एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की 8 हजार की पेंशन रोकने सरकार SC तक गई
मप्र सरकार कर्मचारियों के हितों के खिलाफ जाने में कोई कोताही नहीं कर रही है। हालत यह है कि एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की केवल 8 से 10 हजार रुपए की मासिक पेंशन रोकने के लिए वह सुप्रीम कोर्ट तक चली गई और आखिर में वहां हार गई। लेकिन कर्मचारी को भी जिते हुए यह सुविधा नहीं मिली और केस लड़ते समय ही उसकी मौत हो गई।
27 साल तक चला केस
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केस पर 12 लाख खर्च
सरकार ने कर्मचारी को पेंशन देने के लिए हर स्तर पर कानूनी लड़ाई लड़ने में अधिक रुचि दिखाई और इस पर 12 लाख रुपए से ज्यादा खर्च कर दिए। लेकिन वह कोर्ट आदेशों के बाद भी कर्मचारी को केवल आठ-दस हजार की पेंशन देने में हिचकते रहे। 38 साल नौकरी करने के बाद रिटायर हुए कर्मचारी के लिए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कर्मचारी के रिटायर होने की तारीख से हाई कोर्ट की सिंगल बेंच के आदेश होने तक पेंशन की जाए। मृत्यु होने के बाद पत्नी को परिवार पेंशन का लाभ दिया जाए। छह फीसदी ब्याज भी चुकाने के आदेश कोर्ट ने दिए हैं।
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FAQ
- यह मामला कब शुरू हुआ था?
यह मामला 1974 में शुरू हुआ था जब मदनलाल शर्मा को मिस्त्री के पद पर लोक निर्माण विभाग में दैनिक वेतनभोगी के रूप में नियुक्त किया गया था। - सरकार ने पेंशन क्यों नहीं दी?
सरकार ने कर्मचारी को नियमित नहीं किया था और पेंशन देने से इनकार कर दिया था। इसके बाद कर्मचारी ने कोर्ट में मामला दायर किया। - इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने क्या आदेश दिया?
सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि कर्मचारी के रिटायर होने की तारीख से पेंशन दी जाए और उनके निधन के बाद परिवार को पेंशन का लाभ दिया जाए। - इस लंबी कानूनी प्रक्रिया में कितने साल लगे?
इस मामले में सरकार और कर्मचारी के बीच कानूनी लड़ाई में लगभग 27 साल लग गए। - क्या यह मामला अन्य कर्मचारियों के लिए मिसाल बनेगा?
हां, यह मामला सरकार की नीतियों और कर्मचारियों के अधिकारों के प्रति लापरवाही को उजागर करता है और अन्य कर्मचारियों के लिए एक चेतावनी हो सकता है।
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