कलेक्टरर्स की कुर्सी अब परफॉर्मेंस टेस्ट पर, कमजोर जिलों में बदलाव के संकेत
ऐसे समझें मामला...
- जन विश्वास अभियान ने जिलों की रिपोर्ट दी।
- कमजोर प्रदर्शन वाले कलेक्टर निशाने पर।
- 2017 बैच को मिल सकती है जिलों की कमान।
- मंत्रालय में अतिरिक्त प्रभार भी बदलेंगे।
- अगले सप्ताह फैसले की संभावना जताई जा रही।
मध्य प्रदेश में कलेक्टरों की पोस्टिंग को लेकर सरकार ने शायद पैमाना बदल दिया है। अब सवाल सिर्फ यह नहीं कि कौन अधिकारी किस जिले में कितने समय से है, बल्कि यह भी देखा जा रहा है कि उस जिले में जनता की शिकायतों का क्या हुआ और कलेक्टर जनता के बीच कितना दिखाई दिया।
7 जुलाई से चले जन विश्वास अभियान की रिपोर्ट के बाद कमजोर प्रदर्शन वाले जिलों में नेतृत्व बदलने की तैयारी की चर्चा तेज है। सूत्रों के मुताबिक मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और मुख्य सचिव अशोक बर्णवाल के स्तर पर शुरुआती मंथन हो चुका है।
तबादले की फाइल में अब ‘परफॉर्मेंस’ भी
सरकार के संभावित फेरबदल का सबसे अहम संकेत यही है कि इस बार कलेक्टरों का मूल्यांकन केवल प्रशासनिक जरूरत से जोड़कर नहीं देखा जा रहा।
जन विश्वास अभियान के दौरान जिलों में लोगों की शिकायतों के निराकरण, अधिकारियों की सक्रियता और जनता से सीधे संपर्क की स्थिति देखी गई। कुछ जिलों की रिपोर्ट अपेक्षित स्तर की नहीं बताई जा रही है। यही रिपोर्ट अब प्रशासनिक फैसलों का आधार बन सकती है।
सरकार का नया संदेश: दफ्तर से बाहर निकलना होगा
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा संदेश कलेक्टरों की कार्यशैली को लेकर है। सरकार चाहती है कि जिला प्रशासन सिर्फ फाइलों और बैठकों तक सीमित न रहे। अधिकारी मैदान में जाएं, लोगों की समस्या सुनें और उसके समाधान की निगरानी भी करें।
यानी कलेक्टर की भूमिका अब केवल जिला प्रशासन चलाने तक सीमित नहीं, बल्कि सरकार की योजनाओं का जमीन पर असर दिखाने से भी जोड़ी जा रही है।
कमजोर जिलों में नई टीम का प्रयोग
सूत्रों के अनुसार जिन जिलों की रिपोर्ट कमजोर मानी जा रही है, वहां नई प्रशासनिक टीम को मौका दिया जा सकता है। संभावना यह भी जताई जा रही है कि कुछ जिलों में 2017 बैच के अधिकारियों को कलेक्टर की जिम्मेदारी मिल सकती है।
अगर ऐसा होता है तो फेरबदल का एक और संदेश साफ होगा कि सरकार अपेक्षाकृत युवा अधिकारियों को मैदानी जिम्मेदारी देकर परिणाम आधारित प्रशासन पर जोर देना चाहती है।
मुख्यमंत्री की वापसी के बाद बढ़ेगी हलचल
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के दुबई दौरे से लौटने के बाद प्रशासनिक बदलाव को लेकर तस्वीर साफ होने की संभावना है। सूत्रों के मुताबिक अगले सप्ताह कुछ जिलों के कलेक्टरों के तबादले हो सकते हैं।
हालांकि, अंतिम सूची और अधिकारियों के नाम पर निर्णय सरकार के स्तर पर होना बाकी है। इसलिए फिलहाल इसे संभावित फेरबदल के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।
मंत्रालय भी फेरबदल से अछूता नहीं
बदलाव की कवायद सिर्फ जिलों तक सीमित रहने के संकेत नहीं हैं। मंत्रालय में कई अधिकारियों के पास एक से ज्यादा विभागों का अतिरिक्त प्रभार है।
इन जिम्मेदारियों को भी व्यवस्थित करने पर मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव स्तर पर चर्चा की बात सामने आ रही है। अगर अगले सप्ताह बदलाव होता है तो जिलों के साथ मंत्रालय में भी दायित्वों का पुनर्गठन देखने को मिल सकता है।
असली कहानी तबादले की नहीं, जवाबदेही की है
इस संभावित फेरबदल को सामान्य ट्रांसफर लिस्ट की तरह देखना अधूरा होगा। असली बदलाव यह है कि जनता का अनुभव अब अधिकारी की प्रशासनिक परफॉर्मेंस के पैमाने में शामिल होता दिख रहा है।
शिकायत कितनी जल्दी सुलझी, अधिकारी जनता के बीच कितने सक्रिय रहे और सरकारी योजनाओं का असर जमीन पर कितना दिखा, इन सवालों का वजन बढ़ रहा है।
अब देखना यह है कि सरकार कमजोर रिपोर्ट वाले जिलों में केवल चेहरे बदलती है या इसके साथ जवाबदेही का कोई स्थायी सिस्टम भी खड़ा करती है। यही फैसला बताएगा कि यह फेरबदल सिर्फ प्रशासनिक कवायद है या मध्य प्रदेश में ‘परफॉर्मेंस बेस्ड ब्यूरोक्रेसी’ की शुरुआत।
ये खबरें भी पढ़ें
Gen-Z से घबराई भाजपा का यूथ दांव, 1 लाख के इनाम से साधेगी युवा
19 सितंबर से पहले बड़ा एक्सपेरिमेंट, युवाओं के जरिए बदलेगा कांग्रेस का पूरा फॉर्मेट
पीएम मोदी के जन्मदिन पर MP में महीनेभर का मिशन, सेवा या सियासी संदेश?
बीजेपी में पोस्टर से स्क्रीन तक पहुंची सियासत, अब हर कहानी बनेगी कंटेंट