इंदौर नगर निगम में नामांतरण घोटाला! आधी रात अधिकारियों की ID से संपत्ति खातों में हेरफेर
समझें क्या है पूरा मामला
- इंदौर नगर निगम के संपत्तिकर रिकॉर्ड में बड़े पैमाने पर हेरफेर हुई है।
- जनवरी से मार्च 2026 के बीच 370 खातों में मालिकों के नाम बदले गए।
- यह काम रात 10 बजे से सुबह 3 बजे के बीच किया गया।
- दो उपायुक्तों की आधिकारिक लॉगिन ID का इस्तेमाल हुआ।
- अपर आयुक्त (राजस्व) ने सख्त कानूनी कार्रवाई का आश्वासन दिया है।
नगर निगम में नामांतरण घोटाला
इंदौर नगर निगम के संपत्तिकर रिकॉर्ड में बड़े स्तर पर छेड़छाड़ सामने आई है। जनवरी से मार्च 2026 के बीच 370 संपत्तिकर खातों में मालिकों के नाम बदल दिए गए। कई मामलों में मूल संपत्ति मालिकों की जगह दूसरे लोगों के नाम दर्ज किए गए। यह पूरा काम रात 10 बजे से सुबह 3 बजे के बीच हुआ।
खास बात यह है कि इस हेरफेर के लिए दो उपायुक्तों की आधिकारिक लॉगिन ID का इस्तेमाल (नामांतरण में फर्जीवाड़ा) किया गया।
कैसे खुला मामला?
इस घोटाले का खुलासा तब हुआ जब एक राजस्व अधिकारी को दो खातों में गड़बड़ी नजर आई। जब रिकॉर्ड को ध्यान से खंगाला गया, तो जनवरी से मार्च 2026 के बीच 370 खातों में बदलाव सामने आए। इतने बड़े पैमाने पर हुई इस हेरफेर ने निगम प्रशासन को हिला दिया।
जांच में पता चला कि उपायुक्त केशव सगर की ID से 341 खातों में बदलाव किए गए। वहीं उपायुक्त प्रदीप जैन की ID से 29 खातों में नाम बदले गए। अफसरों को शक है कि किसी कर्मचारी ने लॉगिन ID का दुरुपयोग करके यह काम किया। अभी तक यह साफ नहीं है कि एंट्रियां निगम कार्यालय के अंदर से हुईं या बाहर से।
किन्हें मिले नोटिस?
निगम ने फिलहाल छह लोगों को नोटिस जारी किए हैं। इनमें दोनों उपायुक्त केशव सगर और प्रदीप जैन शामिल हैं। इसके साथ ही मुख्यालय के एआरओ (Assistant Revenue Officer) अजीम खान और मयूर पाटील को भी नोटिस दिए गए हैं। बाकी दो नाम अभी सामने नहीं आए हैं।
IP एड्रेस से मिलेगा सुराग
निगम (इंदौर नगर निगम घोटाला) ने ई-नगर पालिका पोर्टल (e-Nagarpalika Portal) से तकनीकी जानकारी मांगी है। जिस IP (Internet Protocol) एड्रेस से लॉगिन करके रिकॉर्ड में बदलाव हुए, उसे ट्रेस किया जा रहा है। इससे यह साफ होगा कि एंट्री निगम के अंदर से हुई या किसी बाहरी सिस्टम से। यही सुराग पूरे मामले की जड़ तक पहुंचाएगा।
नाम बदलने से क्या नुकसान?
संपत्तिकर रिकॉर्ड सिर्फ टैक्स वसूली का जरिया नहीं है। यह स्वामित्व साबित करने का एक अहम दस्तावेज भी होता है। ऐसे में नाम बदलने से भविष्य में स्वामित्व विवाद खड़े हो सकते हैं और कानूनी उलझनें पैदा हो सकती हैं। निगम यह भी जांच कर रहा है कि इन बदलावों से किसे फायदा पहुंचा।
एक्सपर्ट की राय: तीन हो सकते हैं मकसद
विशेषज्ञों के मुताबिक इस तरह के नामांतरण के पीछे तीन बड़े मकसद हो सकते हैं। पहला, नामांतरण में लगने वाला शुल्क बचाना। दूसरा, अवैध प्लॉट को वैध करार दिलवाना। तीसरा, विवादित संपत्ति को किसी खास व्यक्ति के नाम करके उसे अतिरिक्त लाभ पहुंचाना। संपत्ति कर खाता कई मामलों में कानूनी दस्तावेज के रूप में भी इस्तेमाल होता है, इसलिए इसमें नाम बदलना गंभीर मामला है।
अपर आयुक्त बोले: होगी सख्त कार्रवाई
अपर आयुक्त (राजस्व) आकाश सिंह ने कहा है कि तकनीकी जानकारी जुटाकर पूरे मामले की जांच की जा रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस मामले में सख्त कानूनी कार्रवाई भी की जाएगी।
जांच में अब इन सवालों (इंदौर नगर निगम खबर) के जवाब तलाशे जा रहे हैं कि 370 खातों में बदलाव की जरूरत क्यों पड़ी। एंट्रियां निगम कार्यालय से हुईं या बाहर से। जिनके नाम जोड़े गए, उनका क्या संबंध है। क्या किसी कर्मचारी ने आर्थिक लाभ लिया। और क्या अफसरों की ID का दुरुपयोग हुआ या अनुमति से बदलाव किए गए।
FAQ
- सवाल: नगर निगम के संपत्तिकर खाते में नाम बदलने से क्या नुकसान होता है?
जवाब: संपत्तिकर रिकॉर्ड एक अहम सरकारी दस्तावेज होता है। इसका इस्तेमाल संपत्ति के स्वामित्व को साबित करने, कर्ज लेने और कई कानूनी कामों में होता है। अगर इसमें किसी दूसरे का नाम दर्ज हो जाए, तो असली मालिक को अपनी संपत्ति का हक साबित करने में बड़ी मुश्किल आती है। - सवाल: ई-नगर पालिका पोर्टल क्या है और यह कैसे काम करता है?
जवाब: ई-नगर पालिका पोर्टल (e-Nagarpalika Portal) राज्य सरकार की डिजिटल प्रणाली है। इसके जरिए नगर निगम संपत्तिकर रिकॉर्ड, नामांतरण और अन्य नागरिक सेवाएं ऑनलाइन प्रबंधित करता है। हर अफसर और कर्मचारी को अलग लॉगिन ID और पासवर्ड दिया जाता है। इस पोर्टल पर किए गए हर बदलाव का लॉग (Log) रहता है, जिसमें IP एड्रेस, तारीख और समय दर्ज होता है। इसी लॉग से जांचकर्ता यह पता कर सकते हैं कि बदलाव किसने और कहां से किए।
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