OBC आरक्षण: ऋग्वेद से लेकर मानव धर्मशास्त्र तक जातिगत व्यवस्था पर हाईकोर्ट में बहस

Neel Tiwari | Jul 29, 2026, 18:14 IST
ओबीसी आरक्षण सुनवाई
जबलपुर हाईकोर्ट में OBC आरक्षण केस की सुनवाई के दौरान ओबीसी पक्ष ने कहा कि इंदिरा साहनी का फैसला संविधान नहीं है। 50% आरक्षण सीमा, क्वांटिफिएबल डेटा, जातिगत व्यवस्था पर बहस हुई। आबादी के अनुपात में आरक्षण की मांग भी दोहराई गई। अब सुनवाई 30 जुलाई को होगी।

समझें क्या है पूरा मामला

  • मध्य प्रदेश में ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण देने का मामला हाईकोर्ट में लंबित है।
  • कुछ याचिकाओं में 27 प्रतिशत आरक्षण का विरोध किया गया है।
  • दूसरी ओर ओबीसी पक्ष आबादी के अनुपात में अधिक आरक्षण की मांग कर रहा है।
  • सुनवाई में 50 प्रतिशत सीमा और संविधान की व्याख्या मुख्य मुद्दे बने हैं।
  • अब सभी पक्ष अपनी बहस पूरी करेंगे, फिर राज्य सरकार जवाब देगी।

ओबीसी आरक्षण की सुनवाई में बदला बहस का केंद्र

जबलपुर हाईकोर्ट में गुरुवार को ओबीसी आरक्षण मामले की सुनवाई नए मोड़ पर पहुंच गई। जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस विनय सराफ की विशेष खंडपीठ में तय समय से अधिक देर तक बहस चली। इस दौरान ओबीसी पक्ष ने केवल आरक्षण का प्रतिशत नहीं उठाया। बहस सीधे सुप्रीम कोर्ट के इंदिरा साहनी फैसले, 50 प्रतिशत सीमा और संविधान की व्याख्या तक पहुंच गई। जातिगत व्यवस्था और आरक्षण की मूल भावना पर भी विस्तार से तर्क रखे गए।



इंदिरा साहनी फैसले पर उठाए सवाल

ओबीसी पक्ष की ओर से अधिवक्ता विनायक प्रसाद शाह ने कहा कि इंदिरा साहनी का फैसला संविधान का हिस्सा नहीं है। उन्होंने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट कानून की व्याख्या करता है। नया कानून बनाना उसका अधिकार नहीं है।



उन्होंने कोर्ट से कहा कि सुनवाई के दौरान संविधान और कानून की भाषा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। केवल न्यायिक टिप्पणियों के आधार पर फैसला नहीं होना चाहिए। इसी आधार पर 50 प्रतिशत आरक्षण सीमा पर सवाल उठाए गए।



आबादी के आधार पर आरक्षण की मांग दोहराई

अधिवक्ता शाह ने कहा कि पूरे संविधान में जहां भी प्रतिनिधित्व तय हुआ, वहां जनसंख्या को आधार बनाया गया। राष्ट्रपति चुनाव, लोकसभा, विधानसभा और स्थानीय निकायों के उदाहरण कोर्ट के सामने रखे गए।



उन्होंने कहा कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को भी आबादी के अनुपात में आरक्षण मिला। इसलिए ओबीसी के लिए भी वही सिद्धांत लागू होना चाहिए। उनका कहना था कि 27 प्रतिशत आरक्षण वास्तविक जनसंख्या के अनुरूप नहीं है।



क्वांटिफिएबल डेटा पर भी रखे तर्क

सुनवाई के दौरान क्वांटिफिएबल डेटा का मुद्दा भी प्रमुख रहा। अधिवक्ता ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने यह जरूर बताया कि किन आधारों पर गणना नहीं होगी। लेकिन प्रतिनिधित्व की गणना का तरीका किसी फैसले में स्पष्ट नहीं किया गया।



उन्होंने कहा कि जब मापदंड तय नहीं है, तब राज्यों के सामने कठिनाई खड़ी होती है। इसलिए इस विषय पर भी स्पष्ट कानूनी व्याख्या जरूरी है।



जातिगत व्यवस्था का इतिहास भी कोर्ट में रखा

बहस के दौरान भारतीय समाज की जातिगत व्यवस्था का भी उल्लेख किया गया। कोर्ट को बताया गया कि ऋग्वेद के कुछ अंशों से जाति व्यवस्था शुरू हुई थी। इसके काफी समय बाद मानव धर्मशास्त्र के आधार पर हिंदू धर्म को जातियों में बांटा गया। इतिहास में कई वर्ग लंबे समय तक मुख्यधारा से दूर रहे। इसी सामाजिक असमानता को दूर करने के लिए आरक्षण की व्यवस्था बनाई गई।



ओबीसी पक्ष ने कहा कि आरक्षण केवल सामाजिक सहायता नहीं है। इसका उद्देश्य शासन और प्रशासन में सभी वर्गों की बराबर भागीदारी सुनिश्चित करना भी है।



समय पूरा होने के बाद भी सुनती रही कोर्ट

सुनवाई शाम साढ़े चार बजे तक तय थी। इसके बाद भी कोर्ट ने करीब आधा घंटा अतिरिक्त समय देकर बहस सुनी। अधिवक्ता ने कहा कि अभी कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर तर्क बाकी हैं। इसलिए उन्हें आगे भी अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया।



सरकार की बहस अभी बाकी

पहले तय था कि गुरुवार और शुक्रवार को राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता के.एम. नटराजन बहस करेंगे। लेकिन अन्य याचिकाकर्ताओं की दलीलें पूरी नहीं हो सकीं।



अब कोर्ट ने निर्देश दिया है कि पहले सभी शेष पक्ष अपनी बहस समाप्त करेंगे। इसके बाद सरकार अपना पक्ष रखेगी। मामले की अगली सुनवाई 30 जुलाई को दोपहर 12 बजे से होगी।



पहले क्या हो चुका है

इससे पहले सामान्य वर्ग की ओर से 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण का विरोध किया जा चुका है। वहीं ओबीसी पक्ष लगातार यह कह रहा है कि जब एससी और एसटी को आबादी के अनुपात में आरक्षण मिला है, तो ओबीसी को उसी आधार पर आरक्षण क्यों नहीं मिलना चाहिए। अब सुनवाई का केंद्र आरक्षण की सीमा से आगे बढ़कर संविधान की व्याख्या और प्रतिनिधित्व के सिद्धांत पर आ गया है।



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