लाखों की ठगी के बाद रकम लौटा कर किया समझौता, कोर्ट ने कहा नहीं खत्म करेंगे मामला
समझें क्या है पूरा मामला...
- कटनी में व्यापारियों से लाखों की ठगी का आरोप दो भाइयों पर लगा।
- शिकायतकर्ताओं का दावा है कि फर्जी लेटर पैड दिखाकर रकम ली गई।
- एक आरोपी ने 9 लाख रुपये लौटाए, फिर उससे समझौता हो गया।
- आरोपी ने हाई कोर्ट से एफआईआर रद्द करने की मांग की।
- हाईकोर्ट ने कहा कि समझौता जांच रोकने का आधार नहीं बन सकता।
कटनी के चर्चित 18 लाख रुपए ठगी मामले में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कहा कि केवल समझौता कर लेने या रकम लौटाने से गंभीर आपराधिक मामला खत्म नहीं हो जाता। यदि जांच जारी है और नए तथ्य सामने आ सकते हैं, तो एफआईआर रद्द नहीं की जा सकती।
जबलपुर हाईकोर्ट के जस्टिस प्रमोद कुमार अग्रवाल ने यह आदेश 24 जुलाई 2026 को सुनाया। यह फैसला 6 जुलाई 2026 को सुरक्षित रखा गया था। अदालत ने आरोपी तीरथदास मोटवानी की याचिका खारिज कर दी।
क्या था पूरा विवाद
कटनी के माधव नगर थाना क्षेत्र में अपराध क्रमांक 185/2026 दर्ज हुआ था। शिकायतकर्ताओं ने आरोप लगाया कि तीरथदास मोटवानी और उसके भाई ओम उर्फ उद्धव मोटवानी ने मोबाइल के जरिए 18 लाख रुपए लिए। जांच के दौरान आरोप लगा कि फर्जी लेटर पैड का इस्तेमाल किया गया। बाद में मामले में जालसाजी से जुड़ी दूसरी धाराएं भी जोड़ दी गईं। पुलिस ने दस्तावेजों की जांच शुरू की।
आरोपी ने लौटाए 9 लाख, फिर हुआ समझौता
सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ताओं ने कोर्ट को बताया कि तीरथदास मोटवानी ने 9 लाख रुपये वापस कर दिए। इसके बाद उन्होंने केवल उसके साथ समझौता कर लिया। हालांकि दूसरे आरोपी ओम उर्फ उद्धव मोटवानी के साथ कोई समझौता नहीं हुआ। इसलिए पूरा विवाद अभी भी खत्म नहीं माना जा सकता।
पुलिस ने कोर्ट में क्या कहा
राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि दोनों आरोपियों ने जांच में सहयोग नहीं किया। नोटिस मिलने के बाद भी वे पुलिस के सामने पेश नहीं हुए। पुलिस ने कहा कि हस्तलेख की जांच बाकी है। आरोपी के हस्ताक्षर लेने हैं। चार्जशीट भी अभी दाखिल नहीं हुई है। इसलिए जांच रोकना सही नहीं होगा।
हाई कोर्ट ने राहत देने से क्यों किया इनकार
हाई कोर्ट ने माना कि मामला अभी शुरुआती जांच में है। दस्तावेजी साक्ष्य जुटाए जा रहे हैं। आगे जांच में दूसरे तथ्य भी सामने आ सकते हैं। अदालत ने कहा कि ऐसे समय एफआईआर रद्द करना उचित नहीं होगा। केवल समझौते के आधार पर जांच खत्म नहीं की जा सकती।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का भी लिया सहारा
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों का उल्लेख किया। इनमें भजनलाल केस, ग्यान सिंह केस, नीहारिका इंफ्रास्ट्रक्चर केस, मुंशीराम केस और शारला बाजलिएल केस शामिल हैं।
इन फैसलों में कहा गया है कि जांच के शुरुआती चरण में अदालतों को बहुत कम मामलों में हस्तक्षेप करना चाहिए। यदि संज्ञेय अपराध की जांच चल रही हो, तो पुलिस को अपना काम पूरा करने देना चाहिए।
अदालत का बड़ा संदेश
इस आदेश से साफ संकेत मिला कि आर्थिक अपराधों में केवल समझौता कर लेना पर्याप्त नहीं है। यदि जालसाजी, फर्जी दस्तावेज या धोखाधड़ी की जांच बाकी है, तो अदालत एफआईआर रद्द करने में जल्दबाजी नहीं करेगी। कोर्ट ने यह भी माना कि जांच पूरी होने से पहले मामले को बंद करना न्याय के हित में नहीं होगा।
आखिर में कोर्ट ने क्या आदेश दिया
हाई कोर्ट ने कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में एफआईआर रद्द करने का कोई आधार नहीं बनता। इसलिए तीरथदास मोटवानी की याचिका खारिज कर दी गई। अब पुलिस जांच जारी रखेगी। जांच पूरी होने के बाद ही आगे की कानूनी कार्रवाई तय होगी।
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