200 करोड़ की मशीनें, 1200 करोड़ का किराया: MPSCSC के टेंडर में खेल!
Aman Vaishnav | Aug 06, 2026, 09:30 IST
MPSCSC के टेंडर में खेल
Mpscsc किसानों से खरीदे जाने वाले गेहूं, धान और मूंग जैसे अनाज की जांच के लिए एआई मशीनें किराए पर ले रहा है। करीब 200 करोड़ रुपए में खरीदी जा सकने वाली मशीनों के लिए 1200 करोड़ रुपए किराया देने की तैयारी है।
समझें क्या है पूरा मामला...
- एमपी स्टेट सिविल सप्लाईज कॉर्पोरेशन लिमिटेड एआई मशीनें किराए पर लेने जा रहा है।
- ये मशीनें गेहूं, चना, धान और मूंग की जांच करेंगी।
- खरीदी में इन पर करीब 200 करोड़ रुपए खर्च होंगे।
- लेकिन किराए के मॉडल में 1200 करोड़ रुपए चुकाने की तैयारी है।
- इसी वजह से टेंडर की प्रक्रिया अब सवालों में घिर गई है।
किराया क्यों, खरीदी क्यों नहीं
शुरुआत में 2500 मशीनें ली जाएंगी। बाद में इनकी संख्या बढ़ाकर तार हजार की जाएगी। टेंडर के मुताबिक ये मशीनें सात साल तक किराए पर रहेंगी।
हर साल कम से कम 120 दिन का किराया दिया जाएगा। सात साल पूरे होने पर ही मशीनों का मालिकाना हक कॉर्पोरेशन को मिलेगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि एक मशीन की अधिकतम कीमत करीब पांच लाख रुपए है। इसमें रखरखाव और एआई लाइसेंस भी शामिल है।
इस हिसाब से चार हजार मशीनें करीब 200 करोड़ रुपए में खरीदी जा सकती हैं। वहीं किराए के मॉडल में प्रति मशीन रोजाना 3 हजार 500 से 4 हजार रुपए चुकाने का प्रावधान है।
सात साल में यह रकम एक मशीन पर 30 लाख रुपए से ज्यादा बैठती है। कुल मिलाकर करीब 1200 करोड़ रुपए किराए के रूप में चुकाए जाएंगे।
सात साल के अनुबंध पर सवाल
खाद्यान्न खरीदी की व्यवस्था बदलने पर भी अनुबंध की शर्तें लागू रहेंगी। इसी वजह से विशेषज्ञ इस मॉडल को जोखिम भरा मान रहे हैं।
पात्रता शर्तें भी घेरे में
साथ ही पिछले तीन साल में कम से कम 50 मशीनें सप्लाई करने का अनुभव जरूरी है। विशेषज्ञों के मुताबिक इन शर्तों से बहुत सी कंपनियां बाहर हो सकती हैं। इससे प्रतिस्पर्धा सीमित होने का खतरा है।
अफसर की आपत्ति, फिर छुट्टी
इस फैसले पर ईडी फाइनेंस गोपाल सिंह ने आपत्ति दर्ज कराई थी। सूत्रों के मुताबिक इसके बाद उन पर दबाव बढ़ गया। कुछ समय बाद वे अवकाश पर चले गए। इस घटनाक्रम ने टेंडर प्रक्रिया को और विवादित बना दिया है।
दूसरी एजेंसियां खरीद रहीं, यहां किराया
यानी दूसरी सरकारी एजेंसियां खरीदी का रास्ता अपना रही हैं। लेकिन mpscscकिराए के मॉडल पर अड़ा हुआ है। इससे कॉर्पोरेशन के फैसले पर सवाल और गहरे हो गए हैं।
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