पांच प्वाइंट में समझें पूरा मामला
- सुप्रीम कोर्ट ने निजी विश्वविद्यालयों के वित्तीय कामकाज पर सवाल उठाए हैं।
- कोर्ट ने पांच साल का पूरा आर्थिक रिकॉर्ड मांगा है।
- फीस, प्रवेश, परीक्षा और कर्मचारियों की जानकारी भी देनी होगी।
- सरकारों को विश्वविद्यालयों से जानकारी लेकर छह सप्ताह में जवाब देना होगा।
- मामले में सोशल मीडिया और स्कूल सुरक्षा को लेकर भी आदेश हुए हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने निजी विश्वविद्यालयों को लेकर बड़ा आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि विश्वविद्यालय मुनाफा कमाने वाली संस्था नहीं बन सकते। इन संस्थानों का मकसद शिक्षा देना और छात्रों का हित देखना है। संस्थानों के पैसे का जिम्मेदारी से इस्तेमाल भी जरूरी है। यह आदेश 17 सितंबर 2026 को दो जजों की बेंच ने दिया। बेंच में जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस एनवी अंजारिया शामिल थे।
पांच साल का पूरा आर्थिक हिसाब देना होगा
कोर्ट ने राज्यों को सभी विश्वविद्यालयों की जानकारी जुटाने को कहा है। इसके लिए पिछले पांच साल की ऑडिट रिपोर्ट मांगी गई है। रिपोर्ट में आय और खर्च की पूरी जानकारी देनी होगी। भुगतान पाने वाले लोगों का विवरण भी देना होगा। इसमें विश्वविद्यालय के काम से सीधे जुड़े नहीं लोगों के भुगतान भी होंगे। कोर्ट ने ऐसे मामलों में पूरी जानकारी देने को कहा है।
जमीन और सुविधाओं का हिसाब भी देना होगा
विश्वविद्यालयों को सरकारी मदद की जानकारी भी देनी होगी। इसमें जमीन मिलने और दूसरी सुविधाओं की जानकारी शामिल होगी। सरकारों से मिली किसी खास छूट का विवरण भी देना होगा। कोर्ट ने कहा कि जानकारी किसी भी हिस्से में अधूरी नहीं होनी चाहिए। राज्य सरकारें केवल विश्वविद्यालय की रिपोर्ट पर निर्भर नहीं रह सकेंगी। उन्हें जरूरी जानकारी समय पर जुटानी होगी।
फीस और एडमिशन की पूरी प्रक्रिया बतानी होगी
कोर्ट ने छात्रों के प्रवेश की प्रक्रिया का पूरा विवरण मांगा है। विश्वविद्यालयों को हर कोर्स में प्रवेश का तरीका बताना होगा। प्रश्नपत्र बनाने और परीक्षा कराने की जानकारी भी देनी होगी। उत्तर पुस्तिकाओं की जांच का तरीका भी बताना होगा। पैसे संभालने वाले लोगों की भूमिका भी बतानी होगी। प्रबंधन की भूमिका का विवरण भी रिकॉर्ड में देना होगा।
डेवलपमेंट फंड समेत हर तरह की फीस का हिसाब
विश्वविद्यालयों को छात्रों से ली गई पूरी फीस बतानी होगी। इसमें एडमिशन के समय ली गई फीस शामिल होगी। कोर्स के दौरान ली गई दूसरी राशि भी बतानी होगी। डेवलपमेंट फंड के नाम पर ली रकम भी बतानी होगी। विशेष कार्यक्रमों के नाम पर ली गई राशि भी बतानी होगी। कोर्ट ने हर तरह की ऐसी वसूली का रिकॉर्ड मांगा है।
बची हुई रकम और उसके निवेश की जानकारी भी देनी होगी
विश्वविद्यालयों के पास बची रकम का विवरण भी देना होगा। इस रकम को कहां इस्तेमाल किया गया, यह बताना होगा। अगर रकम का निवेश किया गया तो उसकी जानकारी देनी होगी। कोर्ट ने सरप्लस फंड के इस्तेमाल पर भी स्पष्ट जानकारी मांगी है। इससे संस्थानों के वित्तीय कामकाज की पूरी तस्वीर सामने आएगी।
शिक्षकों की भर्ती से लेकर कक्षाओं तक का रिकॉर्ड
विश्वविद्यालयों को शिक्षकों की भर्ती का तरीका बताना होगा। गैर-शिक्षण कर्मचारियों की भर्ती का रिकॉर्ड भी देना होगा। उनके वेतन और दूसरी सुविधाओं की जानकारी देनी होगी। सेवा शर्तें तय हैं तो उनका विवरण भी देना होगा। शिक्षकों को कितनी कक्षाएं मिलीं, यह भी बताना होगा। उन्होंने वास्तव में कितनी कक्षाएं लीं, यह भी बताना होगा। शिक्षक नहीं आए तो वैकल्पिक व्यवस्था की जानकारी देनी होगी। यह जानकारी जनवरी 2025 के बाद की अवधि की होगी।
तीन साल की शिकायतों का पूरा रिकॉर्ड मांगा
कोर्ट ने शिकायतों की व्यवस्था की जानकारी भी मांगी है। विश्वविद्यालयों को शिकायत समिति की पूरी जानकारी देनी होगी। पिछले तीन साल में मिली शिकायतों की संख्या बतानी होगी। शिकायतों की प्रकृति और उनके नतीजे भी बताने होंगे। हर शिकायत पर हुई कार्रवाई और समय सीमा भी बतानी होगी।
मेडिकल और दूसरे प्रोफेशनल कॉलेज भी दायरे में
आदेश का असर कई प्रोफेशनल संस्थानों पर भी पड़ेगा। इसमें मेडिकल, डेंटल और नर्सिंग संस्थान शामिल हैं। फार्मेसी और अन्य स्वास्थ्य संस्थान भी दायरे में हैं। संबंधित नियामक संस्थाओं को निरीक्षण की जानकारी देनी होगी। पिछले पांच साल के निरीक्षण रिकॉर्ड सामने रखने होंगे। निरीक्षण में मिली कमियां भी बतानी होंगी। कमियां दूर हुईं या नहीं, इसकी जानकारी भी देनी होगी।
अस्पताल और मेडिकल कॉलेज का संबंध भी बताना होगा
मेडिकल कॉलेजों को अपने जुड़े अस्पतालों का विवरण देना होगा। कॉलेज और अस्पताल के बीच संबंध भी बताना होगा। नियामक संस्थाओं को फैकल्टी और सहायक स्टाफ का रिकॉर्ड देना होगा। हर पद पर मौजूद डॉक्टरों की जानकारी भी मांगी गई है। संबंधित संस्थाओं के प्रमुखों को हलफनामे की पुष्टि करनी होगी।
छह सप्ताह में केंद्र और राज्यों को जवाब देना होगा
कोर्ट ने केंद्र, राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों को समय दिया है। उन्हें संबंधित विश्वविद्यालयों से जानकारी जुटानी होगी। इसके बाद छह सप्ताह में हलफनामा दाखिल करना होगा। हलफनामे संबंधित मुख्य सचिवों द्वारा सत्यापित किए जाएंगे। कोर्ट ने जानकारी छिपाने को लेकर भी चेतावनी दी है। राज्यों को पूरी जानकारी समय पर रिकॉर्ड में लानी होगी।
कोर्ट में नहीं पहुंचे तो पांच लाख का जुर्माना
सुनवाई में प्रतिनिधित्व नहीं करने वाले पक्षों पर जुर्माना लगाया गया। हर ऐसे प्रत्यर्थी पर पांच लाख रुपये का जुर्माना लगा है। यह राशि दो सप्ताह में सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री में जमा होगी। संबंधित अधिकारी को अनुपस्थिति का कारण भी बताना होगा। ऑनलाइन उपस्थिति में पक्ष नहीं बताने वाले वकीलों को भी चेतावनी मिली। उन्हें भौतिक उपस्थिति दर्ज कराने का मौका दिया गया है।
दिल्ली के स्कूल सुरक्षा मामले को भी जोड़ा गया
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली के स्कूल सुरक्षा मामले पर भी आदेश दिया। दिल्ली हाई कोर्ट में लंबित याचिका को सुप्रीम कोर्ट में मंगाया गया। इस मामले में स्कूलों की सुरक्षा से जुड़ी रिपोर्ट सामने आई थी। डॉ. आरएम शर्मा की समिति ने स्कूलों का निरीक्षण किया था। सुप्रीम कोर्ट ने निरीक्षण आगे जारी रखने की अनुमति दी। गंभीर कमियों वाली शिकायतों के आधार पर स्कूल चुने जाएंगे।
स्कूलों को निरीक्षण में पूरा सहयोग करना होगा
कोर्ट ने स्कूलों को निरीक्षण रोकने से साफ मना किया है। डॉ. आरएम शर्मा को स्कूलों में प्रवेश देना होगा। जरूरी दस्तावेज और सामग्री भी उपलब्ध करानी होगी। पुलिस और प्रशासन को भी पूरा सहयोग करना होगा। निरीक्षण में बाधा आने पर मुख्य सचिव को सूचना दी जाएगी। इसके बाद संबंधित अधिकारी निरीक्षण पूरा कराएंगे।
एआईसीटीई और दिल्ली पुलिस भी मामले में शामिल
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस आयुक्त को पक्षकार बनाया है। अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद को भी जोड़ा गया है। दोनों को तत्काल नोटिस जारी करने का आदेश दिया गया। नए पक्षों को भी अपने हलफनामे दाखिल करने होंगे। उन्हें संस्थानों से जुड़ी जानकारी अदालत के सामने रखनी होगी।
सोशल मीडिया पोस्ट हटाने का भी निर्देश
मामले से जुड़े कुछ सोशल मीडिया पोस्ट पर शिकायत हुई थी। याचिकाकर्ता ने इन्हें अपमानजनक और मानहानिकारक बताया था। कोर्ट ने पहली शिकायत में दम होने की बात कही। कोर्ट ने संबंधित सोशल मीडिया सामग्री हटाने का निर्देश दिया। एआई से बनी सामग्री को भी हटाने को कहा गया। इसके लिए इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को जोड़ा गया। मंत्रालय को आदेश का पालन सुनिश्चित करना होगा।
सीसीटीवी फुटेज पर भी अदालत की नजर
याचिकाकर्ता ने एमिटी यूनिवर्सिटी से सीसीटीवी फुटेज मांगी थी। एमिटी के वकील ने फुटेज उपलब्ध कराने की बात कही। फुटेज जांच कर रही अशोक प्रसाद टीम को दी गई है। याचिकाकर्ता को फुटेज देखने का मौका दिया गया है। वह जांच टीम को अपनी जानकारी भी दे सकती हैं।
19 नवंबर को होगी अगली सुनवाई
कोर्ट ने मामले को 19 नवंबर 2026 को सूचीबद्ध किया है। सुनवाई दोपहर दो बजे होगी। स्कूल मॉनिटरिंग कमेटी के सभी सदस्य मौजूद रहेंगे। तब तक संबंधित पक्षों को अपने जवाब दाखिल करने होंगे। शिक्षा विभाग को डॉ. शर्मा की टीम को दस लाख रुपए देने होंगे। एमिटी यूनिवर्सिटी को अशोक प्रसाद को दस लाख रुपए देने होंगे।
मामला सिर्फ एमिटी यूनिवर्सिटी तक सीमित नहीं
सुप्रीम कोर्ट के आदेश का दायरा कई संस्थानों तक है। कोर्ट ने शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता पर जोर दिया है। फीस से लेकर शिक्षकों की कक्षाओं तक जानकारी मांगी गई है। फंड से लेकर सरकारी सुविधाओं तक रिकॉर्ड मांगा गया है। अब केंद्र और राज्य सरकारों को यह जानकारी जुटानी होगी। अगली सुनवाई में इन जवाबों पर आगे कार्रवाई होगी।
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