खाद भरी है या सिस्टम खाली? दावे और किसानों की पीड़ा में कौन सच बोल रहा है?
मध्य प्रदेश सरकार लगातार दावा कर रही है कि प्रदेश में यूरिया और डीएपी का पर्याप्त भंडार मौजूद है। दूसरी तरफ कई जिलों में किसान खाद के लिए घंटों नहीं, बल्कि कई-कई दिन तक भटकने को मजबूर हैं। स्थिति यह है कि कहीं चक्काजाम हो रहा है, कहीं प्रदर्शन हो रहे हैं और कहीं किसान टावरों पर चढ़कर विरोध दर्ज करा रहे हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा हो रहा है कि यदि गोदाम भरे हैं तो खाद आखिर खेतों तक पहुंच क्यों नहीं रही?
सवालों के घेरे में खाद वितरण व्यवस्था
खरीफ सीजन शुरू होते ही प्रदेश के कई जिलों से खाद संकट की खबरें सामने आने लगी हैं। सीहोर, गुना, रीवा, सतना, बैतूल, आगर-मालवा, टीकमगढ़, सिंगरौली और छतरपुर जैसे इलाकों में किसान खाद के लिए भटक रहे हैं। सरकारी आंकड़े उपलब्धता की बात कर रहे हैं, लेकिन जमीनी तस्वीर अलग कहानी बयान कर रही है। किसान कह रहे हैं कि मांग के मुकाबले आपूर्ति बेहद कम है।
खाद की लाइन में किसान
प्रदेश के कई वितरण केंद्रों पर सुबह से शाम तक लंबी कतारें देखी जा रही हैं। किसानों का आरोप है कि घंटों इंतजार के बाद भी उन्हें पूरी मात्रा में खाद नहीं मिल रही। कई जगहों पर किसानों को खाली हाथ लौटना पड़ रहा है। इससे खेती की तैयारी प्रभावित होने लगी है और बोवनी का समय निकलने की चिंता बढ़ रही है।
डिजिटल व्यवस्था बनी नई मुसीबत
खाद वितरण को पारदर्शी बनाने के लिए लागू की गई ई-टोकन और स्लॉट बुकिंग व्यवस्था किसानों के लिए नई परेशानी बन गई है। ग्रामीण इलाकों के कई किसानों को ऑनलाइन प्रक्रिया समझने में दिक्कत आ रही है। सर्वर डाउन और तकनीकी समस्याओं के कारण हालात और खराब हो रहे हैं। कई किसान 40 से 50 किलोमीटर दूर से केंद्रों तक पहुंच रहे हैं, लेकिन वहां भी उन्हें पर्याप्त खाद नहीं मिल पा रही।
कमी है या कहीं और जा रही है खाद?
सबसे गंभीर आरोप कालाबाजारी को लेकर लगाए जा रहे हैं। किसानों का कहना है कि सरकारी केंद्रों पर खाद नहीं मिलती, लेकिन निजी बाजार में वही खाद अधिक कीमत पर उपलब्ध हो जाती है। कुछ स्थानों पर महंगे उत्पाद खरीदने का दबाव बनाने की शिकायतें भी सामने आई हैं। यही वजह है कि अब सवाल केवल उपलब्धता का नहीं, बल्कि वितरण व्यवस्था की पारदर्शिता का भी बन गया है।
शिवपुरी में कार्रवाई ने बढ़ाए संदेह
खाद संकट के बीच शिवपुरी में प्रशासन ने बड़ी कार्रवाई करते हुए 70 बोरी डीएपी से भरी ट्रैक्टर-ट्रॉली जब्त की है। कार्रवाई के दौरान संबंधित लोगों के पास खरीद, परिवहन या बिक्री से जुड़े कोई वैध दस्तावेज नहीं मिले। पुलिस को देखते ही ट्रैक्टर चालक और उसका साथी मौके से फरार हो गए। यह घटना उन आरोपों को और बल देती है जिनमें खाद की कालाबाजारी और अवैध भंडारण की बात कही जा रही है।
जांच में नहीं मिले कागजात
जांच के दौरान अधिकारियों को उर्वरक के परिवहन और बिक्री से जुड़े कोई दस्तावेज नहीं मिले। खाद के नमूने जांच के लिए प्रयोगशाला भेजे गए हैं। रिपोर्ट आने के बाद यह स्पष्ट होगा कि मामला केवल अवैध भंडारण का है या फिर नकली खाद के नेटवर्क से भी जुड़ा हुआ है।
गोदाम से खेत तक कौन रोक रहा है खाद?
सरकार कह रही है कि प्रदेश में पर्याप्त खाद उपलब्ध है। किसान कह रहे हैं कि उन्हें खाद नहीं मिल रही। यदि दोनों दावे सही हैं तो फिर समस्या कहां है? क्या वितरण व्यवस्था फेल हो गई है? क्या कालाबाजारी सरकारी दावों पर भारी पड़ रही है? या फिर सिस्टम की कमजोरी का खामियाजा किसान भुगत रहे हैं? खरीफ सीजन के बीच यही सवाल अब सबसे बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक मुद्दा बनता जा रहा है।
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