बेटे और बेटी की शिक्षा में फर्क क्यों? इंदौर हाईकोर्ट ने पिता की दलील को किया खारिज
समझें क्या है पूरा मामला
- इंदौर हाईकोर्ट ने बच्चों की शिक्षा को लेकर एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।
- कोर्ट ने कहा कि कोई भी पिता बेटे और बेटी की पढ़ाई के खर्च में अंतर नहीं कर सकता।
- एक नाबालिग बेटी ने अपने पिता के खिलाफ गुजारा भत्ता बढ़ाने की याचिका दायर की थी।
- पिता का तर्क था कि वह बेटे की पढ़ाई पर पहले ही बहुत पैसा खर्च कर चुका है।
- हाई कोर्ट ने पिता की दलील खारिज करते हुए बेटी का गुजारा भत्ता बढ़ाने का आदेश दिया।
मध्य प्रदेश के इंदौर हाई कोर्ट से बेटियों के हक में बड़ा फैसला आया है। अदालत ने साफ शब्दों में कहा है कि माता-पिता के लिए बेटा और बेटी दोनों एक समान हैं। इसलिए दोनों की पढ़ाई-लिखाई पर बराबर ध्यान देना जरूरी है।
यह पूरा मामला एक नाबालिग बेटी से जुड़ा हुआ है। उस बेटी ने अदालत में अपने पिता के खिलाफ एक अर्जी लगाई थी। बेटी का कहना था कि उसे मिलने वाले पैसे उसकी अच्छी पढ़ाई के लिए कम पड़ रहे हैं।
पिता की दलील को कोर्ट ने किया खारिज
इस मामले की सुनवाई हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति गजेंद्र सिंह (जस्टिस गजेंद्र सिंह इंदौर) की एकल पीठ कर रही थी। सुनवाई के दौरान पिता ने अदालत के सामने अपनी एक मजबूरी रखी। पिता ने कहा कि वह अपने बेटे की उच्च शिक्षा पर पहले ही बहुत पैसा खर्च कर रहा है।
पिता ने आगे तर्क दिया कि बेटे पर ज्यादा खर्च होने के कारण वह बेटी को अलग से अतिरिक्त राशि देने में असमर्थ है। हालांकि हाई कोर्ट ने पिता की इस दलील को मानने से साफ इनकार कर दिया।
शिक्षा हर बच्चे का बुनियादी अधिकार है
अदालत ने इस मामले पर बेहद सख्त और संवेदनशील टिप्पणी की। जज ने कहा कि बेटे और बेटी की शिक्षा को अलग-अलग नजरिए से बिल्कुल नहीं देखा जा सकता है। शिक्षा पाना हर एक बच्चे का पहला और बुनियादी अधिकार होता है।
अदालत ने आगे जोड़ा कि लड़की होने की वजह से उसकी पढ़ाई की जरूरतों को कम करके नहीं आंका जा सकता। कानून के सामने माता-पिता पर दोनों बच्चों के पालन-पोषण की जिम्मेदारी बिल्कुल बराबर रूप से लागू होती है।
बेटी की राशि बढ़ाने का दिया निर्देश
हाई कोर्ट ने नाबालिग बेटी की याचिका को सही मानते हुए उसे स्वीकार कर लिया। इसके साथ ही कोर्ट ने पिता को निर्देश दिया कि वह बेटी के भरण-पोषण की राशि में तुरंत बढ़ोतरी करे।
अदालत ने स्पष्ट किया कि बेटी को अच्छी शिक्षा, बेहतर विकास और सम्मानजनक जीवन देना पिता का कानूनी कर्तव्य है। कोई भी पिता अपनी इस बड़ी जिम्मेदारी से किसी भी बहाने पीछे नहीं हट सकता है।
इंदौर में एक नाबालिग बेटी की तरफ से पैरवी कर रहे वकील पंकज खंडेलवाल ने भी इस निर्णय की सराहना की है। उन्होंने कहा कि यह फैसला समाज में बेटियों की शिक्षा और उनके समान अधिकारों के लिए मील का पत्थर साबित होगा।
इस फैसले से साफ है कि अब कोई भी व्यक्ति पैसे की कमी का बहाना बनाकर अपनी बेटी को पढ़ने से नहीं रोक पाएगा। यह आदेश देश की हर बेटी को आगे बढ़ने का एक नया हौसला देता है।
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