ESB SI भर्ती में पुलिस कोटे और मेरिट पर विवाद, HC ने फैसला सुरक्षित रखा
समझें क्या है पूरा मामला
- ESB की SI भर्ती में पुलिस कर्मचारियों के 15% कोटे पर सवाल है।
- ज्यादा अंक वाले कर्मचारियों को ओपन सीट नहीं मिलने का आरोप है।
- याचिकाकर्ताओं ने होरिजेंटल आरक्षण नियमों के गलत इस्तेमाल का आरोप लगाया।
- पुलिस कर्मचारियों ने पहले विभाग को भी अपनी शिकायत भेजी थी।
- हाई कोर्ट ने 13 अगस्त को सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रखा।
SI भर्ती के नतीजे से शुरू हुआ विवाद
मध्य प्रदेश में SI और सूबेदार भर्ती का मामला हाई कोर्ट पहुंचा। यह याचिका रिट पिटीशन नंबर 29168/2026 में दायर हुई। याचिका 14 मौजूदा पुलिस कर्मचारियों ने मिलकर दायर की है। सभी याचिकाकर्ता मध्य प्रदेश पुलिस में काम कर रहे हैं। याचिका में ESB के अंतिम परिणाम को चुनौती दी गई है। यह परिणाम 2 जुलाई 2026 को जारी हुआ था। इसे 7 जुलाई को प्रकाशित किया गया था। याचिका में 27 अक्टूबर 2025 के भर्ती नियम भी चुनौती में हैं।
पुलिस कर्मचारियों ने किस नियम पर सवाल उठाया
याचिकाकर्ताओं का मुख्य सवाल ओपन सीट को लेकर है। उनका कहना है कि ओपन सीट किसी खास वर्ग की सीट नहीं है। यह सभी योग्य उम्मीदवारों के लिए खुली मेरिट सीट है। ज्यादा अंक वाला उम्मीदवार इसमें जगह बना सकता है। याचिका में सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला है। इनमें सौरव यादव केस का भी उल्लेख किया गया है। साधना सिंह डांगी केस का भी हवाला दिया गया है। रामनरेश उर्फ रिंकू कुशवाहा केस भी बताया गया है। याचिकाकर्ताओं के अनुसार पहले मेरिट देखी जानी चाहिए। इसके बाद होरिजेंटल कोटे का हिसाब होना चाहिए।
ज्यादा अंक वाले पुलिस कर्मचारी क्यों नाराज हैं
याचिका पुलिस विभाग में कार्यरत पुलिस कर्मचारियों ने दायर की है। इन कर्मचारियों ने ओपन कटऑफ से ज्यादा अंक पाए हैं। फिर भी उन्हें पुलिस कोटे में ही रखा गया। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह सही तरीका नहीं है। उनके अनुसार इससे कम अंक वाले उम्मीदवार आगे चले गए। ज्यादा अंक वाले कर्मचारी पीछे रह गए। याचिका में इसे समानता के खिलाफ बताया गया है। इसमें संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का भी हवाला है।
सूबेदार भर्ती के कटऑफ ने भी सवाल खड़े किए
याचिका में सूबेदार भर्ती के आंकड़े भी बताए गए हैं। UR पुलिस श्रेणी का कटऑफ 571.163920 बताया गया है। UR ओपन श्रेणी का कटऑफ 561.363553 बताया गया है। याचिकाकर्ताओं ने इसी अंतर को बड़ा आधार बनाया है। उनका कहना है कि कटऑफ में यह उलटफेर अहम है। उनके अनुसार उम्मीदवारों को पहले अलग-अलग वर्गों में रखा गया। इसके बाद उनके लिए सीटों का हिसाब लगाया गया। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि यह मेरिट के खिलाफ है।
15% पुलिस कोटे के इस्तेमाल को लेकर है विवाद
SI भर्ती में पुलिस कर्मचारियों के लिए 15% कोटा है। याचिकाकर्ताओं ने इसी कोटे के इस्तेमाल पर सवाल उठाया है। उनका कहना है कि ज्यादा अंक वाले कर्मचारी भी इसमें गिने गए। इससे कोटे की सीटें जल्दी भर गईं। इसके बाद कम अंक वाले कर्मचारियों को मौका नहीं मिल सका। याचिकाकर्ताओं ने इसे कोटे के उद्देश्य के खिलाफ बताया है। उनका कहना है कि पहले ओपन मेरिट देखी जानी चाहिए। इसके बाद बची सीटों पर पुलिस कोटा लागू होना चाहिए।
महिला और पूर्व सैनिकों का नियम भी बना मुद्दा
भर्ती नियमों में महिलाओं, पुलिस कर्मचारियों और पूर्व सैनिकों का जिक्र है। नियम में अलग शारीरिक मानकों का आधार बताया गया है। याचिकाकर्ताओं का दावा पुरुष पुलिसकर्मियों को लेकर अलग है। उनके अनुसार पुरुष पुलिसकर्मियों को कोई छूट नहीं मिली। उन्होंने दूसरे पुरुष उम्मीदवारों जैसे ही मानक पूरे किए। ऐसे में उन्हें ओपन सीट से बाहर रखना गलत है। याचिका में इसी आधार पर भर्ती नियम पर सवाल उठाया गया है।
महिला पुलिसकर्मियों के उदाहरण से भी उठे सवाल
याचिकाकर्ताओं ने महिला पुलिस उम्मीदवारों का उदाहरण भी दिया है। उनका कहना है कि कुछ महिला उम्मीदवार ओपन में पहुंचीं। यह उनकी ज्यादा मेरिट के आधार पर हुआ। लेकिन पुरुष पुलिसकर्मियों के मामले में ऐसा नहीं हुआ। याचिकाकर्ताओं ने इसे असमान व्यवहार बताया है। उनका सवाल है कि दोनों के लिए नियम अलग क्यों हों।
विभाग को पहले ही दी गई थी शिकायत
हाई कोर्ट जाने से पहले विभाग को शिकायत भेजी गई थी। यह शिकायत पुलिस मुख्यालय की चयन शाखा को दी गई थी। इसमें होरिजेंटल आरक्षण के नियमों पर सवाल उठाए गए थे। पुलिस कर्मचारियों ने खुद को विभागीय कोटे का उम्मीदवार बताया। उन्होंने कहा कि परीक्षा के सभी चरण उन्होंने पूरे किए। इसमें प्रारंभिक परीक्षा और मुख्य परीक्षा शामिल थी। इसके बाद फिजिकल और इंटरव्यू भी पूरा किया गया था। शिकायत में ओपन सीट पर समायोजन की मांग की गई थी। मांग थी कि ज्यादा अंक वालों को ओपन में रखा जाए। इसके बाद खाली पुलिस सीटों पर दूसरे कर्मचारी आएं।
पुलिस कर्मचारियों ने अपनी मेहनत का भी मुद्दा उठाया
याचिकाकर्ताओं ने विभागीय अनुभव का भी सवाल उठाया है। उनके अनुसार कर्मचारी लंबे समय से पुलिस में काम कर रहे हैं। वे ड्यूटी के साथ भर्ती परीक्षा की तैयारी कर रहे थे। दूसरे उम्मीदवारों को तैयारी के लिए ज्यादा समय मिला। पुलिस कर्मचारियों को ड्यूटी भी निभानी थी। इसके बावजूद उन्होंने परीक्षा में बेहतर अंक हासिल किए। इसी आधार पर उन्होंने अपनी मेहनत का सम्मान मांगा है। उनका कहना है कि अनुभव को कम नहीं आंका जाना चाहिए।
एक्टिंग चीफ जस्टिस की डिविजनल बेंच में हुई सुनवाई
इस मामले की सुनवाई 13 अगस्त को हुई। सुनवाई एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिविजनल बेंच में हुई। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता नमन नागरथ ने पक्ष रखा। अधिवक्ता ने आरक्षण नियमों के इस्तेमाल पर सवाल उठाए। उन्होंने ज्यादा अंक वाले कर्मचारियों का मुद्दा कोर्ट में रखा।
कोर्ट ने अनुभव और नए उम्मीदवारों पर सवाल किया
कोर्ट ने भर्ती प्रक्रिया को लेकर मौखिक सवाल भी किया। कोर्ट ने कर्मचारियों के अनुभव का मुद्दा उठाया। नए उम्मीदवारों से उनकी तुलना को लेकर भी सवाल हुआ। कोर्ट ने पूछा कि कर्मचारी पहले से विभाग में काम करते हैं। दूसरी ओर नए उम्मीदवार भी परीक्षा में शामिल हुए हैं। ऐसे में क्या कर्मचारियों के साथ भेदभाव नहीं होगा।
याचिकाकर्ताओं की ओर से इसका जवाब दिया गया। बताया गया कि पुलिस कर्मचारी ड्यूटी के साथ तैयारी करते हैं। उन्हें पढ़ाई के लिए सीमित समय मिलता है। नए उम्मीदवार पूरी तैयारी के लिए समय दे सकते हैं। इसके बावजूद पुलिस कर्मचारियों ने पूरी मेहनत की। इसलिए उनकी मेरिट को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
अब हाईकोर्ट के फैसले पर टिकी नजर
सुनवाई पूरी होने के बाद कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा। अब इस विवाद का अगला पड़ाव हाई कोर्ट का फैसला है। फैसले से भर्ती की मेरिट सूची पर असर पड़ सकता है। अगर मांग मानी गई तो बदलाव संभव है। ऐसे में ओपन सीट की मेरिट फिर देखी जा सकती है। इसके बाद पुलिस कोटे की सीटों का हिसाब बदल सकता है। फिलहाल अंतिम फैसला कोर्ट के हाथ में है। इसलिए भर्ती परिणाम को लेकर तस्वीर अभी साफ नहीं है।
मामला सिर्फ 15% कोटे तक सीमित नहीं
यह विवाद सिर्फ पुलिस कोटे की सीटों तक नहीं है। इसमें भर्ती में मेरिट तय करने का सवाल भी जुड़ा है। सवाल यह है कि ओपन सीट पहले कैसे भरी जाए। दूसरा सवाल होरिजेंटल कोटे के इस्तेमाल से जुड़ा है। तीसरा सवाल विभागीय कर्मचारियों से समान व्यवहार का है। इसी वजह से यह भर्ती विवाद अहम बन गया है।
याचिकाकर्ताओं ने संशोधित मेरिट सूची की मांग की है। उनकी मांग में ओपन सीट पहले भरने की बात है। इसके बाद बची सीटों पर पुलिस कोटा लागू हो। फिलहाल हाई कोर्ट के फैसले का इंतजार किया जा रहा है।
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