कच्ची उम्र का प्यार कहीं पहुंचा न दे जेल, हाईकोर्ट ने जताई POCSO एक्ट को लेकर चिंता
समझें क्या है पूरा मामला...
- POCSO कानून 18 साल से कम उम्र के बच्चों पर लागू होता है।
- सहमति के बावजूद नाबालिग से संबंध पर केस दर्ज हो सकता है।
- हाईकोर्ट ने कानून की जानकारी की कमी पर चिंता जताई।
- अधिवक्ता अमिताभ गुप्ता ने जागरूकता बढ़ाने की मांग की।
- अब समिति नंबर 30 POCSO के पालन की निगरानी करेगी।
सोचिए, कोई लड़का बालिग होने से कुछ महीने दूर है। वह किसी लड़की के साथ रिश्ते में आता है। दोनों के बीच सहमति से संबंध बनते हैं। लड़की की उम्र 18 साल से कम है। इसके बाद वही रिश्ता आपराधिक केस में बदल जाता है।
आरोपी किशोर उम्र का हो सकता है। लेकिन कानून के तहत गंभीर सजा का सामना करना पड़ सकता है। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने इसी स्थिति पर चिंता जताई है।
किशोर उम्र में दोस्ती और आकर्षण आम बात हो सकती है। लेकिन उम्र की कानूनी सीमा स्थिति बदल देती है। लड़की की उम्र 18 साल से कम होने पर POCSO लागू हो सकता है।
ऐसे मामलों में सहमति का असर कानून के तहत सीमित हो जाता है। कई मामलों में आरोपी भी किशोर उम्र के आसपास होता है। हाई कोर्ट ने ऐसे मामलों की बढ़ती संख्या पर चिंता जताई है। कोर्ट ने जागरूकता को इस समस्या का अहम हिस्सा माना है।
अमिताभ गुप्ता ने उठाया जागरूकता का सवाल
अधिवक्ता अमिताभ गुप्ता ने वर्ष 2024 में जनहित याचिका दायर की थी। यह याचिका डब्ल्यूपी नंबर 24633/2024 के रूप में दर्ज हुई। अमिताभ गुप्ता ने खुद इस मामले की पैरवी की। उन्होंने POCSO एक्ट की धारा 43 के पालन की मांग की।
अमिताभ गुप्ता का कहना था कि कानून की जानकारी बड़े स्तर पर दी जानी चाहिए। खासकर किशोरों और उनके माता-पिता तक यह जानकारी पहुंचनी चाहिए। इससे कानून की सीमा को लेकर भ्रम कम हो सकता है।
बालिग होने में कुछ महीने बाकी, फिर भी कानून लागू
याचिका में किशोर उम्र के आपसी आकर्षण का मुद्दा उठाया गया। गुप्ता ने ऐसे मामलों को लेकर अलग सोच की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि किशोर उम्र भावनात्मक बदलाव का दौर है।
इस उम्र में कई फैसले पूरी समझ से नहीं लिए जाते। सोशल मीडिया ने किशोरों के बीच संपर्क भी आसान किया है। ऑनलाइन दोस्ती कई बार मुलाकात तक पहुंच जाती है। इसके बाद मामला POCSO केस में बदल सकता है।
कानून की जानकारी न होना बन रहा बड़ी समस्या
हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान POCSO मामलों के आंकड़े देखे। कोर्ट के अनुसार 14,531 आपराधिक अपीलें लंबित हैं। ये मामले प्रदेश की तीनों हाई कोर्ट खंडपीठों से जुड़े हैं। कई पीड़िताओं की उम्र 16 से 18 साल बताई गई है।
कई आरोपियों की उम्र 19 से 22 साल बताई गई है। कोर्ट ने जागरूकता की कमी को गंभीर कारण माना। कोर्ट के अनुसार कई लोगों को कानून की पूरी जानकारी नहीं होती।
प्रेम संबंध में घर छोड़ना भी बन सकता है केस
कोर्ट ने सुनवाई में एक अहम स्थिति पर ध्यान दिया। कई मामलों में किशोर प्रेम संबंध के कारण घर छोड़ देते हैं। बाद में परिवार की शिकायत से मामला दर्ज हो जाता है। इसके बाद POCSO कानून के तहत कार्रवाई शुरू हो सकती है।
कई बार आरोपी और पीड़िता दोनों उम्र में काफी करीब होते हैं। लेकिन कानून उम्र की तय सीमा के आधार पर लागू होता है। इसलिए किशोरों और परिवारों को इसकी जानकारी जरूरी है।
सरकार के जागरूकता कार्यक्रम, कोर्ट ने चिंता जताई
राज्य सरकार ने कोर्ट के सामने जागरूकता कार्यक्रमों की जानकारी दी। राज्य स्तर पर करीब 52 हजार लोगों की भागीदारी बताई गई। जिला स्तर पर करीब 2 लाख 73 हजार प्रतिभागी बताए गए।
एक एनजीओ के जरिए 4 लाख 50 हजार लोगों तक पहुंच बताई गई। इसके बावजूद मामले लगातार सामने आने की बात कोर्ट में रखी गई। इससे जागरूकता की पहुंच और असर पर सवाल उठता है। कोर्ट ने इसी मुद्दे को आगे देखने की जरूरत मानी।
अमिताभ गुप्ता अब कोर्ट की मदद भी करेंगे
हाई कोर्ट ने अधिवक्ता अमिताभ गुप्ता को न्याय मित्र बनाया है। अब वह POCSO से जुड़े मुद्दों पर कोर्ट की सहायता करेंगे। उनकी याचिका मुख्य स्वप्रेरणा मामले के साथ जोड़ दी गई है।
चिन्मय मिश्रा की याचिका भी इसी प्रक्रिया में शामिल हुई है। मुख्य मामला डब्ल्यूपी नंबर 39997/2024 है। यह मामला POCSO कानून के पालन से जुड़ा है। मुख्य याचिका पर आगे भी सुनवाई जारी रहेगी।
समिति नंबर 30 करेगी POCSO कानून की निगरानी
हाई कोर्ट ने समिति नंबर 30 को नई जिम्मेदारी दी है। समिति अब POCSO कानून के प्रभावी पालन को देखेगी। वह संबंधित विभागों को जरूरी निर्देश भी दे सकेगी।
रजिस्ट्रार को मामला समिति की अगली बैठक में रखने को कहा गया है। बैठक की कार्रवाई समय-समय पर हाई कोर्ट के सामने रखी जाएगी। मामले की अगली सुनवाई आठ सप्ताह बाद होगी।
सवाल सिर्फ सजा का नहीं, सही जानकारी पहुंचाने का है
इस मामले में हाई कोर्ट का ध्यान जागरूकता पर है। कानून की जानकारी घटना से पहले किशोरों तक पहुंचना जरूरी है। माता-पिता को भी POCSO की सीमा समझनी होगी।
किशोरों को उम्र से जुड़े कानूनी नियम पता होने चाहिए। सोशल मीडिया के दौर में इसकी जरूरत और बढ़ गई है। अधिवक्ता अमिताभ गुप्ता की याचिका ने इसी मुद्दे को सामने रखा। अब समिति की निगरानी से आगे की दिशा तय होगी।
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