प्रमोशन में आरक्षण: हाईकोर्ट ने सरकार को लगाई कड़ी फटकार, कहा- क्वांटिफिएबल डेटा कोई सीक्रेट नहीं
समझें क्या है पूरा मामला...
- हाईकोर्ट ने कहा- प्रमोशन का क्वांटिफिएबल डेटा कोई सीक्रेट नहीं है।
- सरकार को आदेश, रूल-5 के तहत तैयार पूरा डेटा प्रतिवादियों से साझा करें।
- कोर्ट ने माना कि सरकार ने 16 और 28 अक्टूबर 2025 के आदेशों का पूरा पालन नहीं किया।
- प्रतिवादी 17 जुलाई तक डेटा पर अपनी आपत्तियां दाखिल कर सकेंगे।
- मामले की अगली सुनवाई अब 21 जुलाई को दोपहर 2:30 बजे होगी।
सरकार से पूछा- कोर्ट के पुराने आदेशों का पालन किया या नहीं?
प्रमोशन में आरक्षण मामले में मंगलवार, 14 जुलाई को जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस विनय सराफ की डिवीजन बेंच में सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान कोर्ट का पूरा फोकस सरकार द्वारा पदोन्नति नियम 2025 के रूल-5 के तहत कराई गई स्टडी और उससे जुड़े क्वांटिफिएबल डेटा पर रहा। कोर्ट ने सबसे पहले सरकार से पूछा कि क्या 16 अक्टूबर और 28 अक्टूबर 2025 को दिए गए हाईकोर्ट के आदेशों का पूरा पालन किया गया है।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी- यह डेटा कोई सरकारी सीक्रेट नहीं
सुनवाई के दौरान महाधिवक्ता प्रशांत सिंह ने कहा कि पहले हाईकोर्ट के निर्देश के अनुसार यह डेटा सीलबंद लिफाफे में पेश किया गया था और प्रतिवादियों से साझा नहीं किया गया। इस पर कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि जिस तरह महाधिवक्ता का मौखिक आश्वासन रिकॉर्ड पर नहीं है, उसी तरह डेटा साझा न करने का कोई आदेश भी रिकॉर्ड पर मौजूद नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि यह क्वांटिफिएबल डेटा कोई सरकारी सीक्रेट नहीं है और इसे प्रतिवादियों को देना होगा।
सरकार के अधूरे पालन पर कोर्ट ने जताई नाराजगी
कोर्ट ने रिकॉर्ड देखने के बाद पाया कि 16 अक्टूबर 2025 को सरकार को स्टडी और सर्वे का पूरा डेटा पेश करने का निर्देश दिया गया था। 28 अक्टूबर को सरकार ने केवल सीलबंद लिफाफे में कुछ डेटा पेश किया और कहा कि कुछ अन्य दस्तावेज बाद में जमा किए जाएंगे। लेकिन उसके बाद वे दस्तावेज रिकॉर्ड पर नहीं आए। इस पर कोर्ट ने माना कि सरकार ने उसके आदेशों का पूरी तरह पालन नहीं किया।
कोर्ट बोला- बिना डेटा के प्रतिवादी आपत्ति कैसे देंगे?
डिवीजन बेंच ने कहा कि यदि प्रतिवादियों को पूरा डेटा ही उपलब्ध नहीं होगा तो वे उस पर अपनी आपत्तियां कैसे दर्ज करेंगे। इसलिए प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के तहत पूरा रिकॉर्ड प्रतिवादियों के साथ साझा किया जाना जरूरी है। कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया कि रूल-5 के तहत तैयार सभी स्टडी और सर्वे का डेटा अगले दिन तक प्रतिवादियों को उपलब्ध कराया जाए और इसकी जानकारी कोर्ट को भी दी जाए।
सरकार ने फिर दोहराया पुराना पक्ष, कोर्ट ने नहीं माना
सुनवाई की शुरुआत में सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सी.एस. वैद्यनाथन ने पिछली सुनवाई वाले तर्क दोहराए। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का हवाला देते हुए कहा कि महाधिवक्ता का मौखिक आश्वासन रिकॉर्ड का हिस्सा नहीं है। साथ ही उन्होंने लाखों रिक्त पदों पर भर्ती और रुके हुए प्रमोशन का भी मुद्दा उठाया। हालांकि कोर्ट ने डेटा साझा करने के सवाल पर सरकार की दलीलों को स्वीकार नहीं किया।
सामान्य वर्ग ने प्रमोशन पर रोक की मांग उठाई
सामान्य वर्ग की ओर से अधिवक्ता मनोज शर्मा ने सरकार द्वारा किए जा रहे प्रमोशन पर रोक लगाने की मांग की। वहीं जिन सामान्य वर्ग के कर्मचारियों का प्रमोशन नहीं हुआ है, उनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मोहम्मद अली ने हस्तक्षेप याचिका दायर की है। अब वह अगली सुनवाई में अपना पक्ष रखेंगे।
डेपुटेशन वाले कर्मचारियों पर सरकार की दलील भी खारिज
सरकार ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता डेपुटेशन पर हैं और प्रमोशन से उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। इस पर कोर्ट ने साफ कहा कि भले अधिकारी डेपुटेशन पर हों, लेकिन उनका प्रमोशन उनके मूल विभाग में होगा। इसलिए यह कहना गलत है कि प्रमोशन में आरक्षण का इन प्रतिवादियों पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
17 जुलाई तक आपत्तियां, 21 जुलाई को फिर होगी सुनवाई
सुनवाई के अंत में कोर्ट ने निर्देश दिया कि पूरा डेटा प्रतिवादियों को उपलब्ध कराया जाए। इसके बाद प्रतिवादी 17 जुलाई तक अपनी आपत्तियां दाखिल कर सकते हैं। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि वह इस मामले की प्रतिदिन सुनवाई करना चाहती थी, लेकिन जस्टिस विनय सराफ की ओबीसी आरक्षण मामले में व्यस्तता और सामान्य वर्ग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता की उपलब्धता को देखते हुए अब इस मामले की अगली सुनवाई 21 जुलाई को दोपहर 2:30 बजे होगी।
65 B सर्टिफिकेट के साथ पेन ड्राइव में दिया जाएगा डेटा
सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जानवी पंडित ने कोर्ट को बताया कि यह डेटा हजारों पन्नों में है। इसलिए इसे पेन ड्राइव के जरिए उपलब्ध कराने की अनुमति दी जाए।
इस पर कोर्ट ने कहा कि डेटा पेन ड्राइव में दिया जा सकता है, लेकिन इसके साथ साक्ष्य अधिनियम की धारा 65-B का सर्टिफिकेट भी देना होगा। इससे यह साबित हो सकेगा कि दिया गया डेटा सही और प्रमाणिक है।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी महसूस किया कि पहले महाधिवक्ता के मौखिक आश्वासन के बाद जब रिकॉर्ड में उसका उल्लेख नहीं मिला तो मामला गंभीर हो गया। अब हाईकोर्ट अपने आदेशों में कोई ऐसी गुंजाइश नहीं छोड़ना चाहता, जिससे बाद में सरकार अपने फैसले से पीछे हट सके या यू-टर्न ले सके।
ये खबरें भी पढ़िए...
MP प्रमोशन में आरक्षण मामला: जस्टिस विवेक रूसिया अलग, बनेगी नई स्पेशल बेंच
OBC आरक्षण सुनवाई 15 जुलाई को होगी, 14 जुलाई की लिस्टिंग को कोर्ट ने माना त्रुटि
बागेश्वर बाबा के भाई का गोली कांड, जमीन विवाद में युवक को मारी गोली, गंभीर
धार भोजशाला में सुप्रीम कोर्ट से स्टे नहीं, पास की जमीन पर कर सकेंगे जुमे की नमाज