भागीरथपुरा रिपोर्ट के लिए दर्जन भर आईएएस के बयान, रैंडम आधार पर क्लीन चिट
इंदौर में वार्ड 11 भागीरथपुरा में दिसंबर 2025 के अंत में सामने आए भयावह दूषित पानी कांड की रिपोर्ट के बिंदु सामने आ गए हैं। इस मामले की जांच हाईकोर्ट के रिटायर जस्टिस सुशील कुमार गुप्ता ने की। उनकी जांच रिपोर्ट करीब 600 पन्नों की है। इसमें लगभग 400 पन्नों में बयान और दस्तावेज शामिल हैं। करीब 200 पन्नों में जांच के निष्कर्ष दर्ज किए गए हैं। रिपोर्ट की अब तक सामने आई अधूरी जानकारी से कहीं रैंडम क्लीन चिट तो कहीं लापरवाही मानने की बात सामने आ रही है।
रिपोर्ट के लिए दर्जन भर आईएएस के बयान
इस रिपोर्ट के लिए जांच कमीशन ने साल 2015 से 2025 घटना तक पदस्थ रहे निगमायुक्त के साथ ही अपर आयुक्त, खासकर जल व सीवरेज विभाग प्रभारी अधिकारियों को बुलाया। इसके साथ ही इन दोनों विभाग में पदस्थ इंजीनियर व अन्य टेक्निकल स्टाफ को भी बुलाया गया। निगमायुक्त में मनीष सिंह, आशीष सिंह, प्रतिभा पाल, हर्षिका सिंह, शिवम वर्मा, दिलीप यादव के बयान हुए। तो वहीं अपर आयुक्त रहे संदीप सोनी, सिद्धार्थ जैन, संतोष टैगोर, भव्या मित्तल, ए. गेहलोत, अभिलाष मिश्रा, रोहित सिसोनिया सहित अन्य के बयान लिए गए।
जांच में रैंडम आधार पर लापरवाही, क्लीन चिट
जांच रिपोर्ट में दो पूर्व निगमायुक्तों का भी जिक्र किया गया है। इनमें एक महिला और एक पुरुष अधिकारी शामिल हैं। रिपोर्ट में दोनों अधिकारियों की ओर से काम में देरी और लापरवाही की बात लिखी गई है। हालांकि इनमें से एक अधिकारी घटना से छह साल पहले निगमायुक्त रहे थे। वहीं दूसरी अधिकारी घटना से दो साल पहले निगमायुक्त रही थीं। खास बात यह है कि इनके पहले और बाद में निगमायुक्त रहे अधिकारियों पर रिपोर्ट में इस तरह की कोई टिप्पणी नहीं की गई है।
यानी जांच आयोग की रिपोर्ट में कुछ अधिकारियों को एक तरह से क्लीन चिट मिलने की बात सामने आई है। आयोग ने 6-7 साल पहले अपर आयुक्त रहे एक अधिकारी की लापरवाही मानी, लेकिन उसके बाद पदस्थ रहे अपर आयुक्तों को जिम्मेदार नहीं माना। दिसंबर 2025 में घटना के समय पदस्थ अपर आयुक्त द्वारा टेंडर की फाइल रोकने को लापरवाही माना गया है। यानी बीच के कार्यकाल में रहे अधिकारियों पर जिम्मेदारी तय नहीं की गई। संजीव श्रीवास्तव लंबे समय से विभाग संभाल रहे हैं, इसलिए उनकी लापरवाही को लेकर रिपोर्ट में बार-बार टिप्पणी की गई है। सहायक इंजीनियर पीएचआई सरोज प्रजापति और प्रज्ञा तिवारी के नाम भी दोषी अधिकारियों में शामिल हैं।
दूषित पानी से मौत, लेकिन पानी दूषित क्यों हुआ?
जांच आयोग ने घटना के दौरान भागीरथपुरा में 36 मौतों को माना है। स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट के आधार पर इनमें से 24 मौतों की वजह दूषित पानी को बताया गया है। बाकी 12 मौतों का कारण अभी स्पष्ट नहीं हो पाया है। जांच में पानी दूषित होने की वजह सड़ी पाइपलाइन को माना गया है। यह भी जांच का हिस्सा है कि अगर पाइपलाइन बदलने का काम समय पर होता तो पानी दूषित नहीं होता।
हालांकि, इतनी बड़ी संख्या में मौतों की वजह सिर्फ सीवर का पानी नर्मदा जल में मिलना थी या नहीं, यह अभी साफ नहीं है। क्योंकि विभिन्न रिपोर्ट में है कि इंदौर में कई जगह दूषित पानी मिला है। प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड की ही रिपोर्ट है। लेकिन इनसे एकदम बड़े पैमाने पर मौत नहीं होती है।
यानी मौतों का असल कारण भी स्पष्ट होना बाकी है। इस संबंध में जांच कमीशन की पूरी रिपोर्ट आने के बाद ही स्थिति साफ होगी। कुछ लोगों ने पानी में कुछ केमिकल मिलाने की शिकायत भी की थी। जिसके चलते पानी जहरीला हुआ। लेकिन इस बिंदु पर जांच आयोग ने क्या टिप्पणी की है, यह सामने आना बाकी है।
जांच आयोग एक सदस्यीय होने से सीमाएं
जांच आयोग 27 जनवरी को बना और मिड फरवरी से काम शुरू हुआ। करीब 6 माह में रिपोर्ट पूरी हुई। इस दौरान आयोग ने आमजन से भी उनकी शिकायतें और बयान लिए थे। साथ ही निगम, आईडीए व अन्य एजेंसी से भी हजारों पन्नों के रिकॉर्ड लिए और उनका परीक्षण किया।
टेक्निकल ग्राउंड पर पानी, सीवरेज लाइन को समझा। पुराने रिकॉर्ड, टेंडर की कॉपियां, वर्क ऑर्डर व अन्य की हजारों पन्नों की फाइल देखी। इनका परीक्षण किया। यह अकेले एक सदस्यीय जांच आयोग के लिए काफी कठिन काम रहा। इसके बाद भी आयोग ने 2015 से 2025 तक पूरे दस साल की स्थितियों का अध्ययन करते हुए यह विस्तृत रिपोर्ट पेश की है। इस पर अब जस्टिस सुबोध अभ्यंकर और जस्टिस आलोक अवस्थी की बेंच को आगे फैसला करना है।
शासन को भेजी जा सकती है रिपोर्ट
पानी की गुणवत्ता को लेकर बेंच जनहित याचिकाओं की सुनवाई के बाद पहले ही एसओपी जारी कर चुकी है। इसमें तत्कालीन मुख्य सचिव अनुराग जैन भी वीसी से पेश होकर साफ पानी को लेकर किए जा रहे कामों की जानकारी दे चुके हैं। वहीं बात अब मुआवजे, मौत के कारण और जिम्मेदारों पर कार्रवाई की है।
मुआवजे की अनुशंसा 20 लाख प्रति व्यक्ति की गई है। मौत का कारण दूषित पानी बताया गया है। रही बात जिम्मेदारों पर कार्रवाई की, तो ऐसे में संभव है कि अब रिपोर्ट पर आगे कार्रवाई के लिए हाईकोर्ट मप्र शासन को निर्देश जारी करे। उधर दो इंटरविनर याचिकाएं भी लगी हैं, जिसमें इस रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की मांग है।
पूरे मामले में नेताओं और निगम को राहत
हालांकि इस पूरे मामले में राजनीतिक रूप से घिर रहे नगर निगम मेयर इन काउंसिल और नेताओं को बड़ी राहत मिली है। अभी तक सामने आई जांच रिपोर्ट के बिंदुओं के आधार पर इन्हें क्लीन चिट मिली है।
स्थानीय पार्षद कमल वाघेला भी राहत पा गए हैं। कुल मिलाकर जांच आयोग ने माना कि राजनीतिक नहीं, यह प्रशासनिक चूक की वजह से हुआ है। यदि टेंडर प्रक्रिया, पाइपलाइन समय पर डालने जैसे काम होते, तो यह कांड नहीं होता।
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