अफसरों की खानापूर्ति खत्म: मंत्री के अधूरे वादों पर IAS की होगी सीधी जवाबदेही
समझें क्या है पूरा मामला...
- मध्य प्रदेश के स्पीकर नरेंद्र सिंह तोमर की अध्यक्षता में समिति बनी थी।
- समिति ने 6 राज्यों की विधानसभाओं के कामकाज पर रिपोर्ट तैयार की।
- मंत्री का वादा अधूरा रहने पर अब एचओडी को समिति के सामने आना होगा।
- एचओडी नहीं पहुंचे तो मुख्य सचिव को सूचना देनी होगी।
- रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को सौंपी गई है, जल्द राज्यों में लागू होगी।
वादा अधूरा तो विधानसभा में जवाब देंगे IAS अफसर
विधानसभा समितियों को और मजबूत बनाने के लिए एक खास कमेटी बनाई गई थी। इस कमेटी की अध्यक्षता मध्य प्रदेश के स्पीकर नरेंद्र सिंह तोमर ने की थी। कमेटी में छह राज्यों की विधानसभाओं के अफसर शामिल थे। कमेटी ने अपनी रिपोर्ट तैयार कर ली है। यह रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को सौंपी गई है। अब इसकी सिफारिशें जल्द राज्यों में लागू की जाएंगी।
जनता से जुड़े मामलों में जवाबदेही अब और सख्त होगी। यदि किसी मंत्री ने जनता से कोई वादा किया और वह पूरा नहीं हुआ, तो सवाल उठेंगे। ऐसे मामलों में विधायकों की समिति संबंधित विभाग को तलब कर सकेगी। अब विभाग के एचओडी को खुद समिति के सामने आना होगा। पहले अधिकारी अपने जूनियर स्टाफ को भेजकर काम चला देते थे। अब यह तरीका नहीं चलेगा।
यदि एचओडी बैठक में नहीं पहुंचे, तो इसकी जानकारी मुख्य सचिव को देनी होगी। इससे अफसरों पर जवाबदेही का दबाव बढ़ेगा। समिति के सामने सही जानकारी देना अब जरूरी होगा।
विधेयकों की जांच जरूरी
कमेटी ने पाया कि ज्यादातर विधेयक सदन में सीधे पास हो जाते हैं। इन पर गहराई से चर्चा नहीं होती। इस वजह से कानूनों में कई बार कमियां रह जाती हैं। इसलिए अब जरूरी विधेयकों को समिति के पास भेजना अनिवार्य होगा। सदन की समिति या प्रवर समिति इनकी जांच करेगी।
रिपोर्ट में देरी न हो, इसके लिए भी नियम बनाए गए हैं। समिति को अपनी रिपोर्ट तीन महीने के भीतर सदन में देनी होगी। लोगों से सुझाव लेने के लिए 15 दिन का समय तय किया गया है। किसी भी विधेयक पर चर्चा से पहले विशेषज्ञ प्रजेंटेशन देंगे। इससे विधायकों को तकनीकी बातें समझने में आसानी होगी।
कुछ खास हालात में स्पीकर को विशेष अधिकार भी मिलेगा। जरूरत पड़ने पर स्पीकर नियमों में छूट दे सकेंगे। ऐसे में विधेयक सीधे सदन में पास कराया जा सकेगा।
विशेषज्ञों से मिलेगी मदद
गंभीर मुद्दों की जांच के लिए बाहरी विशेषज्ञों की मदद ली जाएगी। जैसे सिलेक्ट कमेटी अकाउंटेंट जनरल (Accountant General) की मदद लेती है। उसी तरह अन्य समितियां भी विषय विशेषज्ञों को बुला सकेंगी। ये विशेषज्ञ अपनी राय और सबूत समिति के सामने रखेंगे।
विधानसभा में एक नई रिसर्च विंग बनाने का प्रस्ताव भी है। इस विंग में कानूनी विश्लेषक और विषय विशेषज्ञ शामिल होंगे। इससे विधानसभा सचिवालय के स्टाफ पर निर्भरता कम होगी। विधायकों को विधेयकों की गहन जांच में तकनीकी मदद मिलेगी।
अफसरों की जवाबदेही तय
अभी तक विभाग के सचिव या मुखिया समिति में नियमित रूप से नहीं आते थे। जूनियर अफसर भेजकर काम चला दिया जाता था। अब यह तरीका बंद होगा। कोई भी जूनियर अफसर समिति के सभापति की अनुमति से ही आ सकेगा।
समिति के सदस्यों को पहले से जानकारी भी मिलेगी। अफसरों को चर्चा वाले विषय पर लिखित तथ्य पहले भेजने होंगे। इससे सदस्यों को अध्ययन का पूरा समय मिलेगा। यदि कोई विभाग प्रमुख बैठक में नहीं आ सका, तो मुख्य सचिव के जरिए सूचना देनी होगी।
सदस्यों का कार्यकाल बढ़ेगा
समिति ने संसदीय कामकाज को बेहतर बनाने के लिए और भी सुझाव दिए हैं। नियमित बैठकें न होने से कामकाज प्रभावित होता है, यह बात सामने आई। इसलिए हर समिति की महीने में कम से कम एक बैठक जरूरी होगी।
अभी समिति सदस्यों का कार्यकाल सिर्फ एक साल का होता है। अब इसे बढ़ाकर विधानसभा के कुल कार्यकाल का आधा करने का प्रस्ताव है। जो सदस्य बिना अनुमति लगातार दो बैठकों में गैरहाजिर रहेंगे, उन्हें हटाया भी जा सकेगा।
डिजिटल हस्ताक्षर लागू होगा
राजस्थान विधानसभा की तरह अब डिजिटल हस्ताक्षर की प्रक्रिया भी अपनाई जाएगी। इससे कामकाज तेज और पारदर्शी होगा। कागजी प्रक्रिया में लगने वाला समय भी बचेगा।
समिति की सभी सिफारिशें अब राज्यों की विधानसभाओं में लागू होंगी। इससे जनता से जुड़े वादों पर अफसरों की जवाबदेही तय होगी। विधानसभा समितियों का काम भी पहले से बेहतर और मजबूत होगा।
यह खबर क्यों जरूरी है
यह खबर आम जनता के लिए बहुत जरूरी है क्योंकि यह सीधे जवाबदेही और पारदर्शिता से जुड़ी है। भारतीय संविधान जनता के प्रति सरकार और अफसरों की जवाबदेही तय करता है। जब मंत्री जनता से वादा करते हैं, तो उसे पूरा करना उनकी जिम्मेदारी है। अगर वादा अधूरा रहता है, तो अफसरों की जवाबदेही तय करना जरूरी हो जाता है।
यह कदम डिजिटल पारदर्शिता और सुशासन को भी बढ़ावा देगा। इससे विधानसभा समितियों का काम पहले से मजबूत होगा। जनता को अपने अधिकारों की सही जानकारी मिलेगी। यह पहल कानून के राज (Rule of Law) को भी मजबूत करेगी। यह सामाजिक नैतिकता के हिसाब से भी सही कदम है।
FAQ
- विधानसभा समिति के सामने अफसरों को क्यों पेश होना होगा?
अगर मंत्री ने जनता से कोई वादा किया और वह पूरा नहीं हुआ, तो अब विभाग के एचओडी को समिति के सामने खुद आना होगा। पहले अधिकारी जूनियर स्टाफ भेजकर काम चला देते थे, अब यह नहीं चलेगा। इससे अफसरों की जवाबदेही बढ़ेगी और जनता के वादे जल्दी पूरे होंगे।
ये खबरें भी पढ़िए...
मध्यप्रदेश में मेडिकल शिक्षा सस्ती होगी, मेरिट छात्रों की फीस एक तिहाई घटेगी
ई साक्ष्य जुटाने में पिछड़ी मध्यप्रदेश पुलिस, भोपाल-इंदौर भी जांच में फिसड्डी
MP News. पायलट भर्ती घोटाला: 4 लाख की पोस्ट पर 29 लाख खर्च करने को तैयार सरकार...
मध्यप्रदेश हाई कोर्ट में बढ़ा विवाद, उप महाधिवक्ता बोले- मेरे साइन वाले जवाब में छेड़छाड़