Vasundhara Raje Fake Letter Case: हाईकोर्ट में पेश नहीं किए गए गिरफ्तार कांग्रेसी कार्यकर्ता, CCTV में 12 घंटे का झोल
राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के कथित फर्जी लेटर से जुड़ा पोस्टर वायरल करने के आरोप में कांग्रेस के आईटी सेल कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया था। लेकिन इन्हें हाईकोर्ट में पेश नहीं किया गया। राजस्थान पुलिस ने बताया कि आरोपी ज्यूडिशल कस्टडी में हैं।
जब कोर्ट ने राजस्थान पुलिस से सवाल पूछा, तो यह सामने आया कि इस मामले में जिम्मेदार अधिकारी ही कोर्ट में पेश नहीं हुए। इसके अलावा, मध्य प्रदेश पुलिस द्वारा पेश किए गए सीसीटीवी फुटेज में रियल टाइम से 12 घंटे की देरी दिख रही थी। इस पूरे मामले की जांच और कथित आरोपियों की गिरफ्तारी को लेकर कई सवाल खड़े हो रहे हैं।
राजस्थान में ज्यूडिशल कस्टडी में हैं कांग्रेस कार्यकर्ता
इस मामले में जबलपुर हाईकोर्ट में चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय शराब की डिविजनल बेंच सुनवाई कर रही है। यह याचिका कांग्रेस आईटी सेल के कार्यकर्ताओं की बंदी प्रत्यक्षीकरण से जुड़ी हुई है। कोर्ट के पिछले आदेश के मुताबिक, तीनों कांग्रेस कार्यकर्ताओं को आज (27 अप्रैल) जबलपुर हाईकोर्ट में पेश किया जाना था।
राजस्थान पुलिस के वकील ने कोर्ट को बताया कि तीनों आरोपी ज्यूडिशल कस्टडी में हैं, इसलिए इन्हें पेश करने के लिए दो दिन का समय मांगा गया। इसके बाद उनकी गिरफ्तारी से जुड़ी कोई भी जानकारी राजस्थान पुलिस और उनके वकील ने कोर्ट को नहीं दी।
राजस्थान पुलिस ने नहीं भेजा जानकार अधिकारी
कोर्ट ने राजस्थान पुलिस से सीधे दो सवाल किए। पहला सवाल यह था कि क्या आरोपियों को गिरफ्तार करने वाले राजस्थान पुलिसकर्मी यूनिफॉर्म में थे। दूसरा सवाल यह था कि उनकी गिरफ्तारी आखिर किस प्रकार हुई? क्या राजस्थान पुलिस ने उन्हें ढूंढा या मध्य प्रदेश पुलिस ने उन्हें राजस्थान पुलिस को सौंपा था।
राजस्थान पुलिस ने बताया कि इस मामले की जांच करने वाले सक्षम अधिकारी कोर्ट में मौजूद नहीं है। इसका जवाब देने के लिए भी समय मांगा गया है।
एमपी पुलिस की पूरी प्रक्रिया पर खड़े हुए सवाल
कोर्ट ने जब एमपी पुलिस से कमिश्नर की जांच रिपोर्ट पर सवाल किया, तो बताया गया कि राजस्थान पुलिस ने एमपी पुलिस को दो मोबाइल नंबर दिए थे। इन नंबरों की जांच करने के बाद तीन आरोपियों की पहचान की गई थी। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया को लेकर भी कोर्ट में कई सवाल खड़े हो गए।
दो फोन नंबरों की जांच में कैसे बने तीन आरोपी
मध्य प्रदेश पुलिस ने बताया कि राजस्थान पुलिस से मिले दो मोबाइल नंबरों की जांच में ये पता चला कि तीनों आरोपी इन नंबरों का इस्तेमाल कर रहे थे। कोर्ट ने सबसे पहला सवाल ये पूछा कि दो मोबाइल नंबर इस्तेमाल करने वाले तीन आरोपी आखिर कैसे बनाए गए?
इसके बाद, जब भोपाल में आरोपियों की गिरफ्तारी पर सवाल किया गया, तो कोर्ट को बताया गया कि आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं की गई थी। पूछताछ के बाद उन्हें उनके परिवार वालों के हवाले कर दिया गया था। इसका सुपुर्दीगिनामा भी तैयार किया गया था।
कोर्ट ने यहां भी सवाल उठाया कि जब आरोपियों को गिरफ्तार ही नहीं किया गया था, तो फिर उन्हें उनके परिजनों के हवाले क्यों किया गया?
सीसीटीवी फुटेज में 12 घंटे का अंतर
इस मामले में कोर्ट के आदेश के बाद सीसीटीवी फुटेज पेश किए गए थे। उनमें पुलिस ने यह दावा किया था कि आरोपियों को पुलिस ट्रांसपोर्ट रिसर्च एंड इंस्टीट्यूट (PTRI) नहीं ले जाया गया था।
पुलिस ने कोर्ट को बताया कि सीसीटीवी फुटेज की क्लॉक और रियल टाइम में टाइम फीड करने की गलती के कारण 12 घंटे का अंतर है। इस पर कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई।
एमपी पुलिस की ओर से कोर्ट में हाजिर महाधिवक्ता से कोर्ट ने सवाल किया। पूछा गया कि अगर आप यह दावा कर रहे हैं कि आरोपियों को PTRI नहीं ले जाया गया था और सीसीटीवी फुटेज में 12 घंटे का अंतर है, तो बाकी के 12 घंटे की फुटेज क्यों नहीं पेश की गई? साथ ही, उन्हें भोपाल के जिस थाने में ले जाया गया था, उसकी सीसीटीवी फुटेज क्यों नहीं दिखाई गई?"
दस्तावेजों, सीसीटीवी और आरोपियों को पेश करने के आदेश
चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की डिविजनल बेंच ने राजस्थान पुलिस को आदेश दिया है। जस्टिस का कहना है कि अगली सुनवाई में तीनों कथित आरोपियों को कोर्ट में पेश किया जाए। इसके अलावा, इस मामले से जुड़ी पूरी जानकारी रखने वाले जागृति नगर पुलिस थाने के अधिकारी या अन्य संबंधित अधिकारी भी कोर्ट में मौजूद रहें।
कोर्ट ने साफ तौर पर निर्देश दिया है कि राजस्थान पुलिस गिरफ्तारी और पंचनामा जैसे सभी जरूरी दस्तावेज कोर्ट में पेश करेगी, ताकि यह साफ हो सके कि उनकी गिरफ्तारी राजस्थान पुलिस ने किस प्रक्रिया से की और क्या एमपी पुलिस ने उन्हें राजस्थान पुलिस को सौंपा है।
इसके अलावा, कोर्ट ने मध्य प्रदेश पुलिस को भी निर्देश दिए हैं। कोर्ट का कहना है कि PTRI जहांगीराबाद भोपाल की सीसीटीवी फुटेज और रियल टाइम में जो 12 घंटे का अंतर है, उसकी फुटेज भी कोर्ट में पेश की जाए।
साथ ही, आरोपियों को जिस थाने में बुलवाया गया था, वहां के सीसीटीवी फुटेज भी कोर्ट में पेश करने के लिए कहा गया है। मामले की अगली सुनवाई 29 अप्रैल को होगी।
क्या था पूरा मामला
पूरे मामले की शुरुआत उस समय हुई जब राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के नाम से एक कथित फर्जी पत्र सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। वायरल पत्र में मोहन भागवत को संबोधित करते हुए राजनीतिक मुद्दों पर टिप्पणी की गई थी।
इस पत्र को भ्रामक बताते हुए जयपुर के ज्योति नगर थाने में मामला दर्ज किया गया। जांच के दौरान भोपाल में कांग्रेस से जुड़े तीन कार्यकर्ताओं बिलाल खान, इनाम अहमद और निखिल प्रजापति को हिरासत में लिया गया।
आरोप है कि इन युवकों ने उक्त पत्र को सोशल मीडिया और व्हाट्सएप के जरिए फॉरवर्ड किया था। हालांकि उनका दावा है कि उन्होंने कोई सामग्री तैयार नहीं की बल्कि पहले से वायरल संदेश को ही साझा किया था। इसी गिरफ्तारी और कथित अवैध हिरासत को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाएं दायर की गईं। जहां अब पुलिस की कार्रवाई की वैधता पर सुनवाई जारी है।
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