में इस योजना का एनपीए 42% के स्तर पर दर्ज किया गया था। इसके ठीक चार साल बाद, मार्च 2024 तक यह आंकड़ा बढ़कर 53.3% पर पहुंच गया। संकट यहीं नहीं रुका, मार्च 2025 में यह और अधिक बढ़कर 63.1% हुआ। वहीं, मार्च 2026 के ताजा मूल्यांकन तक यह उछलकर 68.3% के अब तक के सबसे रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। इन समयावधियों के आंकड़े दर्शाते हैं कि ऋण अदायगी न करने की यह समस्या साल-दर-साल और गहरी होती जा रही है।



आखिर क्यों बंधे हुए हैं बैंकों के हाथ?

इस पूरे मामले में बैंकों के सामने सबसे बड़ी दुविधा यह है कि वे चाहकर भी इस डूबते हुए कर्ज की रिकवरी के लिए अपने पारंपरिक या कड़े कानूनी कदम नहीं उठा पा रहे हैं। सामान्य तौर पर, जब भी किसी लोन खाते में डिफॉल्ट होता है, तो बैंक पुराने बकाया ऋणों को निपटाने के लिए वन टाइम सेटलमेंट (OTS) यानी एकमुश्त समझौता योजना लागू करते हैं।



इससे बैंकों को अपनी फंसी हुई राशि का एक बड़ा हिस्सा वापस मिल जाता है। वहीं, मुख्यमंत्री ग्रामीण आवास मिशन के मामले में बैंकों के हाथ पूरी तरह बंधे हुए हैं। दरअसल, राज्य सरकार और बैंकों के बीच पूर्व में हस्ताक्षरित हुए समझौता ज्ञापन (MoU) में एक ऐसी जटिल कानूनी शर्त शामिल है। यह इस विशेष योजना के ऋण खातों को ओटीएस (OTS) के तहत सेटल करने से साफ तौर पर मना करती है।



बैंकों का स्पष्ट रूप से कहना है कि इसी तकनीकी और कानूनी पेंच के कारण वे कोई भी समझौता करने में असमर्थ हैं। यही मुख्य वजह है कि कर्जदार (Borrowers) भी अपनी मासिक किस्तें (EMIs) चुकाने में कोई रुचि नहीं दिखा रहे हैं।



सरकार के पाले में आई गेंद

इस गंभीर संकट को देखते हुए, हालिया एसएलबीसी (SLBC) बैठक के दौरान बैंकिंग प्रतिनिधियों द्वारा इस गंभीर मुद्दे को बेहद प्रमुखता के साथ राज्य सरकार के आला अधिकारियों के समक्ष उठाया गया। बैठक की आधिकारिक कार्यवाही और रिपोर्ट के मुताबिक, अतिरिक्त मुख्य सचिव (वित्त) ने इस विषय पर बैंकों को आश्वस्त किया है।



उन्होंने जानकारी साझा की है कि बैंकों की ओर से प्राप्त हुए इस विशेष नीतिगत प्रस्ताव पर पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के साथ बहुत बारीकी से चर्चा चल रही है। उम्मीद जताई जा रही है कि सरकार आने वाले नए वित्तीय वर्ष में इस पुरानी कानूनी समस्या के स्थाई समाधान के लिए कोई ठोस और व्यावहारिक निर्णय ले सकती है। इससे एमओयू की बाधा दूर हो सके।



बैंकिंग सेक्टर पर चौतरफा मार

आर्थिक और बैंकिंग मामलों के वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी सरकारी योजना में 68% से अधिक के ऊंचे स्तर पर एनपीए का पहुंच जाना सीधे तौर पर बैंकों के क्रेडिट पोर्टफोलियो को पूरी तरह दूषित कर देता है।



जब इतनी बड़ी पूंजी बाजार में फंस जाती है, तो बैंकों की नई ऋण देने की क्षमता गंभीर रूप से प्रभावित होती है। इसका सीधा और नकारात्मक असर ग्रामीण क्षेत्रों में चलाए जा रहे वित्तीय समावेशन के व्यापक लक्ष्यों पर पड़ता है।



जानकारों का कहना है कि यदि निकट भविष्य में एमओयू (MoU) की इन प्रतिबंधात्मक शर्तों में जरूरी संशोधन नहीं किया गया या फिर सरकार द्वारा कोई विशेष संयुक्त वसूली अभियान नहीं चलाया गया, तो यह स्थिति पूरे प्रदेश के बैंकिंग सेक्टर के लिए एक बहुत बड़े प्रणालीगत संकट (Systemic Crisis) का रूप ले सकती है।



बैंकों में लावारिस पड़े हैं 2608 करोड़ रुपए

एक तरफ जहां बैंक लोन वसूली की किल्लत से जूझ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ प्रदेश के बैंकिंग तंत्र से जुड़ा एक और चौंकाने वाला सच एसएलबीसी की रिपोर्ट में सामने आया है। मध्य प्रदेश के विभिन्न बैंकों में वर्तमान में कुल दो हजार 608.7 करोड़ रुपए की भारी-भरकम राशि जमा है। इस पर पिछले 10 वर्षों के लंबे समय से किसी भी खाताधारक या कानूनी वारिस ने कोई दावा नहीं किया है।



इन निष्क्रिय खातों (Inoperative Accounts) की इस विशाल रकम को तय नियमों के तहत भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के डिपॉजिटर एजुकेशन एंड अवेयरनेस (DEA) फंड में ट्रांसफर किया जा चुका है।



स्टेट लेवल बैंकर्स कमेटी की विस्तृत रिपोर्ट के आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश भर में कार्यरत कुल आठ हजार 775 बैंक शाखाओं के लगभग 76.78 HTML लाख खातों से इस लावारिस राशि को डीईए फंड में भेजा गया है। यदि इस बड़ी राशि का श्रेणीवार वर्गीकरण देखा जाए, तो इसमें देश के आम नागरिकों के दो हजार 42 करोड़ रुपए, विभिन्न सरकारी विभागों (Government Departments) के 284.4 करोड़ रुपए और कई स्वायत्त संस्थाओं (Institutions) के 282.3 करोड़ रुपए शामिल हैं।



इस लावारिस पैसे को वापस पाने की रेस में सरकारी विभाग काफी आगे रहे हैं। इन्होंने अपनी कुल राशि का करीब 47.85% हिस्सा क्लेम करके वापस पा लिया है। इसके विपरीत, जागरूकता की कमी के कारण आम जनता केवल 4.63% रकम ही अब तक वापस ले सकी है।



बैंकों के लिहाज से देखें तो सर्वाधिक 958 करोड़ रुपए अकेले भारतीय स्टेट बैंक में जमा हैं। कोई भी जमाकर्ता या उनका वारिस आरबीआई के अधिकृत उद्गम पोर्टल (UDGAM Portal) या अपनी संबंधित बैंक शाखा में जाकर अपनी पूर्ण केवाईसी (KYC) प्रक्रिया को पूरा कर इस अनक्लेम्ड राशि को आसानी से वापस प्राप्त कर सकता है।



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